Category: wisdom

Self Love : A powerful healing technique

After brushing your teeth say “I love you”.
Before bed time 30 min. –Me time—.
Once per day “Compliment another guy”.
Once in a day “Take your meal with awareness”.
Once in a day “love your complete body”.
30 minutes video session by Piyush

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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग 5)

चौदह गुणस्थान में नवमें तक सात कर्मों का (आयुष्य छोड़ कर) निरन्तर बन्धन होता है। दसवें में (आयुष्य, मोह बिना) छह कर्मों का निरन्तर बन्धन होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें में एक सात वेदनीय कर्म का बन्धन होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर सातवें तक आयुष्य का बन्धन होता है।
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-4)

ज्ञानावरणीय कर्म के उदय एवं क्षयोपशम से ज्ञान में तरतमता पैदा होती है और उसके कारण ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं। मति, श्रुत, अवधि तथा मनः पर्यव ये इसके मुख्य भेद होते हैं तथा अवग्रह, ईहा आदि मति के, अंग प्रविष्ट, अंग बाह्य आदि श्रुत के, हीयमान वर्द्धमान आदि अवधि के, ऋजुमति, विपुलमति आदि मनः पर्यव के अवान्तर भेद प्रभेदों की संख्या काफी बड़ी हो जाती है।
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-3)

इस गुणस्थानवर्ती व्यक्ति को क्षायोपशमिक सम्यक्त्व नहीं होती। क्योंकि वह सातवें गुणस्थान से आगे नहीं हो सकती, यहाँ औपशमिक या क्षायिक सम्यक्त्व होती है। उपशम श्रेणी लेने वाले के उक्त दोनों प्रकार की सम्यक्त्व हो सकती है क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व होते हुए भी उपशम श्रेणी ली जा सकती है, उपशम श्रेणी वाला मोह कर्म की प्रकृतियों को दबाता जाता है।
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-2)

वृक्ष से गिरने वाला फल जब तक पृथ्वी पर नहीं आ जाता तब तक वह इस स्थिति मे रहता है जो वृक्ष और पृथ्वी दोनों से ही सम्बन्धित नहीं होती। वैसे ही सम्यक्त्व से च्युत होने वाला जब तक मिथ्यात्व में नहीं आता, एक ऐसी स्थिति में गुजरता है जो न तो सम्यक्त्व से सम्बन्धित होती है और न मिथ्यात्व से। फिर भी पूर्व सम्यक्त्व का यहाँ पर आस्वादन रहता है। अतः इसी अपेक्षा से इस अवस्था को सास्वादन सम्यक्त्व बतलाया गया है। यह भी विशुद्धि की अपेक्षा से गुणस्थान है, गिरने की अपेक्षा से नहीं। पतन तो मोह कर्म के उदय से होता है अतः उदय गुणस्थान नहीं विशुद्धि का जितना अंश है वह गुणस्थान है।
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एक तुम्हीं तो उपवासी हो

जब मैं सोऊं तब भी तुमको नित्य जागते रहना होगा।
जीवन के हर सरल कठिन रस्ते पर साथ विचरना होगा।
गिरुं तो गोदी में ले लेना, गुरुवर तुम तो अविनाशी हो।।
बोया बीज तुम्हीं ने माली, तुम्हीं फलों के आकांक्षी हो।
इतने वर्षों से इस घर में, एक तुम्हीं तो उपवासी हो।।
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जैन शास्त्रों में अष्ट मंगल

मंगल शब्द का अर्थ है— मं पापं गायतीति मंगलम् ·जो पापों अनिष्टों को नष्ट करे वह मंगल है। परमार्थ से तो अरिहंत, सिद्ध, साधु और केवली प्रणीत धर्म (चत्तारिमंगलं पाठ) ये चार ही मंगल बताये हैं, किन्तु उपचार से उपयुत्र्तâ अष्ट द्रव्योें को भी मंगल कह दिया गया है, क्योंकि ये अरिहंत के सान्निध्य को प्राप्त हुए हैं। आठ की संख्या ठाठ (वैभव) की सूचक है।
अरिहंत के ४६ गुणों में अष्टमहाप्रातिहार्य (अशोक वृक्ष सुरपुष्प वृष्टि, दुंदुभि, सिंहासन, दिव्यध्वनि, छत्रत्रय, चामर युगल प्रभामंडल) बताये हैं वे इन अष्ट मंगलों से जुदा हैं।
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14 rajlok: an overview

One raju is a very large distance whose exact volue is difficult to determine. One estimate puts its volue equal to 1.45×1021 miles but this is not generally accepted. The actual value may be much higher.
A brief introduction about jain cosmology
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बारह भावना (श्री भूधरदासजी कृत) आश्रव का निरोध और संवर के उपाय

जैनधर्म, भावना पर आधारित है| जीवन की प्रत्येक क्रिया में भावना मूल है| यदि किसी मनुष्य की भावना राग – द्वेष से युक्त है तो उसकी क्रिया में पापबंध होता है और जब उसकी भावनाएँ विशुध्द हैं तो उसकी क्रिया में पुण्यबंध होता है|…

गुणस्थान मीमांसा – मुनिश्री राजकरण जी (भाग-1)

जैन तत्व दर्शन में गुणस्थान का बहुत बड़ा स्थान है अतः गुणस्थान क्या है इसका संक्षिप्त विवेचन यहाँ पर करना है। जैन सिद्धान्त दीपिका में आचार्य श्री तुलसी ने कहा है कि “आत्मनः क्रमिक विशुद्धि गुणस्थानम्” अर्थात् कर्मों के क्षय, क्षयोपशम और उपशम से पैदा होने वाले पवित्र आत्म-गुणों के क्रमिक आविर्भाव को गुणस्थान कहते है। हमारा लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। ये गुणस्थान उस तक पहुँचने के लिए सोपान हैं।
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Flood of happiness

Dear friends,                          How do you create a Flood of happiness???                          How do you remove the darkness which is apparently felt everywhere? …

What do we Teach our Children

Do you know what you are

U are a marvel

U are Unique

In all the years that have passed

there hase never been another child like U

Your legs, your arms, your clever fingers,

the way you move…….