LOVE YOU ZINDAGI…LOVE ME ZINDAGI..!


आज मैं चर्चा करने जा रहा हूँ एक movie की, जिसने आज की मेरी दुपहरी में एक अनूठी खुशबू भर दी….
और ये movie थी “Dear zindagi”
ज़िन्दगी परिवर्तन के दौर से गुजरती है, कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे हमारा अपनी ही ज़िन्दगी पर complete control नहीं है। ऐसे समय में लगता है That the complete universe is working against you.
मगर ऐसा होता नहीं है….
Dear Zindagi ने कुछ ऐसा ही सिखाया
खास तौर पर इस movie के एक song ने तो दिल ही छू लिया, लव यू ज़िन्दगी…
उस गीत की कुछ पंक्तियाँ शेयर करने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ…आशा है ये पंक्तियाँ आपको प्रेरणा देंगी

जो दिल से लगे
उसे कह दो हाय हाय हाय
जो दिल न लगे
उसे कह दो बाय बाय बाय
आने दो आने दो दिल में आ जाने दो
कह दो मुस्कराहट को हाय हाय हाय हाय
जाने दे जाने दो दिल से चले जाने दो
कह दो घबराहट को बाय बाय बाय बाय बाय बाय..
लव यू ज़िन्दगी लव यू ज़िन्दगी लव यू ज़िन्दगी लव यू ज़िन्दगी

 पूरी movie देखने के बाद सिर्फ इस song को ही तीन-चार बार सुन डाला, ऐसा लगा आस पास पड़ी हर एक चीज थोड़ी ज्यादा खुबसूरत हो गयी है। इस movie में मनोचिकित्सक का रोल करने वाले डॉ. जहाँगीर (शाहरुख़ खान) ने अपनी पेशेंट काइरा को एक example दिया चेयर्स के बारे में। जब हम एक दुकान में चेयर खरीदने जाते हैं तो कई सारी चेयर try कर के देखते हैं, फिर उनमें से एक चेयर choose करते हैं। पहली बार किसी चेयर को try किया इसका यह मतलब नहीं कि उसी को जीवन भर ढोते रहेंगें।
जिंदगी में हमारे पास चुनने के लिए बहुत कुछ होता है। हम गलती भी करते हैं चुन लेने में और और जब एक बार किसी चीज को चुन लिया तो उसको छोड़ना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। हम कितने भी अनुभवी हो जाएँ, इस तरह की गलतियाँ पूरी तरह से नहीं छूटती। गलतियां ही तो हमें इन्सान बनाती हैं….
इसलिए जब लगे कि कुछ ऐसा चुन लिया है जो जिंदगी में बोझ बन रहा है, तो पुनर्चिन्तन करना बुरा नहीं है।

जो दिल से लगे
उसे कह दो हाय हाय
जो दिल न लगे
उसे कह दो बाय बाय

It seems quite simple.. but it’s not.
काफी मुश्किल आती है, खुद से ही लड़ना पड़ता है….पर

जाने दे जाने दो दिल से चले जाने दो
कह दो घबराहट को बाय बाय

Because I LOVE YOU! ZINDAGI….LOVE YOU! ZINDAGI

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खुद के साथ Dating पर गए हो कभी?


अपने उन प्यार भरे लम्हों को याद कीजिये जो आपने अपने जीवन साथी के संग बिताये हैं। वो पल जब आप पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति से मिले थे जिसको आप अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर सकते हैं, जिसके साथ अपना हर राज शेयर कर सकते हैं, जिसको खुश रखने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं।

समय बीत जाता है और वो पल एक खुशनुमा याद बनकर रह जाते हैं,  जिंदगी की भागदौड़ के साथ वे पल कहीं पीछे छूट जाते हैं। बच्चे, मित्र, व्यवसाय/नौकरी आदि अनेक चीजें होती हैं जिन्हें हमारा वक्त चाहिए होता है; और कभी कोई वक्त मिल भी जाये तो उनका मूड नहीं बन पाता….. जिनके साथ वो पल बिताने का मन होता है।

ऐसे समय में क्यों न खुद को समय दिया जाय?????

क्यों न कुछ ऐसा किया जाय कि वो पल जिंदगी के बेहतरीन पल बन जाएँ?

तो पेश हैं कुछ Simple-Ideas जो follow कर के खुद के साथ कुछ हसीं पल बिता सकते हैं

किसी खाली दिन में अकेले ही किसी अनजान रास्ते पर अकेले ही निकल पड़ें। ऐसे रास्ते का चुनाव करें जिसमें कोई परिचित व्यक्ति के मिलने की संभावना न हो। अच्छा हो कि शहर से दूर कोई प्राकृतिक स्थल हो या कोई छोटा सा गाँव। शांत भाव से चलते रहें, बिना किसी हड़बड़ी के, आसपास के दृश्यों का मजा लेते हुए। कहीं पहुंचना नहीं है बस खुद तक ही जाना है। अगर अकेलापन महसूस हो तो किसी पेड़ के पास जाकर बैठ जाएँ और उसके साथ अपनी जिंदगी शेयर करें, उसके पत्तों की चरमराहट सुनें और उसमें अपने उत्तर खोजें। या फिर मौन-भाव से उसे निहारते रहें, जैसे अपने प्रेमी की आँखों में झांक रहे हों।

या फिर धरती-मां की प्यारी गोदी में लेट जाएँ और उसकी प्यार भरी ऊर्जा को अपनी देह में प्रवाहित होते हुए महसूस करें। अपने सारे दर्द और तकलीफों को उसी तरह धरती को सुना दें जैसे कभी अपनी जन्मदात्री मां को सुनाया करते थे। उसकी धडकनों को महसूस करें और पूरी तरह खुद को समर्पित कर दें।

कभी लेटे-लेटे ही ऊपर फैले आकाश को निहारें और बादलों के बनते बदलते आकारों को निहारते रहें, प्रकृति की वे अनुपम कलाएं जो किसी फ़िल्मी दृश्य से कम नहीं है।

थोड़ा समय इस ट्रिप में सेवा को भी दें। रास्ते के कुछ कांटे बुहार दें, किसी पेड़ को पानी पिला दें, अगर संभव हो तो कोई नया पौधा लगा दें। बाकी जब आप उस जगह होंगें तो ideas आपको खुद-ब-खुद मिल जायेंगे।

बस एक बात का ध्यान रखें, अपने स्मार्ट-फ़ोन को यथासंभव कम से कम यूज़ करें, अगर हो सके तो उसे घर पर ही छोड़ आयें, या फिर नेट ऑफ करके कॉल्स को साइलेंट मोड पर कर दें। जैसे आपका प्यार dating के दौरान डिस्टर्बेंस पसंद नहीं करेगा, वैसे ही प्रकृति भी उसे नापसंद करेगी।

Have a good day.

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मैं PERFECT नहीं हूँ : पीयूष नाहटा


अभी हाल ही में मेरे कार्य, जॉब और अतीत में संघ त्याग के निर्णय को लेकर प्रश्न खड़े किये गए। लोग यह जानना चाहते हैं कि जब मैंने तेरापंथ धर्मसंघ से एक साधु के रूप में सम्बन्ध विच्छेद कर दिया तो उसी संघ में मैं जॉब क्यों कर रहा हूँ।

सबसे पहले तो मैं इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं संघ से अलग हुआ इसका यह मतलब नहीं है कि मेरी संघ से कोई दुश्मनी थी। अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी समझ अधूरी है वे सोचते हैं कि जो अलग हो गया वह दुश्मन है, परन्तु अनेक ऐसे समझदार व्यक्ति भी हैं जो ऐसा नहीं मानते।

संघ साधना की एक आधारभूमि है, मैंने वहां अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष व्यतीत किये। जब मैं संघ से अलग हुआ तब भी संघ के सदस्यों के साथ मेरे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध थे और आज भी हैं। मैंने आचार्यप्रवर को अपने सैद्धांतिक मतभेदों के बारे में बताया और अपनी आस्था के आधार पर जीवन यापन करने की छूट चाही जो कि मेरी नजर में संघ में एक साधु के रूप में रहते हुए संभव नहीं थी। परन्तु मेरे जो भी मतभेद थे वे सैद्धांतिक थे।

मैं आज भी किसी प्रकार की संघ विरोधी प्रवृत्ति में लिप्त नहीं हूँ, न पहले था।

आगम ग्रंथों को मैं आध्यात्म के महान ग्रन्थों के रूप में देखता हूँ, सिर्फ मतभेद इतना ही है कि मैं उन्हें उस तरह प्रमाण नहीं मानता जिस तरह एक संघीय साधु के लिए मानना आवश्यक है। मगर मैं आज भी उनका स्वाध्याय करता हूँ और लगातार उनमें छिपी अनुभूतिपरक साधना-पद्धतियों पर शोध करता रहता हूँ। मैंने कभी आगम ग्रंथों के बारे में नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। ऐसा करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता। उन्हें लिखने वाले महान विद्वान् थे।

उस समय के संसाधनों के आधार पर उन्होंने इस प्रकार की शोध की जो कि अपने आप में महत्वपूर्ण है। परन्तु समय बदला है, अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि अंतरिक्ष-विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषय पर जैन आगमों में विद्यमान मंतव्यों पर पुनर्चिन्तन की अपेक्षा है और भी अनेक ऐसे स्थल हैं जिनकी समीक्षा की जानी चाहिए। क्या प्राचीन आचार्यों ने लिख दिया इसलिए यह उचित है कि हम बिना किसी सोच-विचार के उसे स्वीकार कर लें? और यदि सोच-विचार शुरू कर दिया तो क्या यह आगम-विरोध है?

आगम के संदर्भ में गहन अध्ययन करने वाले विद्वानों ने मुझ पर कभी इस प्रकार का आक्षेप नहीं लगाया कि मेरी सोच आगम-विरोधी है। जो व्यक्ति मेरी सोच को आगम विरोधी कह रहें हैं शायद उन्होंने जैन दर्शन अथवा आगम का सामान्य अध्ययन भी नहीं किया होगा।

मैं सत्य की शोध कर रहा हूँ, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी सामान्य बुद्धि का प्रयोग कर रहा हूँ। मैं गलत भी हो सकता हूँ, परन्तु मुझे गलतियाँ करने से डर नहीं लगता। डर लगता कुछ नहीं करने से। मैं PERFECT भी नहीं हूँ कि मेरी हर बात को माना जाय।

बस इतना ही कहना है कि मैं संघ विरोधी नहीं हूँ, न ही आगम विरोधी हूँ। बस अंध-भक्त मैं किसी का नहीं हूँ, अपना खुद का भी नहीं। यदि मुझे लगता है कि मैं किसी प्रकार के गलत सिद्धांत को पकडे हुए हूँ, तो उसे छोड़ने में हिचकिचाऊँगा नहीं। क्योंकि मैंनें अभी सत्य पाया नहीं है…..

 

जैन धर्म में सरस्वती उपासना


भारत में देवी उपासना का क्रम अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। देवी को शक्ति स्वरुप माना गया और शक्ति के अनेक रूपों में एक रूप विद्या का भी है। इसे ही सरस्वती का नाम दे दिया गया। देवी स्तोत्र में एक स्थान पर लिखा गया है-

या देवी सर्वभूतेषु, विद्यारूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।

जैन धर्म में यूं तो वीतराग एवं पञ्च परमेष्ठि को ही वंदनीय माना गया, परन्तु फिर भी देव गति के अस्तित्व को माना गया, वहीं उत्तरकालीन तंत्र ग्रंथों में सोलह प्रकार की विद्या देवियों के अस्तित्व पर भी चर्चा की गई है।

सरस्वती साधना को ज्ञान के विकास हेतु काफी महत्व दिया जाता रहा है और इसके असर से जैन परम्परा भी अछूती नहीं रही। कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र ने भी अपनी मुनि अवस्था में सरस्वती उपासना की ऐसा उल्लेख मिलता है। वहीं आचार्य वृद्धवादी, जिन्होंने ढलती वय में दीक्षा ली, ने भी ज्ञान के प्रति अपनी प्रबल प्यास को शांत करने हेतु 21 दिन के उपवास के साथ सरस्वती साधना की।

जैन परम्परा में सरस्वती की साधना से संबंधित अनेक मंत्र उपलब्ध हैं, जिनमें से दो मंत्र मुझे अत्यन्त प्रिय हैं:-

1. ओम् ऐम् नमः

2. ओम् णमो अणाइनिहणे तित्थयर पगासिए गणहरेहिं अणुमन्निए द्वादशांग-चतुर्दशपूर्वधारिणी श्रुतिदेवते सरस्वती अवतर अवतर सत्यवादिनी हुं फट् स्वाहा।

इनमें जो प्रथम मंत्र है, वह एक प्रकार का बीज मंत्र है। मैंने ऐसा महसूस किया है कि इस मन्त्र के उच्चारण के दौरान मस्तिष्क के फ्रंटल लोब और हाइपोथेलेमस एरिया में कम्पन बढ़ जाता है। एकाग्रता की कमी का एक कारण है फ्रंटल लोब की अल्प-सक्रियता। वहीँ हाइपोथेलेमस एरिया हमारे अनुभूतिपरक ज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऐसा संभव है कि इस मन्त्र का निर्माण करने वाले आचार्यों/मंत्रविदों ने इस प्रक्रिया पर ध्यान दिया हो! वैसे इस विषय पर शोध की गुंजाइस है।
दूसरा मन्त्र सरस्वती को एक देवी के रूप में न देखकर श्रुतज्ञान के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित करता है। कितना सुन्दर पाठ है। “अनादिनिधन, तीर्थंकरों द्वारा प्रकाशित, गणधरों द्वारा मान्य, द्वादशांग-चतुर्दश पूर्व को धारण करने वाली सरस्वती जो कि सत्यवादिनी है वह मुझमें उतरे” इस भाव के साथ इस मन्त्र का जप किया जाये तो सहज ही एक सुखद अहसास होता है।

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वैसे मैं मन्त्र से सम्बंधित देवी-देवताओं को एक भाव-ऊर्जा के रूप में देखता हूँ। मुझे लगता है कि देव-गति के देवता और मन्त्र-देवता भिन्न-भिन्न हैं। इस सन्दर्भ में यदि आपके अपने कोई विचार हों तो कृपया मुझे अवगत करवाएं। आपके comments का मुझे इंतजार रहेगा…

आधुनिक युग का पूणिया श्रावक : रामसेवक पाल


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रामसेवक पाल

जन्म से जैन कहलाने वाले अनेक लोग हैं, मगर समझ-बूझ कर जैन बनने वाले और जैन सिद्धांतों का ह्रदय से पालन करने वाले विरले ही मिलते हैं। आज हम चर्चा करने जा रहें हैं एक ऐसे शख्स की जो दिखने में अत्यंत साधारण नजर आते हैं, मगर उनकी साधना अचंभित करती है और आगम युग के पूणिया श्रावक की याद दिलाती है।

जन्म से उत्तरप्रदेश के निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के रामसेवक पाल वर्त्तमान में मुंबई रहते हैं। इन्होनें लगभग पंद्रह वर्ष पहले जैन तेरापंथ संघ के आचार्य श्री तुलसी के शिष्य मुनि श्री रविन्द्र कुमार जी के पास जैन धर्म स्वीकार किया था।

व्यावसायिक दृष्टि से घर घर घूमकर गुलाब-जामुन बेचने वाले रामसेवक बिना सामायिक किये मुँह में पानी भी नहीं लेते। रात्रि-कालीन शिफ्ट में काम करने के कारण इनकी सुबह की दिनचर्या काफी late शुरू हो पाती है और अपनी अनेकानेक अपरिहार्य परिस्थितिओं के कारण इन्हें सामायिक करते करते शाम भी हो जाती है, परन्तु अपने नियम धर्म को लेकर ये काफी दृढ रहते हैं।

जैन होने के नाते अनेक श्रावक इन्हें आर्थिक सहयोग देने का प्रयास भी करते हैं , परन्तु स्वावलम्बी विचारधारा का अनुसरण करने वाले रामसेवक केवल खुद की मेहनत पर ही भरोसा रखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये प्रतिमाह दो उपवास भी करते हैं, साथ ही साथ इनकी स्वाध्याय में अच्छी रूचि है। अपने व्यावसायिक कार्य से समय निकाल कर अब तक अनेक पुस्तकें पढ़ चुके हैं।

हाल ही में ठाणे तेरापंथ भवन में आचार्य श्री महाश्रमण जी के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री महेंद्र कुमार जी के दर्शनार्थ आये तब आपसे मुलाकात हुई। आपकी कथा ने मुझे काफी प्रभावित किया, तब मैंने आपसे यह जानकारी शेयर करने की अनुज्ञा ली। स्वभाव से अत्यंत संकोची रामसेवक बड़ी मुश्किल से अपनी फोटो खिंचवाने हेतु तैयार हुए।

और हाँ, आपसे चर्चा के बाद मैंने गुलाब-जामुन का भी रसास्वादन किया, जो कि विशेष रूप से रोज-फ्लेवर वाले थे।

स्नान के लिए करें आगम सूत्रों का प्रयोग…


भारतीय संस्कृति में साधना और शुद्धि के बीच एक गहरा सम्बन्ध निरुपित किया गया है। प्रातःकालीन पूजा मन्त्र-जप आदि अनुष्ठानों से पूर्व स्नान को प्रायः अनिवार्य अंग की तरह व्याख्यायित किया गया है। जल में जीवन की घोषणा करने वाली जैन परंपरा में भी मंदिरों में पूजा-विधि के साथ स्नान-शुद्धि को अनिवार्य माना गया। शरीरिक-शुद्धि के लिहाज से उसकी उपयोगिता निर्विवाद है, पर क्या आत्म-शुद्धि के लिए भी यह (स्नान-शुद्धि) उतनी ही उपयोगी है?

यह सही है कि स्नान करने के पश्चात हम शारीरिक रूप से खुद को तरोताजा महसूस करते हैं। आलस्य का प्रभाव भी कुछ हद तक कम हो जाता है। वहीँ जैन परंपरा में ज्ञान के अतिचारों में वर्णित अस्वाध्याय के कारणों— यथा मल-मूत्र, वीर्य रक्त आदि अशुभ तत्वों की विशुद्धि भी हो जाती है, जिनके रहने पर स्वाध्याय नहीं किया जा सकता।

जैन आगमों में तीर्थ-स्नान से सम्बंधित एक प्रश्न के उत्तर में भाव स्नान का बेहद खूबसूरती से वर्णन किया गया है—

धम्मे हरए बम्भे संतितित्थे, अणाविले अत्तपसन्नलेस्से।

जहिंसि ण्हासो विमलो विसुद्धो, सुसीइभूओ पजहामि दोषं।।

 

अर्थ- अकलुषित, आत्मा को प्रसन्न करने वाली शुभ लेश्या रूप धर्म, जलाशय है और ब्रह्मचर्य रूप शांति तीर्थ है। जहाँ स्नान करके मैं विमल, विशुद्ध और शीतल होकर पाप को दूर करता हूँ।

 

एयं सिणाणं कुसलेहि दिट्ठं, महासिणाणं इसिणं पसत्थं।

जहिंसि ण्हाया विमला विसुद्धा, महारिसी उत्तम ठाण पत्तए।।

 

अर्थ- तत्त्व ज्ञानियों ने यह स्नान देखा है। यही वह महास्नान है जिसकी ऋषियों ने प्रशंसा की है। जिस स्नान से महर्षि लोग विमल और विशुद्ध होकर उत्तम स्थान— मोक्ष को प्राप्त हुए हैं।

उत्तराध्ययन12/46-47

हरिकेशी मुनि द्वारा प्रतिपादित इस भाव-स्नान का प्रयोग एक स्नान-मंत्र की तरह जप-साधना अथवा अन्य साधना मन्त्रों के पूर्व किया जा सकता है। अर्थ-चिंतन के साथ इस मन्त्र का प्रयोग करें, साधना को विशेष गहराई मिलेगी। वैसे नियमित रूप से द्रव्य-स्नान (जल-स्नान) के बाद भी इस मंत्र के साथ भाव स्नान कर नकारात्मक उर्जाओं से अपने तन, मन और आत्मा की विशुद्धि की जा सकती है।

प्रयोग करें और अपने अमूल्य अनुभव सबके साथ शेयर करें………

मैत्री पर्व ऐसे मनाएं


संवत्सरी महापर्व की पावन संध्या।

प्रेम और मैत्री भाव का उमड़ता हुआ समंदर।

खमतखामणा, मिच्छामि दुक्कड़ं की मधुर स्वर लहरियों से स्निग्ध होता हुआ मन।

मैं भी इस पर्व को मना रहा हूँ। सबसे पहले किससे खमतखामणा करूँ?

यह प्रश्न मन को आंदोलित कर रहा है।

मैं स्व को सर्वाधिक महत्व देने वाला व्यक्ति हूँ। इस अपेक्षा को सामने रखकर सर्वप्रथम स्वयं से ही क्षमा प्रार्थना की। किसी और के साथ यदि मैंने कोई दुर्व्यवहार किया है तो उसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव तो मैंने स्वयं ही भोगा है। क्या किसी और के माफ़ कर देने से मेरा बोझ हल्का हो जायेगा? जब तक कि मैं स्वयं ही खुद को माफ़ न कर सकूँ। जब भी आत्मा किसी प्रकार के पापकर्म में लिप्त होती है तो उसका बुरा प्रभाव इस आधार पर नहीं मिलता कि सामने वाले जीव ने कितना कष्ट पाया, अपितु इस आधार पर मिलता है कि पाप करने वाले के मन के परिणाम कैसे रहे। सबसे पहले मैं स्वयं के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। अपने शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार किया तो सहज ही मेरे सामायिक हो गयी। इसके पश्चात् शुद्ध स्वरूप को उपलब्ध परम पुरुषों के स्वरूप का आलंबन लिया तो चउवीसत्थव हो गया। गुरु के समक्ष निवेदन हेतु गया ताकि किसी के समक्ष अपना सब पाप निवेदन करने की क्षमता है अथवा नहीं, यह वंदना आवश्यक हो गया। फिर यात्रा की अपने अतीत की, प्रतिक्रमण में। पापकर्म एक प्रकार का तनाव उत्पन्न करता है, उस तनाव से मुक्त होने के लिए कायोत्सर्ग किया और भविष्य के लिए प्रत्याख्यान भी किया।

खुद को यदि माफ़ नहीं कर पाता तो दूसरों की माफ़ी से मुझे क्या मिलता?

तो आज के इस पावन अवसर पर खुद को माफ़ करता हूँ, मेरे दुष्कृत मिथ्या हो जाएँ (मिच्छामि दुक्कड़ं)

खुद के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। खुद पर प्रेम की बरसात करता हूँ।

I LOVE YOU, PIYUSH!

I LOVE YOU MORE THEN ANYBODY ELSE.

I LOVE YOU MORE THEN ANYONE ELSE DO.

I ACCEPT YOUR INNER BEAUTY, AND FEEL GRATITUDE FOR BEING HERE ALWAYS.

ONCE AGAIN I DECIDE TO LOVE YOU FOREVER…

HUGS AND KISSES………….

Jain old tattvik bhajan playlist


जैन दर्शन को गहराई से समझने के लिए अनेक जैन आचार्यों ने तात्विक गीतों की रचना की। इन गीतों में जीवन का सार भी छिपा है और जैन तत्त्वज्ञान भी बड़ी सरलता से समझ में आ जाता है इन गीतों के माध्यम से …
तो प्रस्तुत है ऐसे ही गीतों की एक छोटी सी ऑडियो लिस्ट..जिसे मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने स्वर दिए हैं।

45 min. Meditation Session with Piyush


You are the author of

Your own Health

or

Your own Disease.

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Learn, how to make your life healthy, happy and filled with energy with Piyush Kumar Nahata, a known Jain scholar, counselor and meditation expert. Piyush is the founder of evo4soul, a complete technique to align your body mind and soul.

 

 

In this session you will ..

  • Experience a 20 minute meditation with Piyush.
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Samavsaran Meditation


Did you ever want to go to Mahavideh Kshetra and get the darshan of Simandhar Swami
Let’s do this journey with a 36 minutes meditation
Wear your earphone and connect your inner core…

Mahavideh kshetra is known as an mythological concept well-known to Jain cosmology. It’s believed here that after the starting of fifth ara of avasarpini kaal (a part of infinite time) Tirthankar Read more Read more

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evo4soul Defined


cropped-evo4soul01.png‘evo4soul’ is a brainchild of Piyush Kumar Nahata. He has been working for more than two decades to understand the process of evolution theory in the context of ancient Indian wisdom provided by Rishis, Tirthankaras and Buddhas. After a deep analysis of both systems he designed a genius system to evolve the soul. It’s a complete guide to align the body, mind and soul. It would be interesting to know more about the methods, programs and practices of evo4soul.

In short evo4soul is a science to utilize your own potential to create a better personality and to get access of your hidden inner core.