Tag: #philosophy

खड़की, पुणे में भक्तामर एवं चक्रा हीलिंग वर्कशॉप का सफल आयोजन

कोरोना के भयावह काल में अध्यात्मिक सकारात्मकता का एक नया प्रयोग….

फरीदाबाद में भक्तामर कार्यशाला का सफल आयोजन।

*फरीदाबाद में आयोजित भक्तामर कार्यशाला के अन्तर्गत दिए गए वक्तव्य अब यूट्यूब पर उपलब्ध।*
भक्तामर जैन परंपरा का एक महत्वपूर्ण स्तोत्र है। इसके आध्यात्मिक और वैज्ञानिक पक्षों सहित इसकी चिकित्सा संबंधी उपयोगिताओं पर अगणित शोध कार्य हो चुके हैं।

सिद्ध हों अवतरित मुझमें

महावीर जयंती पर ढेर सारी शुभकामनाओं सहित एक कविता सादर समर्पित

जब जिंदगी का सूरज ना उगे तो खुद सूरज बन जाएं….

जिंदगी हमें बहुत सारे अवसर देती हैं खुश होने के लिए.. जरूरत है कि हम अपनी आंखें खुली रखें और उन पलों की खुशी मनाएं..

प्यार हुआ चुपके से……

खुद से प्यार होते ही जिंदगी के कुछ तौर-तरीके बदल गए। क्योंकि अब मेरी मंज़िल बदल चुकी थी इसलिए मेरा रास्ता भी बदल गया। ऐसा नहीं है कि इस रास्ते पर सिर्फ फूल ही फूल थे, लेकिन चूंकि यह मेरा बनाया हुआ रास्ता था इसलिए इस रास्ते पर आने वाले कांटे भी फूलों से कम नहीं लगते थे।

एक गलती हो गई मुझसे….

एक गलती हो गई मुझसे तुम्हारे प्रति। मैं याद करता हूं उन पलों को जिन पलों में … मैंने खुद को दोषी ठहराया है याद करता हूं मैं उन पलों को जिन पलों में ………. मैंने खुद को रोता हुआ पाया है मैंने महसूस… Continue Reading “एक गलती हो गई मुझसे….”

5 शक्तिशाली मंत्र जो बदल सकते हैं हमारी दुनिया

हमारे शब्द हमारे लिए शाप भी बन सकते हैं और वरदान भी बन सकते हैं क्योंकि हमारे शब्द एक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने शब्दों की ऐसी ताकत को समझा और मंत्र शास्त्र का निर्माण किया। समय के साथ मंत्र हमारे जीवन का एक रहस्यपूर्ण हिस्सा बनते चले गए।

LOVE YOU ZINDAGI…LOVE ME ZINDAGI..!

ज़िन्दगी परिवर्तन के दौर से गुजरती है, कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे हमारा अपनी ही ज़िन्दगी पर complete control नहीं है। ऐसे समय में लगता है That the complete universe is working against you.
मगर ऐसा होता नहीं है….
Dear Zindagi ने कुछ ऐसा ही सिखाया

गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग 5)

चौदह गुणस्थान में नवमें तक सात कर्मों का (आयुष्य छोड़ कर) निरन्तर बन्धन होता है। दसवें में (आयुष्य, मोह बिना) छह कर्मों का निरन्तर बन्धन होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें में एक सात वेदनीय कर्म का बन्धन होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर सातवें तक आयुष्य का बन्धन होता है।
to know more visit

गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-4)

ज्ञानावरणीय कर्म के उदय एवं क्षयोपशम से ज्ञान में तरतमता पैदा होती है और उसके कारण ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं। मति, श्रुत, अवधि तथा मनः पर्यव ये इसके मुख्य भेद होते हैं तथा अवग्रह, ईहा आदि मति के, अंग प्रविष्ट, अंग बाह्य आदि श्रुत के, हीयमान वर्द्धमान आदि अवधि के, ऋजुमति, विपुलमति आदि मनः पर्यव के अवान्तर भेद प्रभेदों की संख्या काफी बड़ी हो जाती है।
to know more visit

गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-2)

वृक्ष से गिरने वाला फल जब तक पृथ्वी पर नहीं आ जाता तब तक वह इस स्थिति मे रहता है जो वृक्ष और पृथ्वी दोनों से ही सम्बन्धित नहीं होती। वैसे ही सम्यक्त्व से च्युत होने वाला जब तक मिथ्यात्व में नहीं आता, एक ऐसी स्थिति में गुजरता है जो न तो सम्यक्त्व से सम्बन्धित होती है और न मिथ्यात्व से। फिर भी पूर्व सम्यक्त्व का यहाँ पर आस्वादन रहता है। अतः इसी अपेक्षा से इस अवस्था को सास्वादन सम्यक्त्व बतलाया गया है। यह भी विशुद्धि की अपेक्षा से गुणस्थान है, गिरने की अपेक्षा से नहीं। पतन तो मोह कर्म के उदय से होता है अतः उदय गुणस्थान नहीं विशुद्धि का जितना अंश है वह गुणस्थान है।
to know more visit…

गुणस्थान मीमांसा – मुनिश्री राजकरण जी (भाग-1)

जैन तत्व दर्शन में गुणस्थान का बहुत बड़ा स्थान है अतः गुणस्थान क्या है इसका संक्षिप्त विवेचन यहाँ पर करना है। जैन सिद्धान्त दीपिका में आचार्य श्री तुलसी ने कहा है कि “आत्मनः क्रमिक विशुद्धि गुणस्थानम्” अर्थात् कर्मों के क्षय, क्षयोपशम और उपशम से पैदा होने वाले पवित्र आत्म-गुणों के क्रमिक आविर्भाव को गुणस्थान कहते है। हमारा लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। ये गुणस्थान उस तक पहुँचने के लिए सोपान हैं।
to know more visit

%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this:
%d bloggers like this: