अध्यात्म का साकार स्वरूप : श्रीमती तोली देवी नाहटा

देहातीत अवस्था को उपलब्ध होकर प्रशांत मुद्रा में माँ (तोली देवी नाहटा) को आज घर के आँगन में लेटे हुए देखकर मन विचलित हो उठा। वो तो सदा सजग, सक्रिय और सत्व से ओतःप्रोत नजर आते थे। वैसे वो मेरी दादीसा हैं, मगर बचपन से उन्हें माँ के संबोधन से ही पुकारा है। न सिर्फ मैंने बल्कि सबने। सात भाई और 3 बहनों वाले विस्तृत चतुर्भुज नाहटा के परिवार में आज से लगभग 66 वर्ष पूर्व धनराज जी नाहटा की पत्नी बनकर सबसे छोटी बहू के रूप में आप इस घर के आँगन में आई थी। मात्र 12 वर्ष की नन्ही सी उम्र। सास अथवा ससुर तो नहीं थे मगर 6 जेठ-जेठानियों वाले बड़े परिवार में उसकी कमी कभी खली नहीं होगी। जिस उम्र में अपने आप को भी संभालना मुश्किल होता है, उस उम्र में अपने पिता का घर छोड़कर किसी अनजान व्यक्ति को अपना जीवन-साथी मानकर उसके घर को अपना घरौंदा बना लेना, बेशक क्या असीम ताकत होती थी उस समय की भारतीय नारी में। बहुत जल्द ही घर का बंटवारा हुआ और खुद के बलबूते पर एक घर का समग्र उत्तरदायित्व माँ के नन्हे कन्धों पर आ गया।

आपकी माँ श्रीमती वृद्धिदेवी मूलचंदजी सेठिया ने आपको एक सक्षम व्यक्तित्व के रूप में सिंचन दिया था। न सिर्फ गार्हस्थ्य का गहन प्रशिक्षण आपको मिला था अपितु अध्यात्म के भी गहरे संस्कार आपको मिले थे। वृद्धिदेवी कठोर तपस्विनी थी। उन्होंने जैन धर्म में एक श्राविका के रूप में साधना के जो प्रयोग किये थे, वे आज भी पाठक के ह्रदय को विस्मित कर देते हैं। उन्होंने जीवन के अंतिम काल में 65 दिनों का कठोर तप कर अपनी देह का समत्व भाव के साथ त्याग किया था। “आत्मा-भिन्न, शरीर भिन्न” उनके जीवन का अमोघ मंत्र बन गया था।

एक तपस्विनी की आनुवांशिकी माँ (तोली देवी) को विरासत में मिली थी। अल्प-सुविधा और कठोर परिश्रम वाले वातावरण ने आपको और भी अधिक मजबूत बनाया। अपने जीवन साथी धनराजजी नाहटा के साथ आपने संयम के साथ जीवन यापन करते हुए तीन पुत्र : जेठमल, सुशील और धीरज और एक पुत्री लीला का पालन पोषण किया और उन्हें अच्छे संस्कारों के साथ उन्हें बड़ा किया। सांसारिक जीवन के साथ-साथ उन्होंने अध्यात्म को सदैव शीर्ष पर रखा और 11 वर्षीतप किये। सामायिक, स्वाध्याय, योग, ध्यान, जप, भजन, गुरुसेवा आदि कार्यों में भी आप हमेशा बढ़-चढ़ कर आगे रहते थे। अपने बेटे-बेटी, पोते-पोतियों सभी को आपने हमेशा आध्यात्मिक संस्कारों से सुसंस्कृत बनाया है। भले ही और कुछ ज्ञान हो अथवा नहीं,नवकार मन्त्र, वंदन पाठ, सामायिक पाठ, 24 तीर्थंकर एवं 11 आचार्यों के नाम आदि का अवबोध बच्चों को करवाना आपकी नियमित क्रिया थी।

जब आचार्य महाप्रज्ञजी ने प्रेक्षाध्यान का प्रणयन किया तब से आपकी रूचि ध्यान एवं योग साधना में भी विशेष हो गयी। मुझे स्मरण है कि मेरी प्रथम योग-शिक्षक माँ ही रही है। साथ ही साथ सूर्य किरण चिकित्सा के प्रयोगों के माध्यम से वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का प्रथम अवबोध भी माँ ने ही मुझे करवाया। आज Evo4soul Meditation Resort में जो योग, ध्यान एवं आध्यात्मिक चिकित्सा के प्रयोग संचालित हो रहे हैं उनका बीज वपन माँ ने ही किया था, ऐसा मेरा मानना है।

पिछले कुछ समय से माँ शारीरिक तौर पर स्वस्थ नहीं थे। मगर जब भी मैं उनके पास जाता तो उनका हमेशा एक ही अनुरोध होता कि मुझे कोई भजन गाकर सुनाओ। पापा (जेठमल जी), सुशील काका, धीरज काका, लीला भुआ, मम्मी (लीला देवी), संजना चाची, शांति चाची, मैं, अरिहंत, अमित, रजत, राजकिशोर, बबीता, प्रज्ञा, राजश्री, अंकिता, कविता, नेहा तथा नयी पीढ़ी के अंशिका, मेहुल, दिवा, चिराग, नव्या, मुस्कान आदि सभी को वो धार्मिक भजन, जाप आदि की प्रेरणा देते रहते थे। अपनी माँ का जीवन मंत्र “आत्मा भिन्न-शरीर भिन्न” उनका भी जीवन मंत्र बना। उस असहाय वेदना की अवस्था में ॐ भिक्षु का जप उनके दर्द की पीड़ा को कम करने में बड़ा कारगर रहा। सोडियम की कमी के चलते उनकी स्मृति काफी कमजोर हो गयी थी, मगर उनको भजन तब भी याद थे। जब भी कोई भजन गाता वे साथ साथ गुनगुनाने लगते।

जीवन के युद्धक्षेत्र में हर कोई उतरता है, मगर विजय कोई-कोई ही हासिल कर पाता है। मैं माँ को एक समुराई योद्धा के रूप में देखता हूँ। उनके द्वारा दिए गए अनमोल संस्कार और उनके साथ बिताये पलों से मिले अनुभव मेरे जीवन की पूँजी रहेंगें। नाहटा परिवार सौभाग्यशाली था कि एक ऐसी दिव्य-आत्मा ने अपना जीवन बिताने के लिए इस घर का चयन किया। आज वो सशरीर हमारे बीच नहीं हैं मगर हर सदस्य के भीतर कहीं न कहीं उनका प्रतिबिम्ब नजर आता है। अतः यह कह सकते हैं कि वे अब एक नहीं अपितु अनेक हो चुके हैं। उनके विस्तार की इस यात्रा का अभिनन्दन करते हुए मैं यह कामना करता हूँ कि वे अपने विकास की इस यात्रा पर निरंतर आगे बढ़ते रहें और अपनी सर्वोच्च मंजिल वीतरागता को प्राप्त करें।

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