गुणस्थान मीमांसा – मुनिश्री राजकरण जी (भाग-1)


जैन तत्व दर्शन में गुणस्थान का बहुत बड़ा स्थान है अतः गुणस्थान क्या है इसका संक्षिप्त विवेचन यहाँ पर करना है। जैन सिद्धान्त दीपिका में आचार्य श्री तुलसी ने कहा है कि “आत्मनः क्रमिक विशुद्धि गुणस्थानम्” अर्थात् कर्मों के क्षय, क्षयोपशम और उपशम से पैदा होने वाले पवित्र आत्म-गुणों के क्रमिक आविर्भाव को गुणस्थान कहते है। हमारा लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। ये गुणस्थान उस तक पहुँचने के लिए सोपान हैं। ज्यों-ज्यों आत्म विशुद्धि बढ़ती चली जाती है त्यों त्यों व्यक्ति गुणस्थानों में आगे बढता है। इस तरह चढते चढते चौदहवें गुणस्थान को पारकर सिद्धि सदन में पहुँच जाता है जो आत्मा की पूर्ण विशुद्ध अवस्था है।
आगम में कर्म विशुद्धि की अपेक्षा से ही चौदह स्थान बताए गए हैं। जैसे-
कम्म विसोहिय ग्गणं पडुच्च चोदस्स जीव ठाणा पन्नता तं जहा-मिच्छदिट्ठी, सासायण सम्म दिट्ठी, सम्म मिच्छ दिट्ठी, अविरय सम्मदिट्ठी, विरया विरए, पमत्त संजए, अप्पमत्त संजए, नियट्टि वायरे, अनियट्टि वायरे, सुहुम संपराए, उवसंत मोहे वा, खीण मोहे वा, संयोगी केवली, अयोगी केवली।
-समवायांग सं. 14
यहाँ पर चौदह गुणस्थानों के क्रमशः नाम बताए गए हैं और चौदह गुणस्थानों को आत्म विशुद्धि बताया गया है। जितनी जितनी आत्म विशुद्धि है वह गुणस्थान है, आत्मा का स्वरूप है, स्वाभाविक पर्याय है।
प्रथम गुणस्थान
पहला मिथ्या दृष्टि गुणस्थान है। यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि पहला गुणस्थान ही जब मिथ्यात्वी का है फिर वह विशुद्ध कैसे ? उत्तर बिल्कुल सीधा है। यहाँ पर प्रथम गुणस्थानवर्ती जीवों में जो जो गुण पाये जाते हैं उस अपेक्षा से गुणस्थान कहा है। उन जीवों के भी चारों घाती कर्मों का थोड़ा बहुत क्षयोपशम अवश्य रहता है। सूक्ष्म निगोद वाले जीवों के भी चारों ही घाती कर्मों का आंशिक क्षयोपशम होता है।
ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से प्रथम गुणस्थान वर्ती जीव तीन अज्ञान, तीन दर्शन, पाँच इन्द्रियाँ आदि को प्राप्त करता है जिससे वह आंशिक रूप से ही सही पर कुछ न कुछ यथानुरूप ज्ञान करता ही है यदि वह मनुष्य है तो आरम्भ परिग्रह आदि को दुःखमूलक और अहिंसा आदि को मोक्ष साधन जानने या मानने वाला भी हो सकता है और ये सब आत्मविशुद्धि के ही परिणाम है।
यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि मिथ्यात्वी के ज्ञान होता ही नहीं अज्ञान ही होता है व अज्ञान को भगवान ने आवश्यक सूत्र में हेय कहा है, जैसे-
“अन्नाणं परियाणामि नाणं उवसंपज्जामि”
अर्थात् “अज्ञान को छोड़ता हूँ और ज्ञान को ग्रहण करता हूँ” फिर मिथ्यात्वी के अज्ञान को उपादेय कैसे मानें ? इसका उत्तर यों जानना चाहिए कि वहाँ पर जो मिथ्यात्वी के अज्ञान बताया है वह पात्र की अपेक्षा से है न कि वस्तु की अपेक्षा से! वस्तु की अपेक्षा से तो वह ज्ञान ही है। किन्तु मिथ्यात्वी के पास होने से ही अज्ञान कहलाता है। जैसे-एक ही तालाब का स्वच्छ, सुस्वादु और शीतल सलिल घड़े आदि पवित्र बर्तन में रहकर पवित्र तथा गन्दे अपवित्र हुए बर्तन मेें अपवित्र बन जाता है। यद्यपि उस पानी की स्वच्छता और स्वादुता में कोई फर्क नहीं आता किन्तु पात्र की अपवित्रता मात्र ही उसे अपवित्र कहने में कारण बनती है। उसी प्रकार ज्ञानावरणीय का क्षयोपशम भाव भी सम्यग् दृष्टि के पास ज्ञान और मिथ्या-दृष्टि के पास अज्ञान कहलाता है।
आवश्यक सूत्र में जो अज्ञान को हेय बताया है वह अज्ञान क्षायोपशमिक नहीं है पर औदयिक है। ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से होने वाला अज्ञान मिथ्यादृष्टि के क्षयोपशम जन्य अज्ञान से सर्वथा भिन्न है। औदयिक अज्ञान मिथ्यात्वी में ही नहीं किन्तु सम्यक्त्वी, साधु एवं बारहवें गुणस्थान तक वीतराग में भी आंशिक रूप से विद्यमान रहता है वह हेय है। तेरहवें गुण-स्थान में ज्ञानावरणीय कर्म का सर्वथा क्षय होने से केवल ज्ञान(सम्पूर्ण ज्ञान) प्राप्त होता है, वहाँ अज्ञान नहीं रहता। बारहवें गुणस्थान तक सभी जीवों के ज्ञानावरणीय तथा दर्शनावरणीय कर्मों के उदय और क्षयोपशम दोनों रहते हैं तरतमता अवश्य रहती है। जिसके उदय ज्यादा और क्षयोपशम कम होगा उसके अज्ञान ज्यादा और ज्ञान कम होगा, एवं जिसके क्षयोपशम ज्यादा और उदय कम होगा तो ज्ञान ज्यादा एवं अज्ञान कम होगा। परन्तु पूर्ण ज्ञानी यहाँ तक कोई नहीं होगा।
इस तरह अज्ञान के दो भेद हुए। एक तो औदयिक एवं दूसरा क्षायोपशमिक। इसमें प्रथम हेय और दूसरा उपादेय है।
अनुयोगद्वार सूत्र में भी इन दोनों का भिन्न भिन्न उल्लेख है औदयिक बोलों में जहाँ “अन्नाणी” शब्द दिया गया है वहाँ- क्षायोपशमिक बोलों में “मइ अन्नाणं, सुय अन्नाणं, विभंग अन्नाणं” आदि स्पष्ट रूप से कहा गया है।
इसी तरह दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से प्राप्त होने वाले चक्षु दर्शनादि भी उपादेय ही हैं। वे चाहे सम्यक्त्वी के हों या मिथ्यात्वी के।
मोहनीय कर्म के दो भेद हैं- दर्शन मोह, चरित्र मोह! दर्शन मोहनीय के कारण आत्मा में विपरीत श्रद्धा होती है एवं चरित्र मोहनीय के कारण आत्मा असत् प्रवृत्ति करती है, इसके विपरीत इनके क्षय, क्षयोपशम, उपशम से सम्यक श्रद्धा, सम्यक चारित्र एवं सत् क्रिया आदि होते हैं। पिछले दोनों कर्मों की तरह इसका (मोहनीय) भी प्रथम गुणस्थान में क्षयोपशम रहता है। दर्शन मोह के क्षयोपशम से ही प्रथम गुणस्थानवर्ती व्यक्ति तत्वों के प्रति यत्किंचित् सच्ची श्रद्धा रखता है, बहुत से मिथ्यात्वी जीव को जीव, धर्म को धर्म मानकर जितने अंश में सच्ची श्रद्धा करते है वह दर्शन मोह के ही क्षयोपशम का फल है। उसी को आगमों मे मिथ्यादृष्टि क्षयोपशम भाव बतलाया है। उसके मिथ्यात्व मोह का उदय भी रहता है, जिससे वह जीवादि तत्वों पर विपरीत श्रद्धा रखता है अतः वह मिथ्यात्व है पर गुणस्थान नहीं, गुणस्थान तो जो विशुद्धि है वही है।
यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि जब मिथ्यात्व को गुणस्थान नहीं माना जाता तो यहाँ पर मिथ्यादृष्टि गुण-स्थान क्यों कहा ? इसका उत्तर यह होगा कि उसके पास मिथ्यात्व होने से मिथ्यादृष्टि कहलाता है, पर मिथ्यात्व गुण-स्थान नहीं। जैसे- चतुर्थ गुणस्थान है अविरत सम्यक् दृष्टि-यहाँ जो अविरत बताया है वह गुणस्थान नहीं परन्तु सम्यक् दृष्टि गुणस्थान है। पांचवां गुणस्थान है व्रताव्रती। यहाँ पर भी जितना व्रत है वह गुणस्थान है पर अव्रत गुणस्थान नहीं वह तो अवगुण है, पर दोनों होने से व्रताव्रती कहा गया है। षष्ठम गुणस्थान प्रमत्त संयत है यहां पर प्रमत्तता गुण-स्थान नहीं संयतता गुणस्थान है, नवमां अनियट्ट बादर गुणस्थान है, यहाँ बादर कषायों से नहीं निवर्ता वह गुणस्थान नहीं पर बहुत सी कषायें छोड़ दी है वह गुणस्थान है। दसवां सूक्ष्म संपराय (थोड़ा कषाय)-यहाँ भी सूक्ष्म संपराय गुणस्थान नहीं वह तो हेय है। पर उस जीव का जो उज्ज्वल चरित्र है वह गुणस्थान है। तेरहवां  गुणस्थान है संयोगी केवली, यहाँ पर जो पुण्य बंध का कारण योग है वह गुणस्थान नहीं पर केवल ज्ञानादि पवित्रता ही गुणस्थान है। इसी प्रकार मिथ्यात्व गुणस्थान नहीं पर मिथ्यात्वी के पास जो पवित्र गुण है वह गुणस्थान है।
दर्शन मोह की भाँति चारित्र मोह का भी आंशिक क्षयोपशम यहाँ पर रहता है जिससे वह अंश रूप में अहिंसा सत्यादि का पालन करता है वह धर्म है। चारित्र मोह के क्षयोपशम से ही वह वीतराग की आज्ञानुसार दान, ध्यान आदि शुभ क्रियाएं करता है।
जैन धर्म के दृष्टिकोण में वह संकीर्णता नहीं कि जैन करे वह धर्म और अजैन की अच्छी क्रिया भी अधर्म। इसको स्पष्ट करने के लिए आचार्य श्री तुलसी ने कहा-
सत् करणी सबकी अच्छी, जैनेतर जैन क्या, जैनेतर जैन क्या
कहे जिनवर बाल तपस्वी भी देशाराहए
जय जैन धर्म की ज्योति, जगमगती ही रहे।
भगवान महावीर ने बाल तपस्वी को मोक्ष मार्ग का देशाराधक कहा है। मिथ्यात्वी मनुष्य या पशु के ही नहीं किन्तु एकेन्द्रिय के भी अंशतः शुभ अध्यवसाय रहते हैं और वह धर्म है, वीतराग की आज्ञा में है। यदि ऐसा न हो तो एकेन्द्रिय का द्वीन्द्रिय भी नहीं हो सकता न मिथ्यात्वी का सम्यक्त्वी हो सकता है।
सुमुख गाथापति ने दान के द्वारा तथा स्वयंप्रभ हाथी (मेघकुमार का पूर्व भव) ने दया के द्वारा मिथ्यात्वी दशा में परित्त संसार किया एवं मनुष्यायुष्य का बंधन किया ऐसे अनेकों उदाहरण आगमों में प्रभाणित है।
प्रथम गुणस्थानवर्ती जीव सदनुष्ठान के कारण सुव्रती तक कहा जाता है इत्यादि अनेक आगम प्रमाणों के द्वारा यह बात फलित होती है कि मिथ्यात्वी के धर्म होता है।
श्री सेनाचार्य ने सेन प्रश्नोत्तर में मिथ्यात्वी के सकाम निर्जरा का होना भी कहा है यदि वह कर्म क्षय की भावना से करता है। यदि सकाम निर्जरा न हो तो बाल तप एवं अकाम निर्जरा मे दो भेद अनावश्यक हो जाते हैं। उसी तरह मिथ्यात्वी को पाँच लब्धि एवं बालवीर्य अन्तराय कर्म के क्षयोपशम से प्राप्त होते हैं अतः वे भी विशुद्ध या उपादेय हैं।
यह एक निश्चित सिद्धान्त है कि घाती कर्मों का जहाँ उदय होगा, वहाँ क्षयोपशम भी अवश्य होगा एवं जहाँ क्षयोपशम होगा वहाँ उदय भी अवश्य होगा। जहाँ सर्वथा अनुदय है वहाँ क्षयोपशम नहीं क्षय या उपशम है।
अतः यह सिद्ध हुआ कि मिथ्यात्वी के पास जितना भी ज्ञान (अज्ञान) दर्शन, शुद्ध, सदाचार एवं आत्म पराक्रम है वह गुणस्थान है एवं उपादेय है और मिथ्यात्व अविरत आदि अन्य वस्तुएं गुणस्थान नहीं, हेय है।
यह गुणस्थान चारों गति में होता है सदा शाश्वत है इस गुणस्थान में अनन्त जीव प्रतिसमय मिलते है, विरह कभी नहीं होता। इसकी स्थिति एक जीव की अपेक्षा तीन तरह की है। 1. ’अनादि अनन्त’ जो कि अमोक्षगामी जीवों  की अपेक्षा से है। 2. ’अनादि सान्त’ जो कि मोक्षगामी जीवों की अपेक्षा से है। 3. ’सादि सान्त’ जो सम्यक्त्व पाकर वापिस गिर गए है उनकी अपेक्षा से है। ऐसे व्यक्ति जघन्य अन्तर्मुहुर्त और उत्कृष्ट कुछ कम अर्धपुद्गलपरावर्तन काल में अवश्य ही पुनः सम्यक्त्व प्राप्त कर लेते है। उपर्युक्त तीनों के अतिरिक्त चैथा भंग सादि अनंत भी हो सकता है, पर ऐसा कोई भी जीव नहीं हो सकता कि जिसमें एक बार सम्यक्त्व आ गई हो और वह फिर मिथ्यात्वी होने के बाद अनन्त काल तक (अर्द्ध पुद्गलपरावर्तन से भी अधिक काल तक) मिथ्यात्वी रह सके। इसलिए तीन ही भंग सार्थक पाये जाते हैं, चौथा नहीं।
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