‘Mukesh vs. Anil’ converted into ‘Mukesh+Anil’

The Humanistic Gesture Has made Mukesh Ambani to top the God’s list of ‘Humanitarians’

Prof. Muni Mahendra Kumar

Prof. Muni Mahendra Kumar, the mastermind behind the I-ARTIST (International Ahimsa Research & Training Institute of Spiritual Technolgy), remarked that in the God’s list of ‘Humanitarians’ (not the Forbe’s list) the name of Shri Mukesh Ambani is now at the top. Mukesh’s gesture is to be assessed in the light of the fact that in past, Anil (his real brother) was his ‘contestant’.

Prof. Muni’s appreciation of Mukesh’s ‘magnanimous’ humaneness is as follows:

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“We are living in the world today where greed, selfishness, dishonesty, vengeance, jealousy, ego, cruelty etc. reign supreme in human mind. Running after monetary gains has shattered all values into smithereens, making man utterly greedy, egotistic and selfish. In such a state of affairs, what Shri Mukesh Ambani has done is, indeed, the highest summit of true religion and spiritualistic traits. “A friend in need, is a friend indeed.”

In almost all Indian school of darshan (philosophy) and dharma, in general and in Jainism, in particular, such kind of magnanimity has been considered to be the implementation of dharma in actual life. It is ‘applied dharma/adhyatma’.

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By selflessly giving the colossal sum of Rs. 550 crores to Anil’s company, his elder brother Shri Mukesh Ambani has shown that he has put into practice the maxim of Bhagvan Mahavira’s principle of Aparigrah, ‘mucchhaa pariggaho vutto naayputten taainaa’, which asserts that it is the ‘attachment to money (or any object)’ which amounts to ‘parigrah’, and not the money itself.

In view of such act of ‘detachment to money’, Shri Mukesh Ambani deserves the epithet, Manava-Ratna.

It is all the more heartening that Mrs. Neeta Ambani, the wife of Shri Mukesh Ambani, played the role of ‘Seeta’ by having a soft corner for his ‘devar’ (husband’s younger brother), just as Seeta had showered exquisite grace on her ‘devar’ Laxman. In a way, Neeta bhabhi has as if falsified those so called sociologists who generally depict ‘bhabhi’ to be ungraceful and envious of ‘devar’ in the matter of voluntary monetary dividends. She has, indeed, played an exemplary role of the lady, par excellence, by transcending the petty consideration of past misbehaviour from the side of her ‘devar’. But for her co-operation, it would have been impossible for Shri Mukesh Ambani to be considerate for his brother.

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क्या देव होते हैं : एक चिंतन, भाग-1

देव, देवदूत, पितर, उच्च-स्तरीय चेतना आदि कुछ ऐसे शब्द हैं जिनको लेकर मानव सदा ही उत्सुक रहा है। आदिमानव भी देवपूजा करते थे इसके प्रमाण मिलते हैं। न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताएं चाहे वह सुमेरियन हो या बेबिलोनियन, ग्रीक हो या रोम सभी जगह देवों के अस्तित्व के सन्दर्भ में विश्वास रहे हैं। भारत में भी 5000 वर्ष से अधिक समय से देवपूजा का प्रचलन रहा है। विश्व की तमाम सभ्यताएं मुख्य रूप से बहुदेववादी रही है। एकेश्वरवादी कहलाने वाली ईसाई एवं इस्लामिक संस्कृति में भी एंजेल एवं पीरों के नाम पर अन्य देवों को भौतिक समस्याओं के समाधान हेतु पूजा जाता रहा है।

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क्या सच में देव अस्तित्व रखते हैं?
क्या वैज्ञानिक आधारों पर उनके अस्तित्व को सिद्ध किया जा सकता है?
क्या वे हमारी सहायता करते हैं?
क्या हमें उनकी पूजा करनी चाहिए?
उनकी पूजा का सम्यक विधान क्या है?
इत्यादि प्रश्न मानव मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं।

आज मैं अपने Blog में इसी सन्दर्भ में अपनी समझ और अनुभव के आधार पर कुछ तथ्य आपके समक्ष रखना चाहूँगा। हो सकता है कि आपका अध्ययन और पूर्व अवधारणाएं मेरे अनुभवों से मैच करे अथवा न करे, मगर चिंतन का एक नया द्वार अवश्य खुलेगा, ऐसा मैं विश्वास करता हूँ।

प्राचीन काल से जिन देवताओं पर मनुष्य विश्वास करता आया है आम तौर पर वे सभी प्रकृति में निहित शक्तियां थी। वेदों में जो ऋचाएं गाई गयी वे प्रायः प्राकृतिक रहस्यों एवं शक्तियों के प्रति अपनी आस्था की अभिव्यक्ति है। मनुष्य ने सूर्य को उगते हुए देखा और पाया कि सूर्य के साथ ही पूरी प्रकृति जाग जाती है, कण-कण में ऊर्जा का संचार हो जाता है, जब सूर्य नहीं होता तो सब कुछ थम जाता है, अँधेरे का मतलब है, भय। जंगल में जितने भी हिंसक जानवर हैं, वे रात्रि में अधिक सक्रिय हो जाते हैं। सूर्य के प्रति मानव के मन में एक श्रद्धा पैदा हुई और उसने सूर्य को देव मानना प्रारंभ कर दिया। समय बीता, और अग्नि का अविष्कार हुआ। सूर्य के जाने के बाद अग्नि एक ऐसा माध्यम बना जो जानवरों को दूर रखने में सहायक होता था, भोजन पकाने, और सर्दी की रातों में शरीर को गरम रखने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तो अग्नि को भी देवता का स्थान मिल गया। बादल और बारिश यदि सही समय पर न हो तो जीवन थम जाता है, न खेती होती है, न पीने का पानी मिलता है। तो उनकी शक्ति को नमन करते हुए उनको इंद्र देव के रूप में पूजा गया। समय-समय पर इसी प्रकार विभिन्न शक्तियों को भिन्न-भिन्न नाम दिए गए। आगे जाकर वेदों ने ‘एको सत् बहु विप्रा वदन्ति’ कह कर सभी देव शक्तियों को एक अस्तित्व का हिस्सा माना।

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समय के साथ समाज ने प्रगति की और कुछ ऐसे महापुरुष हुए, जिनका व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उनकी मृत्यु के बाद भी जन मानस में वे जीवित बने रहे। लोगों को निरंतर अपनी उपस्थिति का बोध वे कराते रहे। तो उनके इस अदृश्य स्वरूप को भी देव रूप माना गया और उनकी पूजा प्रारंभ हो गयी। शुद्ध आध्यात्मवादी जहाँ एक अस्तित्व को ही मानते रहे वहीँ आम जनमानस बहुदेववादी बना रहा।

कुल मिलाकर देव शक्तियां जन-मन में अपना स्थान कायम करने में सफल रही। तेतीस करोड़ देवी देवताओं का अस्तित्व भी प्रचार में आया।

यदि केवल कल्पना जगत् में ही इनका अस्तित्व होता तो शायद देवता चिरजीवी नहीं रह पाते। मगर लोगों ने भौतिक जगत पर उनके पड़ने वाले प्रभावों को भी महसूस किया। जब कभी कोई समस्या दीर्घ प्रयासों के द्वारा भी समाहित नहीं होती, तो देवों को इसका समाधान करने हेतु प्रार्थना की जाती और एक चमत्कारिक घटना की तरह समाधान हो जाता। ऐसी स्थिति में देवों के प्रति विश्वास केवल काल्पनिक ही नहीं रहा बल्कि उनके वास्तविक अस्तित्व के प्रति श्रद्धा भी हो गयी।

चूँकि विश्व किन नियमों के आधार पर संचालित होता है, इनका ज्ञान सभी को नहीं होता अतः अपनी समझ से आगे जो भी घटना घटित होती, उसको देव शक्ति द्वारा किये गए चमत्कार की तरह ही देखा जाता और उनके प्रति आस्था और भी अधिक बढ़ जाती।

अब यह तो स्पष्ट है कि देवपूजा की प्रक्रिया और देवश्रद्धा में कुछ ऐसा है जो हमारे जीवन के लिए उपयोगी तत्वों की पूर्ति करने में सहायक होता है। अतः उसकी उपयोगिता और आवश्यकता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। समझने की बात यह है कि देवपूजा को सिर्फ एक रूढ़ि की तरह करें या समझपूर्वक।

मेरे लिए देवता कोई व्यक्ति नहीं है, अपितु वे कलेक्टिव कांशसनेस अथवा सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। उनका अस्तित्व हमारी चेतना में है। अगर हम हैं तो वे हैं। हमारा विश्वास जितना प्रबल है उनके प्रति, उनका अस्तित्व भी उतना ही सशक्त है। अब यदि हम उनके प्रति श्रद्धा नहीं रखते तो वे कम से कम हमारे लिए तो मौजूद नहीं हैं।

अब यदि देवों को माने तो किस रूप में मानें और उनकी पूजा किस तरह करें ताकि वे हमारी समस्याओं का समाधान कर सकें, इस सन्दर्भ में जानने के लिए इसी blog के भाग-2 का इंतज़ार करें। आज के लिए बस इतना ही….

मनोहर पर्रिकर को मरने से रोकना होगा……

manohar parrikar

राजनीति के कीचड़ में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले, वाणी से नहीं जीवन से कहने वाले, संयम और सादगी की मिसाल एवं निर्भीक राजनेता श्री मनोहर पर्रिकर सशरीर इस विश्व में नहीं रहे।

तूफान का प्रवाह आता है, तो उसके साथ बह जाने वाले असंख्य देखे हैं, पर धारा के विपरीत चलने का दुस्साहस कोई-कोई ही करता है। अधिकारों की प्राप्ति होने के बाद संयम होना अत्यंत मुश्किल होता है, इस बात तो श्री पर्रिकर ने गलत साबित किया है। जिनके पास कुछ नहीं होता वे त्याग, संयम, ईमानदारी की बात बेहद आसानी से कर लेते हैं, मगर मुख्यमंत्री एवं रक्षा मंत्री जैसे अधिकारपूर्ण पदों पर बैठने के बाद भी सात्विक, सरल और संजीदगी का जीवन जीकर वे लोगों के लिए प्रेरणा-पाथेय बन गए।

भौतिक शरीर का अपना धर्म है, उसे एक दिन नष्ट होना ही होता है, मगर एक शरीर वह होता है जो हमारे विचारों से बनता है। वह हमारे भौतिक शरीर की उम्र से बहुत बड़ा भी हो सकता है।

एक बार जोधपुर के महाराजा अपने नौकर के साथ किले की दीवार पर घूम रहे थे। चलते-चलते वे एक ऐसे स्थान पहुंचे जहाँ बहुत बड़ी खाई थी। उसे देखकर महाराजा ने नौकर से एक सवाल किया:- यदि कोई व्यक्ति इस खाई में गिर जाये जो कितना बड़ा धमाका होगा?

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नौकर ने जवाब देते हुए कहा:- महाराज! यह तो गिरने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है।

महाराज ने पुछा:- कैसे?

नौकर ने कहा:- अगर कोई मेरे जैसा सामान्य व्यक्ति गिरेगा तो उसकी गूंज सिर्फ 100-200 लोगों तक सुनाई देगी। पर यदि आप गिर जाएँ तो नौ कोटि मारवाड़ में गूंज होगी, और जो और आस-पास के राज्यों तक भी उसकी गूंज सुनाई देगी

मनोहर पर्रिकर भले ही गोवा जैसे एक छोटे से राज्य के नेता थे मगर उनके व्यक्तित्व ने उनको वैश्विक स्तर पर पहुंचा दिया। अगर उनकी सात्विकता और संयम का अंश भी हम जी सकें तो उनको फिर से जीवित कर सकते हैं और सच कहें तो उनका जाना देश के लिए हितकर नहीं है, हमें उन्हें रोकना होगा। बिना किसी श्रद्धांजलि के, बिना किसी RIP (rest in peace) के (मैं नहीं चाहता कि वे शांति से विश्राम करें क्योंकि अभी बहुत काम बाकी है)…..

जय हिन्द, जय भारत

हॉस्पिटल में इलाज के दौरान जीवन की नश्वरता एवं जीवन के कर्तव्यों के बारे में जो उन्होंने कहा उसका एक चयनित पार्ट मैं यहाँ शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।

As you run through the rat race of life pursuing success one must realize that at some point of time you have to reach the last part of drama in the theater where end of the show is visible.

So, learn to first look after yourself, take care of others, learn to spend your money and shower your feelings on people around you…..

Manohar parrikar’s words while he is under treatment for pancreatitis in us hospital

इस Weekend कुछ खास हो जाये

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Weekends……. एक खुबसूरत अहसास। मगर कब तक? जब तक कि वो आ नहीं जाते।
आने के बाद…..लगता है कि बस यूँ ही चले गए। कहते हैं कि

“Weekends are like rainbows. They look great from the distance. But once you get up close to them, they start to disappear.”

“The only thing that travels faster than light is weekends.”

हमेशा यह सोचते हैं कि Weekend एन्जॉय करेंगें। परिवार को टाइम देंगें। खुद को टाइम देंगें। मगर सिर्फ कल्पना में ही उलझकर कर जाती है सारी योजनायें। चाही-अनचाही व्यस्तताएं हों या कुछ और पा लेने की धुन, जिंदगी को बेहतर बनाने के चक्कर में जिंदगी हम जी ही नहीं पाते।

आइये इस Weekend पर कुछ नया करें…कुछ ऐसा जो Future बनाने के लिए नहीं बल्कि वर्त्तमान बनाने के लिए हो….. ।

  • Digital उपवास रखें। यानि जरुरी कार्यों के अलावा स्मार्टफ़ोन से दूर रहें।
  • प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताएं। उस दौरान पूर्णतया मौन रहें और वातावरण में हो रहे परिवर्तनों को गहराई से देखें।
  • परिवार के साथ समय बिताएं। अपने बचपन की यादें उनके साथ शेयर करें। कुछ आसान से खेल खेलें। फिर से बच्चे बन जाएँ।
  • लॉन्ग ड्राइव पर चले जाएँ और उस दौरान रास्ते के सुनहरे दृश्यों का आनंद लें।
  • शांत संगीत बजाएं और उसकी धुन को अपने तन, मन और ह्रदय को छूने दें। यदि शरीर में कोई नृत्य पैदा हो तो उसका साथ दें।
  • खाना खाने बैठें तो उसके हर कौर को पूरी सजगता के साथ खाएं, बिना किसी हड़बड़ी के।

सप्ताह के 5-6 दिन काम करने के दौरान जो जल्दबाजी होती है हर कार्य में,
उससे हटकर बेहद शांति से हर एक कार्य का मजा लेते हुए Weekend बिताएं।

जब जिंदगी का सूरज ना उगे तो खुद सूरज बन जाएं….

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कभी ऐसा हुआ है कि कोई मधुमक्खी उड़ते उड़ते आपके कंधे पर आ कर बैठ गई हो… और बिना इरिटेट हुए आपने इस संभावना पर ध्यान दिया हो कि शायद मधुमक्खी ने आपको फूल समझ लिया है!

जिंदगी ठीक वैसी ही है जैसी हम उसे स्वीकार करते हैं।

जब एक हवा का झोंका छू जाए…..
धूप का नन्हा सा कतरा आंगन में अठखेलियां करे….
या बादल का कोई टुकड़ा अचानक से छाया कर दे!
तो उसे इग्नोर मत कीजिए यह जिंदगी है जो आप से बोलने की कोशिश कर रही है
वह बताना चाहती है कि वह आपके साथ है।

आज के दिन यह संकल्प कीजिए कि मैं दिन भर में कम से कम 10 बार प्रकृति के द्वारा दिए गए सुखद एहसासों के लिए आभार प्रदर्शित करूंगा। वे सुखद एहसास कुछ भी हो सकते हैं…

  • उगता उगता हुआ सूरज..
  • स्वादिष्ट भोजन…
  • किसी अनजान के द्वारा दी गई एक मुस्कुराहट
  • अचानक से सुनाई देने वाली संगीत की मधुर धुन
  • थके हारे शेड्यूल के बाद आराम के कुछ पल
  • अपने परिवार के साथ होने का एहसास
  • और हां! किसी के द्वारा भेजा गया एक अच्छा मैसेज या चुटकुला…

जिंदगी हमें बहुत सारे अवसर देती हैं खुश होने के लिए.. जरूरत है कि हम अपनी आंखें खुली रखें और उन पलों की खुशी मनाएं..

अगर आप चाहें तो अपनी खुशी के ये पल मेरे साथ भी शेयर कर सकते हैं और बता सकते हैं आज आप क्यों खुश हैं?

अपने शरीर का शुद्धिकरण करें Water Meditation के साथ…..

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  1. ध्यान के लिए किसी एक सुखद आसन और मुद्रा का चुनाव करें। आँखें कोमलता से मुंदी हुई हों। कुछ देर तक सामान्य गति से साँस लें और हर साँस के साथ ख़ुद को आरामदायक और शिथिल होते हुए महसूस करें। महसूस करें कि आप एक समंदर के किनारे खड़े हैं। कल्पना करें कि यह समंदर शुद्ध पारदर्शी पानी से भरा हुआ है उस पानी में कोई कचरा नहीं है न ही किसी भी प्रकार की अशुद्धि है, बिलकुल तरोताजगी से भरा हुआ पानी।
  2. अनुभव करें कि आप पानी के अंदर खड़े हैं। अपने पैरों को पानी के एक स्ट्राॅ की तरह महसूस करें। जैसे ही आप सांस भरते हैं, उस स्ट्राॅ के माध्यम से पानी आपके शरीर में भर जाता है और वह आपके पूरे शरीर का सारा अशुद्ध भाग लेकर सांस छोड़ने के साथ ही वापस बाहर निकल जाता है।
  3. इस प्रक्रिया को बार-बार करें और हर बार अपने शरीर को और भी अधिक स्वच्छ और शुद्ध होते हुए महसूस करें। तीन सामान्य गहरी सांस के साथ प्रयोग को संपन्न करें।

एक कोना साधना के लिए भी बनाएं …

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कहते हैं कि साधना कहीं भी की जा सकती है परंतु स्थान का भी कुछ महत्व होता है इस बात से कोई मुकर नहीं सकता।

अच्छा शांत स्थान जहां हमें साधना की गहराइयों तक ले जा सकता है, वहीं बहुत सारी बाधाओं से भरा हुआ, कदम कदम पर समस्याएं पैदा करने वाला स्थान हमें साधना से भटका भी सकता है। जब तक हम साधना के प्राथमिक स्तर पर होते हैं तब तक एक छोटी सी बाधा भी हमें साधना से हरदम के लिए दूर कर सकती है इसलिए जरूरी है कि हम अपनी साधना-स्थली को बहुत ही तफसील से बनाएं और उसमें ऐसे संसाधनों का इस्तेमाल करें जो हमारी साधना में सहायक हों।

वैसे तो 5 मिनट के लिए अपने ऑफिस का दरवाजा बंद करके या फिर सुबह उठने के बाद बिस्तर पर ही 5 मिनट तक आँखें बंद करके सांसो पर ध्यान केंद्रित करके अथवा आत्म चिंतन करके भी साधना की जा सकती है। परंतु यदि एक अच्छा सुव्यवस्थित स्थान उपलब्ध हो तो साधना के शिखर पर चढ़ना काफी आसान हो जाता है। आज इस ब्लॉग में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि किस तरह अपनी साधना स्थली को डिजाइन किया जाए ताकि हम उसका मैक्सिमम बेनिफिट उठा सकें।

  • साधना करने के लिए जिस स्थान का चयन करते हैं वह घर का एक पूरा कमरा अथवा किसी अन्य कमरे का छोटा सा कोना भी हो सकता है।
  • स्थान का चयन करने के दौरान इस बात का ध्यान रखें कि वह स्थान प्राकृतिक रोशनी, हवा आदि से समृद्ध हो।
  • वह स्थान शांत हो और बाहरी बाधाओं से मुक्त हो।
  • ऐसा स्थान जहां पर बहुत सारा सामान भरा हुआ है बहुत सारा फर्नीचर हो साधना के लिए उपयुक्त नहीं होता क्योंकि सामान भी ऊर्जा सोख लेता है। वहीं वह हमारे मस्तिष्क को भी डायवर्ट करता है।

हम अपनी पांचों इंद्रियों के माध्यम से वातावरण में विद्यमान तरंगों को ग्रहण करते हैं। तो यह बेहतर होगा कि इन सभी इंद्रियों के लिए सकारात्मक ऊर्जा देने वाले तत्व साधना स्थल पर मौजूद हों।

  • चक्षुरिन्द्रिय: वीतराग भावों को प्रकट करने वाले तीर्थंकरों की मूर्ति हमारे मन को भी शांत कर देती है। आलंबन के रूप में मूर्ति का प्रयोग किया जा सकता है बस इतना ध्यान रहे कि वह मूर्ति बहुत ज्यादा सजी-धजी ना हो। उस पर भौतिक वस्तुओं का श्रृंगार न किया गया हो।

  • घ्राणेन्द्रिय: तरोताजगी देने वाली सुगंध भी कमरे की ऊर्जा को बढ़ा सकती है। इसके लिए धूप अगरबत्ती का इस्तेमाल किया जा सकता है अथवा एसेंशियल ऑयल जो कि विभिन्न प्रकार के फ्लेवर्स में उपलब्ध हैं उनका भी प्रयोग कर सकते हैं।

  • श्रोत्रेन्द्रिय: शांति पैदा करने वाला संगीत साधना में सहायक हो सकता है। संगीत के अलावा तिब्बत में प्रचलित बाउल्स, शंख आदि का भी उपयोग किया जा सकता है।

  • रसनेन्द्रिय: बौद्ध संस्कृति में ध्यान से पूर्व ब्लैक टी अथवा ग्रीन टी पीने की परंपरा है और इसके लिए बकायदा टी सेरेमनी भी मनाई जाती रही है यह प्रक्रिया हमारे टेस्ट के माध्यम से मन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

  • स्पर्शनेन्द्रिय: स्पर्श की अनुकूलता के लिए इस बात का बंदोबस्त किया जा सकता है कि कमरे का तापमान ना अधिक गर्म हो और ना ही अधिक ठंडा। शुद्र जंतुओं मक्खी मच्छर आदि का भी वहां पर उपद्रव ना हो।

संवेदनाओं को बनाएं अपनी ताकत

  • क्या आपको ऐसा लगता है कि आप दूसरों की संवेदनाओं को बहुत जल्दी समझ जाते हैं?
  • क्या कभी कभी ऐसा होता है कि आप भविष्य को लेकर के बिल्कुल सही अनुमान लगा लेते हैं?
  • क्या लोगों के शब्दों के बजाय आप उनकी ऊर्जा से उनके बारे में ज्यादा गहराई से जानकारी प्राप्त करते हैं?
  • क्या किसी नकारात्मक आदमी के साथ रहकर बहुत जल्दी ही खुद को थका हुआ महसूस करते हैं?
  • क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि अनजान लोगों ने आपसे सलाह मांगी है?

इन प्रश्नों पर गहराई से चिंतन करें और खुद से उत्तर मांगें। अगर इनमें से अधिकतर प्रश्नों के उत्तर हां में हैं तो इसका मतलब है कि आप काफी संवेदनशील हैं। हो सकता है कभी-कभी अपनी इस संवेदनशीलता को लेकर आप काफी परेशान महसूस करते हों मगर अगर सही तरीके से इस संवेदनशीलता का प्रयोग किया जाए तो आप एक अच्छे साधक तो बन ही सकते हैं अपने दिन में एक बार खुद को यह सुझाव दें कि मैं इस प्रकृति से अलग नहीं हूं बल्कि इस पूरीभीतर की अध्यात्मिक शक्तियों को जागृत कर दूसरे लोगों की सेवा भी कर सकते हैं।

इस दुनिया में हर व्यक्ति अपने आप में एक भिन्न व्यक्तित्व लेकर के आता है। अगर लोगों के व्यक्तित्व को गौर से देखा जाए तो कुछ प्रकार के भेद का भेद स्पष्ट तौर पर उभर करके आते हैं।

जैसे कुछ लोग काफी तार्किक होते हैं वह सिर्फ तथ्यों के आधार पर ही बात करना पसंद करते हैं उनकी नजर में संवेदनाएं और दिल की आवाज कोई महत्व नहीं रखते।

वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने भीतर की आवाज पर भरोसा करते हैं और अपने निर्णय उस आवाज के आधार पर लेते हैं।

तथ्य पर जीने वाले लोग जिस प्रकार की सफलताएं प्राप्त करते हैं वे प्रायः भौतिक होती हैं क्योंकि उनकी नजर में वही महत्वपूर्ण होता है जो बाहर दिखाई देता है अदृश्य शक्तियों के बारे में न तो किसी प्रकार का कोई विश्वास रखते हैं और ना ही उनके बारे में गहराई से सोचते हैं।

वहीं संवेदनशील लोग अध्यात्मिक स्तर पर उन्नत होने की संभावनाएं लिए हुए होते हैं परंतु तब तक अपना सही विकास नहीं कर पाते जब तक कि उनकी संवेदनाओं को सही दिशा नहीं मिल जाती।

अगर आपको लगता है कि आप सच में एक संवेदनशील व्यक्ति हैं और उन संवेदनाओं के माध्यम से आपको कुछ खास तरह के अनुभव हो रहे हैं तो बेहतर होगा कि अपनी इस शक्ति को व्यर्थ न जाने दें।

कुछ बिंदुओं पर ध्यान देकर न सिर्फ आप अपनी इस शक्ति को विकसित कर सकते हैं अपितु इस के माध्यम से लोगों की सेवा भी कर सकते हैं।

  • दिन में कम से कम 1 घंटे तक मौन का गहन अभ्यास करें इस समय के दौरान हो सके वहां तक कुछ भी न पढ़ें और इलेक्ट्रॉनिक गैजटस् से भी दूर रहे।
  • सप्ताह में एक दिन कम से कम 3 घंटे शुद्ध प्रकृति के सानिध्य में अपना समय बिताएं। इस समय के दौरान प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को निहारे और खुद को अपने आसपास से जुड़ता हुआ महसूस करें।
  • झूठ, धोखाधड़ी जैसी आदतें हमारी आंतरिक आवाज को बंद कर देती हैं इसलिए इनसे बचें।
  • कभी भी बोलने से ज्यादा सुनने पर और महसूस करने पर ध्यान दें।

संवेदनशीलता प्रकृति का दिया हुआ एक खूबसूरत उपहार है इस उपहार की रक्षा करें इसे सहेज कर रखें और इसको विकसित करें।

इस संदर्भ में यदि आप के कोई अनुभव हैं तो कमेंट सेक्शन में आप शेयर कर सकते हैं।

evo4soul क्या है……?

evo4soul क्या है?

क्या कभी आपने यह सोचा है कि आप इस धरती पर क्यों आए हैं?

क्या आपने कभी यह सोचा है कि एक खास तरह का माहौल, एक खास तरह के माता-पिता, समाज और पड़ोस आपको क्यों मिला?

क्या आपने कभी यह सोचा है कि आप को मिलने वाली खुशियों का क्या उद्देश्य है ?

और साथ ही साथ क्या उद्देश्य है उन दुःखों का जो हमारे चाहे अनचाहे जिंदगी में दस्तक देते रहते हैं?

सवाल सवाल और सवाल……!!!!!!

एक महान वैज्ञानिक हो गए हैं चार्ल्स डार्विन, जिन्होंने थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन का सूत्रपात किया था। इस थ्योरी के अनुसार यह संपूर्ण विश्व एक क्रमिक विकास के पथ पर चल रहा है। इस विकास के क्रम में वे व्यक्ति आगे निकल पाते हैं जो अपने आसपास के माहौल में विद्यमान मुश्किलों का सबसे बेहतरीन तरीके से मुकाबला कर पाते हैं और खुद को खत्म होने से बचा पाते हैं। इस थ्योरी को सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के नाम से जाना गया।

इस theory के अनुसार जिंदगी का उद्देश्य है:

अपने आसपास की परिस्थितियों से सीखना और क्रमशः अपना विकास करना।

एक प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म लूसी में एक महान वैज्ञानिक का किरदार अदा करते हुए मॉर्गन फ्रीमैन बहुत ही सुंदर बात कह गए:

धरती पर जब से जीवन की शुरुआत हुई है तब से लेकर आज तक, हर एक कोशिका का एकमात्र उद्देश्य रहा है, अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करना।

एक छोटी से छोटी कोशिका भी यही कार्य करती हैं अपने जैसी एक और कोशिका का निर्माण, जिसमें वह अपना सारा ज्ञान हस्तांतरित कर देती है।

इस प्रकार हम देख सकते हैं जिंदगी में मिलने वाली हर परिस्थिति चाहे वहां खुशी हो या दुख हमें कुछ ना कुछ अनुभव देकर के जाती हैं कुछ ना कुछ सिखा करके जाती है और उस पूरी प्रक्रिया के गुजर जाने के बाद हम ठीक वैसे नहीं रह जाते जैसे कि पहले थे। यह कहा जाए तो बेहतर होगा कि मुश्किल हालात हमें ज्यादा अनुभव देकर के जाते हैं।

To learn is always a painful process

इस प्रकार हम देख सकते हैं इस धरती पर जन्म लेने के पीछे हमारे मुख्य रूप से दो उद्देश्य हैं

  1. खुद को पहले से बेहतर बनाना।
  2. अपने अनुभवों को हस्तांतरित करना।

evo4soul का फुल फॉर्म है ‘evolution process for soul’ अर्थात आत्मा के क्रमिक विकास की प्रक्रिया। इसके अंतर्गत हम जीवन को बेहतर बनाने वाली पद्धतियों पर शोध करते हैं ताकि जो छोटी सी जिंदगी मिली है उसे हम शानदार तरीके से जी सकें और अपने उद्देश्य को सही प्रकार से पूरा कर सकें।

प्यार हुआ चुपके से……

क्यूं नये लग रहे हैं ये धरती गगन

मैंने पूछा तो बोली ये पगली पवन

प्यार हुआ चुपके से….

प्यार तो हुआ पर इस प्यार की मंजिल किसी और को पाना नहीं था बल्कि खुद को ही पाना था। कहा जाएं तो अब तक जो कुछ किया था उसका उद्देश्य खुद को खुश करना नहीं था बल्कि दूसरों की नजर में खुद को साबित करना था लेकिन 1 दिन आया जब नजरें बाहर से भीतर की तरफ मुड़ गई और दूसरों को खुश करना जिंदगी का लक्ष्य नहीं रहा।

खुद से प्यार होते ही जिंदगी के कुछ तौर-तरीके बदल गए। क्योंकि अब मेरी मंज़िल बदल चुकी थी इसलिए मेरा रास्ता भी बदल गया। ऐसा नहीं है कि इस रास्ते पर सिर्फ फूल ही फूल थे, लेकिन चूंकि यह मेरा बनाया हुआ रास्ता था इसलिए इस रास्ते पर आने वाले कांटे भी फूलों से कम नहीं लगते थे।

बेशक, अगर आप खुद से प्यार करते हैं तो अपने बनाए हुए रास्ते पर ही चलेंगे। फिर भी कुछ बिन्दुओं को अगर ध्यान में रखेंगे तो इस रास्ते पर बेफिक्र होकर चल सकेंगे।

  • अपने अनुभवों पर भरोसा करें।
  • आप जो चाहते हैं उसे स्पष्टता से कहना सीखें।
  • लोगों को खुश करने वाले के रूप में अपनी छवि ना बनने दें।
  • खुद के बारे में नकारात्मक बात ना बोलें।
  • अपने सपनों का पीछा करना ना छोड़ें।
  • ना कहने से ना डरें।
  • हां कहने से ना डरें।
  • जिस परिस्थिति पर आपका नियंत्रण ना हो उसे जाने दें।
  • खुद के प्रति दयालु बनें।

मैं एक बात का हमेशा ध्यान रखता हूं कि कभी भी खुश होने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं होता और खास तौर पर अगर मैं कभी दुखी हूं तो अपना दुख दूर करने के लिए दूसरों के पास कभी नहीं जाता। मुझे लगता है, दूसरों के पास मुझे तभी जाना चाहिए जब मेरा ह्रदय सामान्य हो और खुशियों से भरपूर हो।

वैसे आमतौर पर लोग कहा करते हैं कि दुख बांटने से हल्का होता है और खुशियां बांटने से बढ़ती हैं। मगर यदि आप सेल्फ लव के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि अपने दुखों का सामना अकेले करना सीखें और उसका समाधान भी बाहर नहीं अपने अंदर ही खोजें।

सेल्फ लव के संदर्भ में और अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें।

सेल्फ लव की यात्रा पर आपका हार्दिक स्वागत है…

एक गलती हो गई मुझसे….

एक गलती हो गई मुझसे
तुम्हारे प्रति।

मैं याद करता हूं उन पलों को
जिन पलों में …
मैंने खुद को दोषी ठहराया है
याद करता हूं मैं उन पलों को
जिन पलों में ……….
मैंने खुद को रोता हुआ पाया है
मैंने महसूस किया है
दर्द को सीने में कुलबुलाते हुए
कुछ दिखाते और कुछ छिपाते हुए
पर मेरा भी एक सपना था
और वह सपना हर उस दर्द से बड़ा हो गया
क्योंकि उस सपने ने दी मुझे
जीने की वजह
कुछ करने की ताकत
और
वह गलती ही बन गई
मेरे लिए इबादत

क्या अब भी तुम
सिर्फ उस गलती से ही मुझे
परिभाषित करते रहोगे
या
मेरे सपनों को भी गले लगाओगे।

5 शक्तिशाली मंत्र जो बदल सकते हैं हमारी दुनिया

इस दुनिया में जो कुछ भी दिखाई देता है या महसूस होता है वह सब कुछ विशेष प्रकार की तरंगों से बना हुआ है जिसे हम वाइब्रेशंस कहते हैं।

हम हम जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं उनके भी अपने वाइब्रेशंस हैं। उन शब्दों के द्वारा भी हम लोगों को प्रभावित करते हैं कभी सकारात्मक रूप में तो कभी नकारात्मक रूप में। हम दूसरों को कितना प्रभावित करते हैं यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण है कि हमारे शब्द खुद हमें कितना प्रभावित करते हैं। हमारे शब्द हमारे लिए शाप भी बन सकते हैं और वरदान भी बन सकते हैं क्योंकि हमारे शब्द एक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने शब्दों की ऐसी ताकत को समझा और मंत्र शास्त्र का निर्माण किया। समय के साथ मंत्र हमारे जीवन का एक रहस्यपूर्ण हिस्सा बनते चले गए।

आमतौर आमतौर पर जब मंत्र की चर्चा की जाती है तो हमारे मन में कुछ ऐसे शब्द आते हैं जो हमारी आम बोलचाल की भाषा से अलग संस्कृत प्राकृत आदि प्राचीन भाषाओं में निर्मित होते हैं या फिर कुछ ऐसे बीज अक्षर होते हैं जो उच्चारण करने में काफी कठिन होते हैं।

लेकिन एक महान ऋषि ने यह कहा है कोई भी अक्षर मंत्र हो सकता है। यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा है ऐसा कोई अक्षर है ही नहीं जिसे मंत्र ना कहा जा सके। बस जरूरत है तो उसे सही रूप में समझने की और उसका सम्यक प्रयोग करने की।

वैसे आप सभी लोगों ने थ्री ईडियट्स फिल्म जरूर देखी होगी जिसमें रणछोड़दास चांचड़ के रूप में जो किरदार नजर आता है वह लोगों को एक मंत्र सिखाता है ‘All is well’। वह मानता है कि इस मंत्र के माध्यम से भले ही हमारी समस्याएं दूर ना हो परंतु समस्याओं को झेलने की हमारी ताकत में तो इजाफा होता ही है।

आज मैं कुछ ऐसे ही सकारात्मक शब्दों की चर्चा कर रहा हूं जिससे मंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है-

1. मैं अपने चारों तरफ प्यार और करुणा की सकारात्मक तरंगों को महसूस कर सकता हूं।

2. मैं आज के दिन हर परिस्थिति में खुश रहने का निर्णय लेता हूं।

3. अतीत की गलतियों के लिए मैं खुद को माफ करता हूं।

4. यह भी चला जाएगा।

5. मेरी जिंदगी में जो कुछ अच्छा हो रहा है उसके लिए मैं कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं।

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