मैं PERFECT नहीं हूँ : पीयूष नाहटा


अभी हाल ही में मेरे कार्य, जॉब और अतीत में संघ त्याग के निर्णय को लेकर प्रश्न खड़े किये गए। लोग यह जानना चाहते हैं कि जब मैंने तेरापंथ धर्मसंघ से एक साधु के रूप में सम्बन्ध विच्छेद कर दिया तो उसी संघ में मैं जॉब क्यों कर रहा हूँ।

सबसे पहले तो मैं इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं संघ से अलग हुआ इसका यह मतलब नहीं है कि मेरी संघ से कोई दुश्मनी थी। अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी समझ अधूरी है वे सोचते हैं कि जो अलग हो गया वह दुश्मन है, परन्तु अनेक ऐसे समझदार व्यक्ति भी हैं जो ऐसा नहीं मानते।

संघ साधना की एक आधारभूमि है, मैंने वहां अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष व्यतीत किये। जब मैं संघ से अलग हुआ तब भी संघ के सदस्यों के साथ मेरे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध थे और आज भी हैं। मैंने आचार्यप्रवर को अपने सैद्धांतिक मतभेदों के बारे में बताया और अपनी आस्था के आधार पर जीवन यापन करने की छूट चाही जो कि मेरी नजर में संघ में एक साधु के रूप में रहते हुए संभव नहीं थी। परन्तु मेरे जो भी मतभेद थे वे सैद्धांतिक थे।

मैं आज भी किसी प्रकार की संघ विरोधी प्रवृत्ति में लिप्त नहीं हूँ, न पहले था।

आगम ग्रंथों को मैं आध्यात्म के महान ग्रन्थों के रूप में देखता हूँ, सिर्फ मतभेद इतना ही है कि मैं उन्हें उस तरह प्रमाण नहीं मानता जिस तरह एक संघीय साधु के लिए मानना आवश्यक है। मगर मैं आज भी उनका स्वाध्याय करता हूँ और लगातार उनमें छिपी अनुभूतिपरक साधना-पद्धतियों पर शोध करता रहता हूँ। मैंने कभी आगम ग्रंथों के बारे में नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। ऐसा करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता। उन्हें लिखने वाले महान विद्वान् थे।

उस समय के संसाधनों के आधार पर उन्होंने इस प्रकार की शोध की जो कि अपने आप में महत्वपूर्ण है। परन्तु समय बदला है, अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि अंतरिक्ष-विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषय पर जैन आगमों में विद्यमान मंतव्यों पर पुनर्चिन्तन की अपेक्षा है और भी अनेक ऐसे स्थल हैं जिनकी समीक्षा की जानी चाहिए। क्या प्राचीन आचार्यों ने लिख दिया इसलिए यह उचित है कि हम बिना किसी सोच-विचार के उसे स्वीकार कर लें? और यदि सोच-विचार शुरू कर दिया तो क्या यह आगम-विरोध है?

आगम के संदर्भ में गहन अध्ययन करने वाले विद्वानों ने मुझ पर कभी इस प्रकार का आक्षेप नहीं लगाया कि मेरी सोच आगम-विरोधी है। जो व्यक्ति मेरी सोच को आगम विरोधी कह रहें हैं शायद उन्होंने जैन दर्शन अथवा आगम का सामान्य अध्ययन भी नहीं किया होगा।

मैं सत्य की शोध कर रहा हूँ, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी सामान्य बुद्धि का प्रयोग कर रहा हूँ। मैं गलत भी हो सकता हूँ, परन्तु मुझे गलतियाँ करने से डर नहीं लगता। डर लगता कुछ नहीं करने से। मैं PERFECT भी नहीं हूँ कि मेरी हर बात को माना जाय।

बस इतना ही कहना है कि मैं संघ विरोधी नहीं हूँ, न ही आगम विरोधी हूँ। बस अंध-भक्त मैं किसी का नहीं हूँ, अपना खुद का भी नहीं। यदि मुझे लगता है कि मैं किसी प्रकार के गलत सिद्धांत को पकडे हुए हूँ, तो उसे छोड़ने में हिचकिचाऊँगा नहीं। क्योंकि मैंनें अभी सत्य पाया नहीं है…..

 

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2 Comments on “मैं PERFECT नहीं हूँ : पीयूष नाहटा

  1. क्यों लीपा पोती कर रहे हो, जब सही और ग़लत अपने लिए हो तो क्यों सफ़ायी दे रहे हो. जब सत्य को पाया नहीं तो क्यों ख़ुद को सचवादा करा रहे हो.
    शांत रहो, observe करो ख़ुद को भी और surrounding को भी, देखो कहाँ तक चलते हो, कहाँ थकते हो, कहाँ ख़ुद तक लौट पाते हो.
    बहुत छेद है तुम्हारे वक्तव्य में लेकिन उसे नहीं टच करूँगा, क्योंकि ज़रूरी नहीं समझता.
    All the best.

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  2. Dear Vinod Singhi Ji,
    I think Mr. Piyush is free to delight his speech and freedom to spread the fact he has gained.
    Let me show you the very back where Acharya Bhikshu also departed from his guru and brief defined Terapanth in his terms. Today what you and me are following. May all goes good. But still there is holes in this episode of dharma, When you don’t know, don’t spread shit over. Shutting you mouth or spreading stuff make non-sense .
    Might almighty give all of all the right path to get to Moksha from here.

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