गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग 5)


गुणस्थानों की हेयोपादेयता

गुणस्थानों की हेयता तथा उपादेयता के विषय में जिज्ञासा हो सकती है अतः उस पर भी चिन्तन कर लेना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। अपेक्षा दृष्टि से इस प्रश्न के तीन उत्तर हो सकते है-

  1. गुणस्थान सभी उपादेय हैं क्योंकि आत्मा के पवित्र गुणों के स्थान को गुणस्थान कहा जाता है। चौदह गुणस्थानों में प्रथम गुणस्थान सबसे अल्प गुण वाला है फिर भी आत्मा के न्यूनतम गुण की ही वह स्थिति है। गुण कभी हेय नहीं होता। राख कितनी ही क्यों न हो पर चिनगारी की अवज्ञा नहीं की जा सकती। अगले गुणस्थान में आत्मा की उज्जवलतर स्थितियाँ होती है, इसलिए आत्मोज्ज्वल्य की न्यूनतम से लेकर उच्चतम स्थिति तक भी सभी भूमिकाएँ उपादेय ही ठहरती है।
  2. सभी गुणस्थान हेय हैं यह भी एक अपेक्षा से ठीक है। क्योंकि आत्मा की पूर्ण पवित्रता किसी भी गुणस्थान में नहीं होती।चौदहवें गुणस्थान में भी आत्मा के चार कर्म लगे रहते हैं। जिसमें आयुष्य के सिवा बाकी तीन कर्मअशुभ भी हो सकते है। मुक्ति महल की वह चाहे अन्तिम पेड़ी ही हो पर है तो सोपान ही, महल नहीं है। उसको पार करने से ही पूर्ण आत्मानन्द पाया जा सकता है, पहले नहीं। आत्मानन्द की पूर्णता के लिए सोपान को लांघना ही श्रेयस्कर है पर वहाँ टिके रहना नहीं।
  3. पूर्व-पूर्व गुणस्थान हेय एवं उत्तर-उत्तर गुणस्थान उपादेय है। जैसे पाँचवे गुणस्थान वाले के लिए छठा उपादेय है और सातवें वाले के लिए हेय है। क्योंकि उत्तर गुणस्थानों में आत्मविशुद्धि बढती जाती है, एवं पूर्व गुणस्थानों में उत्तर की अपेक्षा से आत्म विशुद्धि की कमी होती हैं। अतः श्रावक को साधु बनना चाहिए, पर साधु को श्रावक नहीं क्योंकि पहले में आत्म गुणों की वृद्धि होती है एवं दूसरे में हानि। यह हेयोपादेय सम्बन्धी प्रश्न का अपेक्षा भेद से उत्तर है। वास्तव में तो जैसा कि ऊपर बताया गया है सभी गुणस्थान उपादेय हैं।

गुणस्थानों की अमरता

चौदह गुणस्थानों में तीन गुणस्थान अमर हैं। अर्थात् तीसरे, बारहवें तथा तेरहवें में कोई भी जीव आयुष्य पूरा नहीं करता। जयाचार्य ने कहा है-

“तीन गुण ठाणा अमर कह्या छे, तेरम बारम तीजो रे।”

(झीणी चर्चा)

गुणस्थानों में कर्मबन्ध

चौदह गुणस्थान में नवमें तक सात कर्मों का (आयुष्य छोड़ कर) निरन्तर बन्धन होता है। दसवें में (आयुष्य, मोह बिना) छह कर्मों का निरन्तर बन्धन होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें में एक सात वेदनीय कर्म का बन्धन होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर सातवें तक आयुष्य का बन्धन होता है। आयुष्य का बन्धन एक भव में एक बार ही होता है। छठे में यदि आयुष्य कर्म का बन्धन प्रारम्भ किया हो तो सातवें में पूर्ण कर सकता है पर सातवें में आयुः बन्ध प्रारम्भ नहीं करता। जयाचार्य कहते है-

“आयु अबंध सातमां आगे बलि तीजो गिण लीज्यो रे।”

(झीणी चर्चा)

गुणस्थान में कर्मोदय

दसवें गुणस्थान तक आठों ही कर्मों का उदय रहता है। ग्यारहवें तथा बारहवें मे सात कर्मों का एवं तेरहवें चौदहवें में चार कर्मों का। ग्यारहवें तक मोह कर्म की सत्ता रहती है। बारहवें तक ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय एवं अंतराय की सत्ता रहती है तथा बाकी चार कर्मों – आयुष्य, नाम, गौत्र एवं अंतराय की सत्ता चौदहवें गुणस्थान तक रहती है।

गुणस्थान और भाव

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि कर्म दूर होने से होने वाली आत्मा की क्रमिक विशुद्धि का नाम गुणस्थान है। इनमें से प्रथम दस गुणस्थान क्षयोपशम भाव से प्राप्त होते हैं, ग्यारहवाँ उपशम भाव से, बारहवाँ, तेरहवाँ क्षायक भाव से एवं चौदहवाँ पारिणामिक भाव से। उतः प्रथम दस गुणस्थान क्षयोपशम भाव, ग्यारहवाँ उपशम भाव, बारहवाँ एवं तेरहवाँ क्षायिक भाव और चौदहवाँ पारिणामिक भाव कहलाता है। सम्यक्त्व की अपेक्षा से चतुर्थ गुणस्थान को उपशम एवं क्षायिक भाव भी कहा जा सकता है।

गुणस्थानवर्ती जीव और भाव

भेद विज्ञान से:- औदयिक भाव के 33, औपशमिक भाव के 8, क्षायिक भाव के 13, क्षायोपशमिक भाव के 32 भेद किए जाते है। वे यथाक्रम यों हैं:-

औदयिक भाव के 33 भेद– चार गति, छः काय, छः लेश्या, चार कषाय, तीन वेद, मिथ्यात्व, अव्रत, अमनस्कता, अज्ञानता, आहारता, संसारता, असिद्धता, अकेवलित्व, छद्मस्थता, सयोगिता।

औपशमिक भाव के 8 भेद – 1. उपशम क्रोध 2. उपशम मान, 3. उपशम माया, 4. उपशम लोभ, 5. उपशम राग, 6. उपशम द्वेष, 7. उपशम सम्यक्त्व, 8. उपशम चारित्र।

क्षायिक भाव के 13 भेद – 1. केवल ज्ञान, 2. केवल दर्शन, 3. आत्मिक सुख, 4. क्षायिक सम्यक्त्व, 5. क्षायिक चारित्र, 6. अटल अवगाहन, 7. अमूर्तिपन, 8. अगुरूलघुपन, 9. दान लब्धि 10. लाभ लब्धि, 11. भोग लब्धि, 12. उपभोग लब्धि, 13. वीर्य लब्धि।

क्षायोपशमिक भाव के 32 भेद –

ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. मति ज्ञान, 2. श्रुतज्ञान, 3. अवधि ज्ञान, 4. मनःपर्यव ज्ञान, 5. मति अज्ञान, 6. श्रुत अज्ञान, 7. विभंग अज्ञान, 8. भणन गुणन।

दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. श्रोत्रेन्द्रिय, 2. चक्षुरिन्द्रिय, 3. घ्राणेन्द्रिय, 4. रसनेन्द्रिय, 5. स्पर्शनेन्द्रिय, 6. चक्षु दर्शन, 7. अचक्षु दर्शन, 8. अवधि दर्शन।

मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. सामायिक चारित्र, 2. छेदोपस्थापनीय चारित्र, 3. परिहार विशुद्धि चारित्र, 4. सूक्ष्म संपराय चारित्र 5. देशविरति 6. सम्यक् दृष्टि 7. मिथ्या दृष्टि, 8. सम्यक् मिथ्या दृष्टि।

अन्तराय कर्म के क्षयोपशम से – 1. दान लब्धि, 2. लाभ लब्धि, 3. भोग लब्धि, 4. उपभोग लब्धि, 5. वीर्य लब्धि, 6. बाल वीर्य, 7. पण्डित वीर्य, 8. बाल पण्डित वीर्य।

उदय एवं क्षय आठों कर्मों का होता है। उपशम केवल मोहकर्म का होता है। क्षयोपशम उपर्युक्त चार कर्मों का होता है।

विभिन्न गुणस्थानवर्ती जीवों में उपर्युक्त चारों- (उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम) भावों के कितने भेद पाए जाते हैं, तथा जीव भेद आदि बोल किस गुणस्थान में कितने पाते हैं इनको निम्नोक्त यन्त्र के द्वारा स्पष्टता से समझा जा सकता है। वह यन्त्र यों है:-

क्र. औद
यिक
औप
शमिक
क्षा
यिक
क्षायो
पशमिक
जीव भेद योग उप योग लेश्या
त्मा
दृष्टि दंड क पक्ष
1 33 0 0 19 14 13 6 6 6 मिथ्या 24 2
2 27 0 0 19 6 13 6 6 7 सम्यक् 19 शुक्ल
3 27 0 0 19 1 10 6 6 6 मिश्र 16 शुक्ल
4 26 1 1 19 2 13 6 6 7 सम्यक् 16 शुक्ल
5 24 1 1 20 1 12 6 6 7 सम्यक् 2 शुक्ल
6 22 1 1 23 1 14 7 6 8 सम्यक् 1 शुक्ल
7 19 1 1 23 1 5 7 3 8 सम्यक् 1 शुक्ल
8 17 1 1 21 1 5 7 1 8 सम्यक् 1 शुक्ल
9 17 1 1 21 1 5 7 1 8 सम्यक् 1 शुक्ल
10 11 1 1 17 1 5 7 1 8 सम्यक् 1 शुक्ल
11 10 2 1 19 1 5 7 1 7 सम्यक् 1 शुक्ल
12 10 0 2 19 1 5 7 1 7 सम्यक् 1 शुक्ल
13 7 0 9 0 1 2 2 1 7 सम्यक् 1 शुक्ल
14 4 0 9 0 1 2 2 0 6 सम्यक् 1 शुक्ल

(यन्त्र नं. 1)

मुक्ति:-

चौदहवाँ गुणस्थान छूटते ही आत्मा बिल्कुल कर्म रहित हो जाती है। कर्म रहित आत्मा ऋजु गति करती है वक्र गति नहीं। जहाँ मुक्ति हुई कि बस उसी सीध में लोक के मस्तक पर जा ठहरती है। सिद्धावस्था से पूर्व शरीर जितना आकाश घेरे रहता है, मुक्तावस्था में वह जीव उसके दो तिहाई आकाश को घेर कर रहता है।

कर्ममुक्ति होने से भी पूर्व शरीर की अपेक्षा से सिद्धों के आत्म प्रदेशों की अवगाहना में बहुत बड़ा अन्तर होता है। सिद्धों की जघन्य अवगाहना एक हाथ आठ आंगुल होता है। इसका कारण यह है कि सात हाथ से कम शरीर वाला सिद्ध नहीं होता। सात हाथ की अवगाहना वाला व्यक्ति जब उर्ध्व जानुओं में सिर झुकाकर ध्यान मुद्रा में बैठता है तब वह दो हाथ की अवगाहना वाला होता है वही आत्मा सिद्धावस्था मे दो तिहाई अवगाहना का रहता है, तब जघन्य अवगाहना वाला होता है। उत्कृष्ट 500 धनुष्य की अवगाहना वाला सिद्ध होता है और वह खड़ा-खड़ा सिद्ध होता है तब उत्कृष्ट अवगाहना वाला सिद्ध होता है। इसी प्रकार मध्य की समस्त अवगाहनाएं समझ लेनी चाहिए।

सिद्धों के रहने का स्थान पैंतालीस लक्ष योजन लम्बा-चैड़ा है। इसका कारण यह है कि मुक्त होने वाले जीव अढाई द्वीप में ही होते है, उनमें लाख योजन का जम्बूद्वीप है, उसके चारों तरफ द्विगुणित लवण समुद्र है, चारों ओर से दुगुना होने के कारण इनका सम्मिलित माप पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण तक पाँच लाख योजन हो जाता है। उसके चारों ओर चार लक्ष योजन का धातकी खण्ड है इसे सम्मिलित करने पर तेरह लाख योजन क्षेत्र हो जाता है। उसके बाद आठ लाख योजन का कालोदधि है इसे मिलाने पर 25 लाख हो जाता है। उसके बाद पुष्कर द्वीप है जो सोलह लक्ष योजन का है। जिसके मध्योमध्य चारों और मनुषोत्तर पर्वत है, इस पर्वत के अन्दर मनुष्य रहते है, बाहर केवल तिर्यंच ही हैं।

अतः इसका आधा क्षेत्र सम्मिलित करने पर पैंतालिस लक्ष योजन क्षेत्र हो जाता है। इसे मनुष्य क्षेत्र कहते हैं। इसके बाहर मनुष्य नहीं है। अतः वहाँ से सिद्ध भी नहीं होते। जो अनन्त सिद्ध हैं या अनन्त और भी होंगे वे सारे यहीं समा जाऐंगे। जैसे- एक दीपक के प्रकाश में सैकड़ों दीपकों का प्रकाश समा जाता है, वैसे ही ज्योतिर्मय सिद्ध समाविष्ट हो जाते हैं। सिद्ध स्थान से आगे अलोक है। धर्मास्तिकाय के अभाव के कारण वहां कोई नहीं जा सकता, क्योंकि धर्मास्तिकाय ही गति सहायक द्रव्य है, उसके अभाव में किसी भी जीव की गति नहीं हो सकती। अवगाहना की तरह पूर्वभव की अपेक्षा से सिद्धों के 15 भेद किए जाते हैं। वे इस प्रकार हैं:-

  1. तीर्थ सिद्ध, 2. अतीर्थ सिद्ध, 3. तीर्थंकर सिद्ध, 4. अतीर्थंकर सिद्ध, 5. स्वलिंग सद्धि 6. अन्यलिंग सिद्ध 7. गृहलिंग सिद्ध, 8. स्त्रीलिंग सिद्ध, 9. पुरूषलिंग सिद्ध, 10. नपुंसकलिंग सिद्ध 11. प्रत्येक बुद्ध सिद्ध, 12. स्वयं बुद्ध सिद्ध, 13. बुद्ध बोधित सिद्ध, 14. एक सिद्ध, 15. अनेक सिद्ध।

इन 15 भेदों में से प्रत्येक सिद्ध में छह ही भेद पाते है इससे कम या अधिक नहीं पाते। भेदों में परस्पर अन्तर जरूर रहता है।

समय की अपेक्षा से सिद्धों के दो भेद किये जाते हैं- अनादि अनन्त तथा सादि अनन्त।

सिद्धावस्था प्राप्त होने पर आत्मा जन्म, मृत्यु, रोग, शोक, दुःख भय, जरा आदि से रहित हो जाती है उसके सुखों का न कभी क्षय होता है न कभी अन्त।

आचार्य श्री तुलसी ने सिद्ध स्तवन में कहा है कि

“अक्षय अरुज अनन्त अचल अज अव्याबाध कहाए

अजरामर पद अनुपम सम्पद तास अधीश सुहावे।”

यह सिद्धावस्था ही सबके लिए काम्य है। गुणस्थानों का क्रमारोहण भी इसीलिए है। सिद्धि साध्य है

और गुणस्थानों का क्रमिक आरोहरण उसका साधन। साध्य की सिद्धि के लिए साधन का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है इसीलिए इस विषय पर यहाँ कुछ प्रकाश डाला गया है।a717e-gunasthanas2b252812529

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