मैत्री पर्व ऐसे मनाएं


संवत्सरी महापर्व की पावन संध्या।

प्रेम और मैत्री भाव का उमड़ता हुआ समंदर।

खमतखामणा, मिच्छामि दुक्कड़ं की मधुर स्वर लहरियों से स्निग्ध होता हुआ मन।

मैं भी इस पर्व को मना रहा हूँ। सबसे पहले किससे खमतखामणा करूँ?

यह प्रश्न मन को आंदोलित कर रहा है।

मैं स्व को सर्वाधिक महत्व देने वाला व्यक्ति हूँ। इस अपेक्षा को सामने रखकर सर्वप्रथम स्वयं से ही क्षमा प्रार्थना की। किसी और के साथ यदि मैंने कोई दुर्व्यवहार किया है तो उसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव तो मैंने स्वयं ही भोगा है। क्या किसी और के माफ़ कर देने से मेरा बोझ हल्का हो जायेगा? जब तक कि मैं स्वयं ही खुद को माफ़ न कर सकूँ। जब भी आत्मा किसी प्रकार के पापकर्म में लिप्त होती है तो उसका बुरा प्रभाव इस आधार पर नहीं मिलता कि सामने वाले जीव ने कितना कष्ट पाया, अपितु इस आधार पर मिलता है कि पाप करने वाले के मन के परिणाम कैसे रहे। सबसे पहले मैं स्वयं के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। अपने शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार किया तो सहज ही मेरे सामायिक हो गयी। इसके पश्चात् शुद्ध स्वरूप को उपलब्ध परम पुरुषों के स्वरूप का आलंबन लिया तो चउवीसत्थव हो गया। गुरु के समक्ष निवेदन हेतु गया ताकि किसी के समक्ष अपना सब पाप निवेदन करने की क्षमता है अथवा नहीं, यह वंदना आवश्यक हो गया। फिर यात्रा की अपने अतीत की, प्रतिक्रमण में। पापकर्म एक प्रकार का तनाव उत्पन्न करता है, उस तनाव से मुक्त होने के लिए कायोत्सर्ग किया और भविष्य के लिए प्रत्याख्यान भी किया।

खुद को यदि माफ़ नहीं कर पाता तो दूसरों की माफ़ी से मुझे क्या मिलता?

तो आज के इस पावन अवसर पर खुद को माफ़ करता हूँ, मेरे दुष्कृत मिथ्या हो जाएँ (मिच्छामि दुक्कड़ं)

खुद के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। खुद पर प्रेम की बरसात करता हूँ।

I LOVE YOU, PIYUSH!

I LOVE YOU MORE THEN ANYBODY ELSE.

I LOVE YOU MORE THEN ANYONE ELSE DO.

I ACCEPT YOUR INNER BEAUTY, AND FEEL GRATITUDE FOR BEING HERE ALWAYS.

ONCE AGAIN I DECIDE TO LOVE YOU FOREVER…

HUGS AND KISSES………….

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2 Comments on “मैत्री पर्व ऐसे मनाएं

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