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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग 5)


चौदह गुणस्थान में नवमें तक सात कर्मों का (आयुष्य छोड़ कर) निरन्तर बन्धन होता है। दसवें में (आयुष्य, मोह बिना) छह कर्मों का निरन्तर बन्धन होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें में एक सात वेदनीय कर्म का बन्धन होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर सातवें तक आयुष्य का बन्धन होता है।
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-4)


ज्ञानावरणीय कर्म के उदय एवं क्षयोपशम से ज्ञान में तरतमता पैदा होती है और उसके कारण ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं। मति, श्रुत, अवधि तथा मनः पर्यव ये इसके मुख्य भेद होते हैं तथा अवग्रह, ईहा आदि मति के, अंग प्रविष्ट, अंग बाह्य आदि श्रुत के, हीयमान वर्द्धमान आदि अवधि के, ऋजुमति, विपुलमति आदि मनः पर्यव के अवान्तर भेद प्रभेदों की संख्या काफी बड़ी हो जाती है।
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-3)


इस गुणस्थानवर्ती व्यक्ति को क्षायोपशमिक सम्यक्त्व नहीं होती। क्योंकि वह सातवें गुणस्थान से आगे नहीं हो सकती, यहाँ औपशमिक या क्षायिक सम्यक्त्व होती है। उपशम श्रेणी लेने वाले के उक्त दोनों प्रकार की सम्यक्त्व हो सकती है क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व होते हुए भी उपशम श्रेणी ली जा सकती है, उपशम श्रेणी वाला मोह कर्म की प्रकृतियों को दबाता जाता है।
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-2)


वृक्ष से गिरने वाला फल जब तक पृथ्वी पर नहीं आ जाता तब तक वह इस स्थिति मे रहता है जो वृक्ष और पृथ्वी दोनों से ही सम्बन्धित नहीं होती। वैसे ही सम्यक्त्व से च्युत होने वाला जब तक मिथ्यात्व में नहीं आता, एक ऐसी स्थिति में गुजरता है जो न तो सम्यक्त्व से सम्बन्धित होती है और न मिथ्यात्व से। फिर भी पूर्व सम्यक्त्व का यहाँ पर आस्वादन रहता है। अतः इसी अपेक्षा से इस अवस्था को सास्वादन सम्यक्त्व बतलाया गया है। यह भी विशुद्धि की अपेक्षा से गुणस्थान है, गिरने की अपेक्षा से नहीं। पतन तो मोह कर्म के उदय से होता है अतः उदय गुणस्थान नहीं विशुद्धि का जितना अंश है वह गुणस्थान है।
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जैन शास्त्रों में अष्ट मंगल


मंगल शब्द का अर्थ है— मं पापं गायतीति मंगलम् ·जो पापों अनिष्टों को नष्ट करे वह मंगल है। परमार्थ से तो अरिहंत, सिद्ध, साधु और केवली प्रणीत धर्म (चत्तारिमंगलं पाठ) ये चार ही मंगल बताये हैं, किन्तु उपचार से उपयुत्र्तâ अष्ट द्रव्योें को भी मंगल कह दिया गया है, क्योंकि ये अरिहंत के सान्निध्य को प्राप्त हुए हैं। आठ की संख्या ठाठ (वैभव) की सूचक है।
अरिहंत के ४६ गुणों में अष्टमहाप्रातिहार्य (अशोक वृक्ष सुरपुष्प वृष्टि, दुंदुभि, सिंहासन, दिव्यध्वनि, छत्रत्रय, चामर युगल प्रभामंडल) बताये हैं वे इन अष्ट मंगलों से जुदा हैं।
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14 rajlok: an overview


One raju is a very large distance whose exact volue is difficult to determine. One estimate puts its volue equal to 1.45×1021 miles but this is not generally accepted. The actual value may be much higher.
A brief introduction about jain cosmology
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