Month: September 2018

गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-2)


वृक्ष से गिरने वाला फल जब तक पृथ्वी पर नहीं आ जाता तब तक वह इस स्थिति मे रहता है जो वृक्ष और पृथ्वी दोनों से ही सम्बन्धित नहीं होती। वैसे ही सम्यक्त्व से च्युत होने वाला जब तक मिथ्यात्व में नहीं आता, एक ऐसी स्थिति में गुजरता है जो न तो सम्यक्त्व से सम्बन्धित होती है और न मिथ्यात्व से। फिर भी पूर्व सम्यक्त्व का यहाँ पर आस्वादन रहता है। अतः इसी अपेक्षा से इस अवस्था को सास्वादन सम्यक्त्व बतलाया गया है। यह भी विशुद्धि की अपेक्षा से गुणस्थान है, गिरने की अपेक्षा से नहीं। पतन तो मोह कर्म के उदय से होता है अतः उदय गुणस्थान नहीं विशुद्धि का जितना अंश है वह गुणस्थान है।
to know more visit…

Advertisements

एक तुम्हीं तो उपवासी हो


जब मैं सोऊं तब भी तुमको नित्य जागते रहना होगा।
जीवन के हर सरल कठिन रस्ते पर साथ विचरना होगा।
गिरुं तो गोदी में ले लेना, गुरुवर तुम तो अविनाशी हो।।
बोया बीज तुम्हीं ने माली, तुम्हीं फलों के आकांक्षी हो।
इतने वर्षों से इस घर में, एक तुम्हीं तो उपवासी हो।।
to read complete poem visit..