गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-3)


63f37-dikshaषष्ठम गुणस्थान

छठा प्रमत्त संयत गुणस्थान है। “सर्व व्रतः संयतः” अर्थात् सर्व विरति युक्त व्यक्ति को संयत कहते हैं। यह देश विरति से उच्च स्तरीय स्थिति होती है; इस गुणस्थान में मिथ्यात्व और अविरत आश्रव का तो पूर्ण निरोध हो जाता है पर प्रमादादि तीन आश्रवों के कारण आत्मा के निरन्तर पाप कर्म चिपकते रहते हैं।

यहाँ इतना स्मरण रहे कि जो पाँच प्रमाद-मद, विषय, कषाय, निद्रा और विकथा के नाम से प्रसिद्ध हैं वे प्रमाद आश्रव न होकर अशुभ योग आश्रव हैं। जो छठे गुणस्थान में निरन्तर नहीं रहते क्योंकि निरन्तर रहने से षष्ठ गुणस्थान ही (साधुपन) नहीं रह सकता छद्मस्थता के कारण कदाचित् जब इस ओर प्रवृत्ति हो जाती है तब उसका प्रायश्चित करना पड़ता है।

यहाँ जिस प्रमाद आश्रव का कथन है उसका अर्थ है ’अनुत्साह प्रमादः’ अर्थात् अन्तरात्मा में संयम के प्रति अनुत्साह। प्रमाद आश्रव षष्ठ गुणस्थान में निरन्तर रहता है।

साधुत्व ग्रहण करते समय सर्व सावद्य (अशुभ) योग का त्याग कर दिया जाता है साधुओं की समस्त कल्प क्रियाएं शुभ योग होती हैं। उनका खान-पान, गमनागमन, जल्पन, शयन आदि भी शुभ योग है उससे कर्म निर्जरा होती है, एवं साथ-साथ पुण्य बन्ध भी होता है। साधुओं के आहार एवं भिक्षावृत्ति को असावद्य बताया है अतः यह सब धर्म है।

इस गुणस्थान मेंचौदह योग, छः समुद्घात, पांच शरीर और छः लेश्या आदि होने का उल्लेख मिलता है वह कदाचित्कता की दृष्टि से ही किया गया है इनमें जो जो अशुभ है वे सब त्याज्य हैं। छद्मस्थता के कारण कभी-कभी ये त्याज्य प्रवृतियाँ भी भूल स्वरूप हो जाती है। सिद्धान्तों में कहा है कि दृष्टिवाद का अध्येता भी कहीं-कहीं वचन में स्खलना कर देता है। इतना ही नहीं किन्तु चार ज्ञान के धारक भी भूल कर जाते हैं। यह सब मोह की महिमा जाननी चाहिए। इसी के कारण आत्मा अशुभ कर्मों को आकर्षित करती है और इसी के उदय से असत् प्रवृतियाँ हुआ करती हैं। इसका उदय मात्र पाप बन्ध का कारण है।

षष्ठ गुणस्थानवर्ती मुनि गलतियाँ तो करता है पर जब तक उन गलतियों का प्रायश्चित करने की भावना रखता है तब तक नीति विशुद्ध होने के कारण अविरत आश्रव नहीं आता और उसकी साधुता नहीं जाती। इस विषय को स्पष्ट करते हुए जयाचार्य ने अपनी “नियंठों की ढ़ाल” में कहा है-

मासी चैमासी दण्ड थी रे छट्ठो

गुण ठाणों न फिरे सोय रे।

फिर अन्धी श्रद्धा ने थाप थी रे

भाई बले जबर दोष थी जोय रे।

सगुण जन स्वाम वचन अवलोय रे।

षष्ठ गुणस्थानवर्ती साधु का प्रमाद गुणस्थान नहीं है। यह तो सावद्य है, हेय है। गुणस्थान तो सर्व व्रत रूप संयम है वह निरवद्य एवं उपादेय है।

यह गुणस्थान भी शाश्वत है। पूर्वोक्त गुणस्थान की तरह इसमें असंख्य जीव नहीं है परन्तु संख्य ही है। उनकी संख्या जघन्यतः दो हजार चार सौ दो क्रोड़ तथा उत्कृष्ट नव हजार क्रोड़ होती है।

यह गुणस्थान सिर्फ कर्म भूमिक संख्य वर्ष आयुष्य पर्याप्त संज्ञी मनुष्य के ही हो सकता है अन्य के नहीं। इसकी स्थिति देशोन क्रोड़ पूर्व की है।

सातवाँ गुणस्थान

सप्तम अप्रमत्त संयत नामक गुणस्थान है। इसमें प्रमाद आश्रव का सर्वथा निरोध हो जाता है। अशुभ योग, अशुभ लेश्या, अशुभ ध्यान आदि भी निरूद्ध हो जाते हैं। इस गुणस्थान में निरन्तर ही विशुद्ध परिणाम रहते हैं।

पंचम गुणस्थानवर्ती व्यक्तियों को अविरत की अपेक्षा एवं षष्ठ गुणस्थानवर्ती व्यक्तियों को अशुभ योग की अपेक्षा से सिद्धान्तों में आरम्भी बताया गया है, किन्तु यहाँ अविरत और अशुभ योग का पूर्णतः अभाव होने के कारण इसे अनारम्भी बताया गया है। यहाँ पाँच क्रियाओें में से चार का अभाव होता है केवल एक “माया वत्तिया” क्रिया लगती है।

यहाँ पाप बन्ध के पाँच कारणों में से चार-मिथ्यात्व, अविरत, प्रमाद और अशुभ योग तो सर्वथा रूक जाते हैं पर जो एक कषाय आश्रव अवशिष्ट रहता है उसके द्वारा निरन्तर पाप लगता है। यह कषाय हेय है, सावद्य है किन्तु गुणस्थान नहीं, गुणस्थान तो अप्रमत्त अवस्था एवं संयम है। वह निरवद्य है, उपादेय है।

यह गुणस्थान संयम ग्रहण के समय तो प्रायः आती ही है पर बाद में भी जब-जब परिणामों की अत्यन्त एकाग्रता होती है और प्रमाद आश्रव छूट जाता है तब छट्ठे  से सातवां गुणस्थान आ जाता है। किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं ठहरती अन्तर्मुहुर्त के बाद वापिस छट्ठा  गुणस्थान आ जाता है।

यह गुणस्थान अशाश्वत है। यदि मिले तो इसमें उत्कृष्ट दो सौ करोड़ मिल सकते हैं। इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त की है।

आठवां गुणस्थान

आठवां गुणस्थान निवृति बादर गुणस्थान है। इसमें आया हुआ प्राणी स्थूल बादर संज्वलन कषाय से निवृत होता हुआ क्रमशः आगे बढता जाता है।

आगे बढने वाले प्राणियों को यहाँ से दो श्रेणियां मिलती है-उपशम एवं क्षपक। जयाचार्य ने चौबीसी की चौदहवीं गीतिका में कहा है-

आठमां थी दोय श्रेणी छे रे, उपशम क्षपक पिछाण।

उपशम जाय ग्यारहवें रे, मोह दबावतो जाण।

इस गुणस्थानवर्ती व्यक्ति को क्षायोपशमिक सम्यक्त्व नहीं होती। क्योंकि वह सातवें गुणस्थान से आगे नहीं हो सकती, यहाँ औपशमिक या क्षायिक सम्यक्त्व होती है। उपशम श्रेणी लेने वाले के उक्त दोनों प्रकार की सम्यक्त्व हो सकती है क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व होते हुए भी उपशम श्रेणी ली जा सकती है, उपशम श्रेणी वाला मोह कर्म की प्रकृतियों को दबाता जाता है।

इस श्रेणी वाला संयमी यहाँ से बढकर नवें दसवें एवं ग्याहरवें गुणस्थान तक चला जाता है और वहाँ मोहनीय कर्म को पूर्णतः उपशान्त कर उपशम चारित्र प्राप्त कर लेता है परन्तु उससे आगे उसका रास्ता बन्द होता है क्योंकि अवशिष्ट सात कर्मों का उपशम नहीं होता, तथा मोह कर्म के ’उपशम’ की स्थिति भी अन्तर्मुहुर्त से अधिक नहीं होती, अतः वह या तो क्रमशः वापिस नीचे आता है, या यदि आयु पूर्ण हो गई हो तो स्वर्गवासी बन जाता है।

जो व्यक्ति यहाँ से क्षायिक श्रेणी ग्रहण करते है उनके क्षायिक सम्यक्त्व ही होता है। वे क्रमशः मोह कर्म की प्रकृतियों को क्षय करते हुए आगे बढते है। आठवें से नवमां एवं दसवां गुणस्थान प्राप्त कर लेने के बाद वे ग्यारहवें को छोड़कर सीधे बारहवें गुणस्थान में पहुँच जाते है, वहाँ पर मोहनीय का सर्वथा क्षय हो जाता है और फिर ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय तथा अन्तराय का भी क्षय हो जाता है। इस प्रकार चार घाती कर्मों के साथ ही वे सर्वज्ञ हो जाते हैं और फिर यथा समय योग निरोध करते हुए मोक्ष प्राप्त करते हैं।

क्षायिक श्रेणीवाला वापिस नहीं गिरता और वह मध्य में आयुष्य पूर्ण भी नहीं करता क्योंकि समूल नष्ट की हुई प्रकृतियाँ फिर पनप नहीं सकती। झीणी चर्चा में जयाचार्य ने कहा है-

क्षपक श्रेणी में काल करे नहीं, पड़े नहीं ते पाछो रे।

दशवां थी बारवां तेरवां गुण, केवल पामे जाचो रे।

इस तरह क्षायक श्रेणी वाला जो गुण प्राप्त करता है। वह शाश्वत है। उपशम श्रेणी लेने वाला उसी भव में फिर क्षायिक श्रेणी नहीं ले सकता अतः वह मोक्ष भी नहीं जा सकता। जो मोक्षगामी होते हैं वे क्षायक श्रेणी ही लेते है। जयाचार्य कहते हैं-

उपशम श्रेणी जिन ना लहे रे क्षपक श्रेणी धर खंत।

चारित्र मोह खपावतां रे चढिया ध्यान अत्यंत। (चोबीसी14)

यहाँ पर जितना स्थूल बादर कषाय से निवृत होता है वही गुणस्थान है पर जितना कषाय, वेद व हास्यादि प्रकृतियों का उदय है वह सब सावद्य है, पाप कर्म बन्ध का कारण है, अतः हेय है।

यह गुणस्थान वर्तमान में भरत क्षेत्रस्थ साधुओं में नहीं है। यह गुणस्थान अशाश्वत है। यदि मिले तो 54 उपशम श्रेणी वाले एवं 108 क्षायिक श्रेणी वाले मिल सकते हैं, यों दोनों मिलकर एक साथ ग्रहण करने वाले 162 हो जाते हैं। इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त है।

नवमां गुणस्थान

नवमां अनिवृत्ति बादर गुणस्थान है। यद्यपि बादर कषायों से निवृत्ति का प्रारम्भ तो पिछले गुणस्थान में ही हो जाता है पर इसमें उस निवृत्ति में काफी वृद्धि हो जाती है फिर भी पूर्ण निवृत्ति यहाँ नहीं हो पाती। इसी दृष्टिकोण से इसका नाम अनिवृत्ति बादर गुणस्थान किया गया है।

यहाँ उपशम या क्षायिक रूप में कषायों की जितनी भी निवृत्ति होती है वह गुणस्थान है, उपादेय है। एवं जो काषायिक उदय है वह सावद्य है, हेय है। वह गुणस्थान नहीं है।

इस गुणस्थान में प्रविष्ट प्रणाली क्रमशः नपुंसक वेद, स्त्री वेद, हास्य, अरति, रति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरूष वेद, संज्वलन-क्रोध, मान, माया उपशम श्रेणी वाला दबाता जाता है, तथा क्षपक श्रेणी वाला नष्ट करता जाता है। अन्त समय में एक लोभ रहता है।

श्री जयाचार्य ने कहा-

नवमें आदि संजल चिहुँ रे अन्त समय इक लोभ। (चौबीसी14)

मोह कर्म की 28 ही प्रकृतियों के क्षय का क्रम बतलाते हुए श्री जयाचार्य झीणी चर्चा में कहतें हैं –

प्रथम चोक अनुतान फुनः मिथ्यात्व खपावे,

फुनः मिश्रमोह टाट फुनः समकित मा जावे।

अप्रत्या प्रत्या चोक नपुंसक पुनः श्री वेदः,

हास अरति रति शोग बले दुगुँछा भय छेदः

पुरूष वेद संज्वलन कोह मान माया लोह खपत कर्म

चढ खपक सेणि मह मुनि लहे अनन्तनाण शिवबुधपर्म

यह गुणस्थान भी आठवें की तरह आशाश्वत है। इसकी स्थिति भी अन्तर्मुहुर्त है। इस गुणस्थान में प्राणी के सात कर्म का बन्ध होता रहता है।

दशम गुणस्थान

दसवां सूक्ष्म संपराय गुणस्थान है। मोह की अट्ठाईस प्रकृतियों में से सत्ताईस तो इस गुणस्थान से पूर्व ही सर्वथा उपशान्त या क्षय हो जाती है इसमें केवल एक संज्वलन लोभ शेष रहता है वह भी सूक्ष्म मात्रा में ही होता है।

इस गुणस्थानवर्ती व्यक्ति का चरित्र एवं गुणस्थान सूक्ष्म संपराय कहलाता है। सूक्ष्म संपराय का अर्थ होता है थोड़ा सा कषाय। यहाँ पर भी जो थोड़ा सा कषाय अवशिष्ट रहता है वह गुणस्थान नहीं हैै, गुणस्थान तो उस जीव का उज्ज्वल चारित्र है।

यहाँ पर अनाकार उपयोग नहीं होता क्योंकि दशम गुणस्थान का प्रारम्भ साकार उपयोग से होता है और साकार उपयोग की अन्तर्मौहूर्तिक स्थिति इस गुणस्थान की अन्तर्मौहूर्तिक स्थिति से अधिक होती है अतः अनाकार उपयोग आने से पहले ही गुणस्थान बदल जाता है।

यहाँ पर सूक्ष्म संपराय के कारण निरन्तर छह कर्मो का ही बन्ध होता है। आयुष्य एवं मोहनीय कर्म का यहाँ पर बन्ध नहीं होता। यद्यपि यहाँ पर मोह कर्म का उदय रहता है, फिर भी वह इतना प्रबल नहीं होता कि फिर से मोह कर्म का बन्ध कर सके। आयुष्य कर्म का बन्ध तो सातवें से आगे है ही नहीं। सातवें में भी छट्ठे से आयुष्य का बन्ध प्रारम्भ हुआ हो तो उसे पूरा कर सकता है पर वहाँ नया बन्ध प्रारम्भ नहीं करता।

इस सम्बन्ध में जयाचार्य ने कहा हैः-

आयु अबन्ध सातमां आगे बलि तीजो गिण लीज्यो रे।

अर्थात् सातवें से अगले सभी गुणस्थान तथा तृतीय गुणस्थान में आयु बन्ध नहीं होता। इस गुणस्थान में वेदनीय कर्म का बन्ध भी सात वेदनीय तक ही सीमित है। असात वेदनीय का बन्ध नहीं होता।

यह गुणस्थान भी अशाश्वत है इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त है। पिछले दोनों गुणस्थानों की अपेक्षा इसकी स्थिति कम है।

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