सिद्ध हों अवतरित मुझमें

पल रही थी ख्वाहिशें मन में अनंतों,
आज उनका अंत करने जा रहा हूं।

भूख आत्मा की बुझाने का समय है,
सिद्ध पथ चुनने अकेला जा रहा हूं।

है करोड़ों दिनकरों से तेज जिसका अधिक वो..हो
चंद्रमाओं से अमलतम
सागरों से भी गहनतम
सिद्धता अवतरित मुझ में
मौन जिसमें प्रकट पावन
शून्यता का खिले उपवन
शुद्ध हो मम आत्म कण-कण
सिद्धता अवतरित मुझमें

भेद में उलझा रहा था मैं सदा ही
खोज आज अभेद की करने चला हूं।

ढूंढता बाहर सदा था सौख्य जो मैं
आज भीतर की तरफ ही बढ़ चला हूं।

तार अंतर से जुड़ें अब
और झंकृत हो सदा मन

चंद्रमाओं से अमलतम
सागरों से भी गहनतम
सिद्धता अवतरित मुझ में
मौन जिसमें प्रकट पावन
शून्यता का खिले उपवन
शुद्ध हो मम आत्म कण-कण
सिद्धता अवतरित मुझमें

तन ही मैं हूं, मानता था
आत्म से अनजान सा था।
भ्रम अंधेरे में उलझकर
बन गया नादान सा था।

भोर ऊगी जिन्दगी की और जागा
सो रहा मन छोड़कर भ्रम का अंधेरा
गीत मुक्ति का बजा है
सनन सन सन सनन सन सन

चंद्रमाओं से अमलतम
सागरों से भी गहनतम
सिद्धता अवतरित मुझ में
मौन जिसमें प्रकट पावन
शून्यता का खिले उपवन
शुद्ध हो मम आत्म कण-कण
सिद्धता अवतरित मुझमें

महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं
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माफ़ी मत मांगें, धन्यवाद दें।

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“क्या यार मैं हमेशा ही late हो जाता हूँ,” की बजाय “मेरा हमेशा इंतजार करने के लिए मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ,” ज्यादा बेहतर वाक्य है।

“मैं भी कितना भावुक हूँ, है ना!” की बजाय “मुझे, जैसा मैं हूँ, वैसा स्वीकार करने के लिए तुम्हारा धन्यवाद,” कितना अच्छा लगेगा!

“माफ़ करो यार मैं हमेशा बिखरा हुआ ही रहता हूँ”, की बजाय “मेरी हर गलती के दौरान तुम जिस धैर्य का परिचय देते हो वो काबिल-ए-तारीफ है,” बोलिए।

“मैं तुम्हें बार-बार हेल्प मांग कर परेशान करता हूँ ना?” की बजाय “मेरा सहयोग करने के लिए तुम्हारा शुक्रिया,” कहना कितना अच्छा है।

“मैं भी कितना बडबड करता रहता हूँ,” की बजाय “मेरी बात तुम ध्यान से सुनते हो तो मुझे बहुत अच्छा लगता है,” ये कहकर वातावरण बदल सकते हैं।

कहने को तो सिर्फ शब्दों का ही फर्क है, मगर इन शब्दों साथ जो वातावरण में बदलाव आप महसूस करेंगें, वो बहुत कीमती होगा।

आज लिखें खुद को एक love letter…..

आँखें बंद करें और खुद के चेहरे को छुएँ, अपनी आँख, नाक, गाल, होठ, ठुड्डी, गला…. उनकी कोमल बनावट को अपने हाथों से महसूस करें अपने ललाट को और सर के बालों को अपनी अंगुली के पोरों से आहिस्ते से छुएँ। अपनी सांसों की छुअन को अपनी हथेलियों पर महसूस करें। और खुद से कहें……I LOVE YOU,…… I LOVE YOU SO MUCH, ..I MISS YOU!

ज़िन्दगी ने हमें क्या सिखाया है?

  • जब तक हाथ पैर में दम है, तब तक दुनिया पूछती है।
  • ये शरीर की खूबसूरती चन्द दिनों की है (काया रो गुलाबी रंग उड़ जासी)।
  • जब तक हाथ में पैसा है, तभी तक समाज में इज्जत है।
  • ज़िन्दगी एक जंग है, हाथ पैर मारते रहो, वर्ना कोई धक्का देकर आगे चला जायेगा।

इस प्रकार कितनी बार हमने खुद को और समाज को कोसा है और कुतर दिए हैं अपने पंख। समाज की बनाई लकीरों पर चले हैं (पता नहीं यह समाज कौन है?) ….।

कुछ हटकर सोचें!

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  • मैं खुबसूरत हूँ।
  • मैंने जिंदगी से भरपूर प्यार, सम्मान और अनुभव पाया है।
  • हर दिन, हर पल मेरे लिए एक उपहार है।…..
  • मैं खुद को बिना शर्त प्यार करता हूँ।

आज एक नया प्रयोग करें!
खुद को एक प्रेम-पत्र लिखें।
थोड़ा अजीब सा लग रहा है!
मन में घबराहट हो रही है!….कोई बात नहीं। मगर एक बात याद रखें कि आपसे बेहतर खुद को और कौन पहचान सकता है? अतः मन बनायें और कर डालें।

कैसे लिखें खुद को लव लैटर?

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  • सबसे पहले एक खुबसूरत लेटरपेड चुनें या फिर सबसे अच्छी quality का पेपर लें।
  • फिर एक अच्छा सा स्मूथ चलने वाला पेन लें, पेन ऐसा होना चाहिए जो बार-बार अटके न।
  • खुद को अपने सबसे प्यारे नाम से संबोधित करें (मुझे मेरे एक प्यारे दोस्त द्वारा पिन्नु कहा जाता था)। जरुरी नहीं कि सरकारी खातों या आधार कार्ड में दर्ज नाम ही लिया जाये। उस नाम को सबसे बेहतर तरीके से कौन बोलता था उसे याद करें और उस ध्वनि को अपने कानों में गूंजते हुए महसूस करें।
  • जिंदगी के कुछ खुबसूरत पलों को याद करें, जैसे : क्या तुम्हें याद है जब …..कुछ ऐसा हुआ था…(मुझे याद आते हैं वे पल जब मेरे प्रिय पिता समान गुरु आचार्य महाप्रज्ञ ने किसी बात पर मुस्कुराते हुए कान पर होले से चपत लगायी थी। मैं आज भी उस छुअन को महसूस कर सकता हूँ)। अपने अच्छे पलों को याद करें उनकी याद की ताजगी से अपने मन को भर जाने दें और उन्हें कागज़ पर उतारें।
  • जिंदगी के कठिन पलों को भी याद करें जब आपने बड़ी हिम्मत के साथ सामना किया था। खुद की तारीफ करें और लिखें मैं कितना खुशनसीब हूँ कि प्रकृति ने मुझे गलती करने का मौका दिया ताकि मैं नए अनुभव अर्जित कर सकूँ। चाहे वो पहली बार चलने पर गिरना हो या साइकिल को बैलेंस करना सीखने से पहले लगने वाली चोटें हों। इसी प्रकार की अन्य घटनाएँ भी याद करें।
  • अगर याद आये तो खुद की प्रशंसा में कोई शेर लिखें, या कोई कविता, या फ़िल्मी गीत की कोई खुबसूरत पंक्ति।
  • इतने सुन्दर और बेमिसाल शरीर और व्यक्तित्व को पाने के लिए खुद को धन्यवाद कहें। और उसे याद दिलाएं कि आप खुद को कितना-कितना-कितना प्यार करते हैं। जब हर कोई आपके खिलाफ था तब भी आप खुद से प्यार करते थे, करते हैं और करते रहेंगें क्योंकि सच्चे दोस्त विपत्ति में भी साथ नहीं छोड़ते और आप अपने सच्चे दोस्त ही नहीं प्रेमी भी हैं।
  • इसके बाद प्रेषक के रूप में खुद का नाम लिखकर उसे एक अच्छे लिफाफे में बंद कर दें और उस पर खुद का एड्रेस भी लिखें।
  • उस पत्र को उसी तरह संभाल कर रखें जैसे किसी जेवर को संभाल कर रखते हैं।

OMNISCIENCE IN JAINISM

We often consider ourselves as the superior-most species among the whole realm on the basis of our ability to think, plan and execute. We got termed as homo-sapiens—thinking hominids.

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For a long period of time survival was the only and the greatest challenge, hence we could not explore into different things. Then gradually with the evolution of our species, when matter of survival was not the first and foremost we racked our brains into everything. From the beginning of the universe till the Doomsday. From micrology to macrology. Calculations which would need years to solve is only a matter of seconds today. We have our whole world to our palms (smart phones). A single click can lead us anywhere we wish to (World Wide Web).

Most certainly modern advancements have saved us time for self-realization too. But have we reached the point of saturation? Are we to our fullest capacity? Do we know everything? (Google Baba does may be?) Definitely not. Well according to Jainism we’re not even nearby.

Even what we know is disputable, due to the reason that our thoughts are strongly infused by our emotions and attachments.

We usually treat everything as either good or bad instead of comprehending it as it really is. A dish of pasta served between two would be delicious for one and despicable for the other. It would be their perception and not the pasta to be good or bad. In Jain technical terms it will be raga—attachment which makes it adorable for the first and it is dvesha—aversion which makes it disgusting for the latter one. So, what really is pasta? This is subject to knowledge only to the keval-jnani—the bearer of transcendental and pure knowledge of all the substances and all of their modes. Such keval-jnani who has annihilated his/her raga and dvesh  through the practice of ahimsa—non-violence, samyama—self-discipline and tapa—austerity with utmost rigour can grasp the actual disposition of any substance.

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The pursuit of keval-jnan through these rigorous practices cannot be a barren procedure. It’s purpose is to know the truth because the knowledge of the ultimate truth is conducive to the achievement of perfection.

This perfection is constituted by absolute freedom gained by the dissolution of all limitations and bonds, may it be of senses or of body which are all the impositions of foreign matter.

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Senses have their limitations. Everything can’t be known through senses. For instance Dr. Jagdeesh Chandra Bose discovered life in plants only 119 years back whereas Jain scriptures have listed plants and vegetations in the classifications of living being as vanaspati kaya—vegetation-bodied beings as long as 2600 years back, at the time when there were no substancial laboratories or instruments of research.

The keval-jnanis have also mentioned earth—soil, salt, gravel, coal, etc,; water—rain water, oceans, fog, pond, lakes, etc.; fire—lightnings, thunders, spark, etc.; air—intermittent winds, whirling winds, etc. to be living organisms even accomplished of instincts and consciousness. Where on the other hand it does not seem to be possible, atleast till now, for science to discover life in these classifications. Even the most powerful of micro-scopes cannot find any hint of life because the bodies of earth, water, fire and air are said to be innumerable times smaller than the bodies of humans, subhumans (animals), plants and even than the science-known micro-organisms. There are plenty more scientific concepts documented in Jain scriptures by the omniscients which have also been rediscovered by modern-scientific studies. Like the concept of Unit Space and Unit Time; Dimensionless paramanu and its motion; Wave—Particle Duality; Shells or spheres around planetary bodies; Black holes and so on.

I personally do not consider science as a tool to prove my spiritual-beliefs, not do I think spirituality and science to be completely contradictory, I repeat spirituality and science not religion and science. Because spirituality and religion are different again. Religion is a platform to achieve spiritual targets but is not spirituality in itself. Even though there are several aspects of cosmology, planetary sciences, biology, etc. where glaring disagreements and found, still the firm predictions of the omniscients coming true are unquestionable because of their superior source of knowledge, where on the contrary modern science it all about assumptions and unstable theories. Yet spirituality and science are not conflicting perspectives on the world, but rather differing approaches to the same end: seeking the truth.

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Here is a good news! Unlike other spiritual organizations where God or gods tend to live forever and devotees have to remain devotees till infinity, Jainism propounds everybody to be potent enough to achieve the state of supreme enlightenment through which corporeal, non-corporeal, all substances—subtle or gross with all their modes can be known. This is also the ultimate goal for every living-being irrespective of any species, caste, creed or sex because this is also the path to freedom from sorrow. Then a living-being after accomplishing the state of omniscience—keval-jnana, meets it’s so called final destination Moksha gradually by the gain of intrinsic purity resulting on account of the expulsion of all karmic matters [including (punya and papa)] and its consequences. Mission Accomplished.

क्या देव होते हैं? एक चिंतन, भाग-2

देव-अस्तित्व के सन्दर्भ में “क्या देव होते हैं? एक चिंतन, भाग-1” में मैंने जो विचार प्रस्तुत किए थे उनके बारे में जो प्रतिक्रिया देखने को मिली, वह काफी उत्साहवर्धक थी। आज इस विषय पर कुछ और महत्वपूर्ण तथ्यों की समीक्षा करने का प्रयास कर रहा हूँ।

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देवों को प्राकृतिक शक्तियों एवं महापुरुषों के प्रति अपनी श्रद्धा की अभियक्ति देने के एक माध्यम के रूप में विकसित किया गया था। मगर उनके प्रति श्रद्धा से उत्पन्न हुए चमत्कारिक प्रभावों ने उनके अस्तित्व को सत्य जैसा बना दिया। हालाँकि जिन चमत्कारों की चर्चा की जाती है, वे सभी मनोवैज्ञानिक एवं सामान्य वैज्ञानिक नियमों के आधार पर बिना किसी देव-सहायता के भी संभव हो सकते हैं, ऐसा प्रतीत होता है।

फिर भी सामान्यतः एक आम व्यक्ति यह मानने के लिए तैयार नहीं होता कि मैं भी बिना किसी दिव्य-सहयोग के कोई महान कार्य कर सकता हूँ। इसलिए कभी-कभी श्रद्धा के लिए किसी केंद्र की अपेक्षा महसूस होने लगती है और देव उस अपेक्षा की पूर्ति करने का एक सक्षम माध्यम बन जाते हैं। मनुष्य का जीवन प्रायः काल्पनिक वस्तुओं पर टिका हुआ है। एक कागज का टुकड़ा सिर्फ इसलिए कीमती बन जाता है क्योंकि उस पर करोड़ों लोग विश्वास करते हैं। विश्वास न हो तो उसकी कीमत रातों-रात समाप्त हो जाती है। जमीन का टुकड़ा देश बन जाता है और उसके प्रति श्रद्धा का भाव व्यक्ति को इतनी ऊर्जा से भर देता है कि वह उसके लिए अपनी जान न्योछावर करने के लिए तैयार हो जाता है। एक व्यक्ति के द्वारा प्रतिपादित किये कुछ सिद्धांत धर्म बन जाते हैं और उसकी रक्षा के लिए बड़े-बड़े धर्मयुद्ध अथवा जिहाद हो जाते हैं।

ठीक वही बात देव-श्रद्धा के बारे में है। एक पत्थर स्थापित कर रातों रात उस पर महान मंदिर बनाए जा सकते हैं, उसके चमत्कार की गाथाएं प्रचारित हो सकती है। इसके उदाहरण हमें अपने आस-पास देखने को मिल सकते हैं।

प्रश्न यह रह जाता है कि देव अस्तित्व को मानने से यदि कोई व्यक्ति को मानसिक आधार मिलता है, हिम्मत मिलती है, तो क्या बुरा है?

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इस सन्दर्भ में मेरा मंतव्य है कि जब तक व्यक्ति आध्यात्मिक समझ के प्राथमिक पायदान पर है, तब तक देव सहयोग पर विश्वास उसके लिए खुद पर विश्वास करने से बेहतर माध्यम हो सकता है क्योंकि यह सरल प्रतीत होता है। खुद में छिपी अनंत शक्तियों पर भरोसा करना उस परिस्थिति में संभव नहीं होता। ऐसे में देव-श्रद्धा, देव-पूजा का आलंबन लिया जा सकता है। परन्तु साथ ही साथ अपनी आध्यात्मिक समझ को विकसित करने का भी प्रयास करते रहना चाहिए।

अगला प्रश्न यह उठ सकता है कि यदि देव पूजा करनी ही हो तो कौनसे देवता का चयन करें?

जैसा कि हम पहले पढ़ चुके हैं प्रत्येक देवता किसी न किसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता है। चाहे वह ज्ञान हो या धन, शक्ति हो या सृजन। अगर देव अपने आप में किसी विचार का ही साकार रूप है तो हमारे लिए एक प्रारूप यह हो सकता है कि हम जिस विचार की साधना कर रहे हैं उस विचार से सम्बंधित देव की आराधना करें। जैसे सरस्वती की उपासना विद्या प्राप्ति के लिए की जा सकती है। इसी प्रकार धन-प्राप्ति के लिए लक्ष्मी की उपासना की जा सकती है। शक्ति की साधना के लिए एक विकल्प दुर्गा का हो सकता है। वहीँ वीतरागता की प्राप्ति के लिए तीर्थंकरों की उपासना-आराधना की जा सकती है।

देव-पूजा को लेकर अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। इनमें से किस विधि का चयन किया जा सकता है यह अपने आप में विचारणीय बिंदु है जिस पर हम इसी आलेख के आगामी भागों में चर्चा कर सकेंगें।

‘Mukesh vs. Anil’ converted into ‘Mukesh+Anil’

The Humanistic Gesture Has made Mukesh Ambani to top the God’s list of ‘Humanitarians’

Prof. Muni Mahendra Kumar

Prof. Muni Mahendra Kumar, the mastermind behind the I-ARTIST (International Ahimsa Research & Training Institute of Spiritual Technolgy), remarked that in the God’s list of ‘Humanitarians’ (not the Forbe’s list) the name of Shri Mukesh Ambani is now at the top. Mukesh’s gesture is to be assessed in the light of the fact that in past, Anil (his real brother) was his ‘contestant’.

Prof. Muni’s appreciation of Mukesh’s ‘magnanimous’ humaneness is as follows:

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“We are living in the world today where greed, selfishness, dishonesty, vengeance, jealousy, ego, cruelty etc. reign supreme in human mind. Running after monetary gains has shattered all values into smithereens, making man utterly greedy, egotistic and selfish. In such a state of affairs, what Shri Mukesh Ambani has done is, indeed, the highest summit of true religion and spiritualistic traits. “A friend in need, is a friend indeed.”

In almost all Indian school of darshan (philosophy) and dharma, in general and in Jainism, in particular, such kind of magnanimity has been considered to be the implementation of dharma in actual life. It is ‘applied dharma/adhyatma’.

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By selflessly giving the colossal sum of Rs. 550 crores to Anil’s company, his elder brother Shri Mukesh Ambani has shown that he has put into practice the maxim of Bhagvan Mahavira’s principle of Aparigrah, ‘mucchhaa pariggaho vutto naayputten taainaa’, which asserts that it is the ‘attachment to money (or any object)’ which amounts to ‘parigrah’, and not the money itself.

In view of such act of ‘detachment to money’, Shri Mukesh Ambani deserves the epithet, Manava-Ratna.

It is all the more heartening that Mrs. Neeta Ambani, the wife of Shri Mukesh Ambani, played the role of ‘Seeta’ by having a soft corner for his ‘devar’ (husband’s younger brother), just as Seeta had showered exquisite grace on her ‘devar’ Laxman. In a way, Neeta bhabhi has as if falsified those so called sociologists who generally depict ‘bhabhi’ to be ungraceful and envious of ‘devar’ in the matter of voluntary monetary dividends. She has, indeed, played an exemplary role of the lady, par excellence, by transcending the petty consideration of past misbehaviour from the side of her ‘devar’. But for her co-operation, it would have been impossible for Shri Mukesh Ambani to be considerate for his brother.

क्या देव होते हैं : एक चिंतन, भाग-1

देव, देवदूत, पितर, उच्च-स्तरीय चेतना आदि कुछ ऐसे शब्द हैं जिनको लेकर मानव सदा ही उत्सुक रहा है। आदिमानव भी देवपूजा करते थे इसके प्रमाण मिलते हैं। न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताएं चाहे वह सुमेरियन हो या बेबिलोनियन, ग्रीक हो या रोम सभी जगह देवों के अस्तित्व के सन्दर्भ में विश्वास रहे हैं। भारत में भी 5000 वर्ष से अधिक समय से देवपूजा का प्रचलन रहा है। विश्व की तमाम सभ्यताएं मुख्य रूप से बहुदेववादी रही है। एकेश्वरवादी कहलाने वाली ईसाई एवं इस्लामिक संस्कृति में भी एंजेल एवं पीरों के नाम पर अन्य देवों को भौतिक समस्याओं के समाधान हेतु पूजा जाता रहा है।

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क्या सच में देव अस्तित्व रखते हैं?
क्या वैज्ञानिक आधारों पर उनके अस्तित्व को सिद्ध किया जा सकता है?
क्या वे हमारी सहायता करते हैं?
क्या हमें उनकी पूजा करनी चाहिए?
उनकी पूजा का सम्यक विधान क्या है?
इत्यादि प्रश्न मानव मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं।

आज मैं अपने Blog में इसी सन्दर्भ में अपनी समझ और अनुभव के आधार पर कुछ तथ्य आपके समक्ष रखना चाहूँगा। हो सकता है कि आपका अध्ययन और पूर्व अवधारणाएं मेरे अनुभवों से मैच करे अथवा न करे, मगर चिंतन का एक नया द्वार अवश्य खुलेगा, ऐसा मैं विश्वास करता हूँ।

प्राचीन काल से जिन देवताओं पर मनुष्य विश्वास करता आया है आम तौर पर वे सभी प्रकृति में निहित शक्तियां थी। वेदों में जो ऋचाएं गाई गयी वे प्रायः प्राकृतिक रहस्यों एवं शक्तियों के प्रति अपनी आस्था की अभिव्यक्ति है। मनुष्य ने सूर्य को उगते हुए देखा और पाया कि सूर्य के साथ ही पूरी प्रकृति जाग जाती है, कण-कण में ऊर्जा का संचार हो जाता है, जब सूर्य नहीं होता तो सब कुछ थम जाता है, अँधेरे का मतलब है, भय। जंगल में जितने भी हिंसक जानवर हैं, वे रात्रि में अधिक सक्रिय हो जाते हैं। सूर्य के प्रति मानव के मन में एक श्रद्धा पैदा हुई और उसने सूर्य को देव मानना प्रारंभ कर दिया। समय बीता, और अग्नि का अविष्कार हुआ। सूर्य के जाने के बाद अग्नि एक ऐसा माध्यम बना जो जानवरों को दूर रखने में सहायक होता था, भोजन पकाने, और सर्दी की रातों में शरीर को गरम रखने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तो अग्नि को भी देवता का स्थान मिल गया। बादल और बारिश यदि सही समय पर न हो तो जीवन थम जाता है, न खेती होती है, न पीने का पानी मिलता है। तो उनकी शक्ति को नमन करते हुए उनको इंद्र देव के रूप में पूजा गया। समय-समय पर इसी प्रकार विभिन्न शक्तियों को भिन्न-भिन्न नाम दिए गए। आगे जाकर वेदों ने ‘एको सत् बहु विप्रा वदन्ति’ कह कर सभी देव शक्तियों को एक अस्तित्व का हिस्सा माना।

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समय के साथ समाज ने प्रगति की और कुछ ऐसे महापुरुष हुए, जिनका व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उनकी मृत्यु के बाद भी जन मानस में वे जीवित बने रहे। लोगों को निरंतर अपनी उपस्थिति का बोध वे कराते रहे। तो उनके इस अदृश्य स्वरूप को भी देव रूप माना गया और उनकी पूजा प्रारंभ हो गयी। शुद्ध आध्यात्मवादी जहाँ एक अस्तित्व को ही मानते रहे वहीँ आम जनमानस बहुदेववादी बना रहा।

कुल मिलाकर देव शक्तियां जन-मन में अपना स्थान कायम करने में सफल रही। तेतीस करोड़ देवी देवताओं का अस्तित्व भी प्रचार में आया।

यदि केवल कल्पना जगत् में ही इनका अस्तित्व होता तो शायद देवता चिरजीवी नहीं रह पाते। मगर लोगों ने भौतिक जगत पर उनके पड़ने वाले प्रभावों को भी महसूस किया। जब कभी कोई समस्या दीर्घ प्रयासों के द्वारा भी समाहित नहीं होती, तो देवों को इसका समाधान करने हेतु प्रार्थना की जाती और एक चमत्कारिक घटना की तरह समाधान हो जाता। ऐसी स्थिति में देवों के प्रति विश्वास केवल काल्पनिक ही नहीं रहा बल्कि उनके वास्तविक अस्तित्व के प्रति श्रद्धा भी हो गयी।

चूँकि विश्व किन नियमों के आधार पर संचालित होता है, इनका ज्ञान सभी को नहीं होता अतः अपनी समझ से आगे जो भी घटना घटित होती, उसको देव शक्ति द्वारा किये गए चमत्कार की तरह ही देखा जाता और उनके प्रति आस्था और भी अधिक बढ़ जाती।

अब यह तो स्पष्ट है कि देवपूजा की प्रक्रिया और देवश्रद्धा में कुछ ऐसा है जो हमारे जीवन के लिए उपयोगी तत्वों की पूर्ति करने में सहायक होता है। अतः उसकी उपयोगिता और आवश्यकता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। समझने की बात यह है कि देवपूजा को सिर्फ एक रूढ़ि की तरह करें या समझपूर्वक।

मेरे लिए देवता कोई व्यक्ति नहीं है, अपितु वे कलेक्टिव कांशसनेस अथवा सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। उनका अस्तित्व हमारी चेतना में है। अगर हम हैं तो वे हैं। हमारा विश्वास जितना प्रबल है उनके प्रति, उनका अस्तित्व भी उतना ही सशक्त है। अब यदि हम उनके प्रति श्रद्धा नहीं रखते तो वे कम से कम हमारे लिए तो मौजूद नहीं हैं।

अब यदि देवों को माने तो किस रूप में मानें और उनकी पूजा किस तरह करें ताकि वे हमारी समस्याओं का समाधान कर सकें, इस सन्दर्भ में जानने के लिए इसी blog के भाग-2 का इंतज़ार करें। आज के लिए बस इतना ही….

मनोहर पर्रिकर को मरने से रोकना होगा……

manohar parrikar

राजनीति के कीचड़ में कमल की तरह निर्लिप्त रहने वाले, वाणी से नहीं जीवन से कहने वाले, संयम और सादगी की मिसाल एवं निर्भीक राजनेता श्री मनोहर पर्रिकर सशरीर इस विश्व में नहीं रहे।

तूफान का प्रवाह आता है, तो उसके साथ बह जाने वाले असंख्य देखे हैं, पर धारा के विपरीत चलने का दुस्साहस कोई-कोई ही करता है। अधिकारों की प्राप्ति होने के बाद संयम होना अत्यंत मुश्किल होता है, इस बात तो श्री पर्रिकर ने गलत साबित किया है। जिनके पास कुछ नहीं होता वे त्याग, संयम, ईमानदारी की बात बेहद आसानी से कर लेते हैं, मगर मुख्यमंत्री एवं रक्षा मंत्री जैसे अधिकारपूर्ण पदों पर बैठने के बाद भी सात्विक, सरल और संजीदगी का जीवन जीकर वे लोगों के लिए प्रेरणा-पाथेय बन गए।

भौतिक शरीर का अपना धर्म है, उसे एक दिन नष्ट होना ही होता है, मगर एक शरीर वह होता है जो हमारे विचारों से बनता है। वह हमारे भौतिक शरीर की उम्र से बहुत बड़ा भी हो सकता है।

एक बार जोधपुर के महाराजा अपने नौकर के साथ किले की दीवार पर घूम रहे थे। चलते-चलते वे एक ऐसे स्थान पहुंचे जहाँ बहुत बड़ी खाई थी। उसे देखकर महाराजा ने नौकर से एक सवाल किया:- यदि कोई व्यक्ति इस खाई में गिर जाये जो कितना बड़ा धमाका होगा?

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नौकर ने जवाब देते हुए कहा:- महाराज! यह तो गिरने वाले व्यक्ति पर निर्भर करता है।

महाराज ने पुछा:- कैसे?

नौकर ने कहा:- अगर कोई मेरे जैसा सामान्य व्यक्ति गिरेगा तो उसकी गूंज सिर्फ 100-200 लोगों तक सुनाई देगी। पर यदि आप गिर जाएँ तो नौ कोटि मारवाड़ में गूंज होगी, और जो और आस-पास के राज्यों तक भी उसकी गूंज सुनाई देगी

मनोहर पर्रिकर भले ही गोवा जैसे एक छोटे से राज्य के नेता थे मगर उनके व्यक्तित्व ने उनको वैश्विक स्तर पर पहुंचा दिया। अगर उनकी सात्विकता और संयम का अंश भी हम जी सकें तो उनको फिर से जीवित कर सकते हैं और सच कहें तो उनका जाना देश के लिए हितकर नहीं है, हमें उन्हें रोकना होगा। बिना किसी श्रद्धांजलि के, बिना किसी RIP (rest in peace) के (मैं नहीं चाहता कि वे शांति से विश्राम करें क्योंकि अभी बहुत काम बाकी है)…..

जय हिन्द, जय भारत

हॉस्पिटल में इलाज के दौरान जीवन की नश्वरता एवं जीवन के कर्तव्यों के बारे में जो उन्होंने कहा उसका एक चयनित पार्ट मैं यहाँ शेयर करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।

As you run through the rat race of life pursuing success one must realize that at some point of time you have to reach the last part of drama in the theater where end of the show is visible.

So, learn to first look after yourself, take care of others, learn to spend your money and shower your feelings on people around you…..

Manohar parrikar’s words while he is under treatment for pancreatitis in us hospital

इस Weekend कुछ खास हो जाये

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Weekends……. एक खुबसूरत अहसास। मगर कब तक? जब तक कि वो आ नहीं जाते।
आने के बाद…..लगता है कि बस यूँ ही चले गए। कहते हैं कि

“Weekends are like rainbows. They look great from the distance. But once you get up close to them, they start to disappear.”

“The only thing that travels faster than light is weekends.”

हमेशा यह सोचते हैं कि Weekend एन्जॉय करेंगें। परिवार को टाइम देंगें। खुद को टाइम देंगें। मगर सिर्फ कल्पना में ही उलझकर कर जाती है सारी योजनायें। चाही-अनचाही व्यस्तताएं हों या कुछ और पा लेने की धुन, जिंदगी को बेहतर बनाने के चक्कर में जिंदगी हम जी ही नहीं पाते।

आइये इस Weekend पर कुछ नया करें…कुछ ऐसा जो Future बनाने के लिए नहीं बल्कि वर्त्तमान बनाने के लिए हो….. ।

  • Digital उपवास रखें। यानि जरुरी कार्यों के अलावा स्मार्टफ़ोन से दूर रहें।
  • प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताएं। उस दौरान पूर्णतया मौन रहें और वातावरण में हो रहे परिवर्तनों को गहराई से देखें।
  • परिवार के साथ समय बिताएं। अपने बचपन की यादें उनके साथ शेयर करें। कुछ आसान से खेल खेलें। फिर से बच्चे बन जाएँ।
  • लॉन्ग ड्राइव पर चले जाएँ और उस दौरान रास्ते के सुनहरे दृश्यों का आनंद लें।
  • शांत संगीत बजाएं और उसकी धुन को अपने तन, मन और ह्रदय को छूने दें। यदि शरीर में कोई नृत्य पैदा हो तो उसका साथ दें।
  • खाना खाने बैठें तो उसके हर कौर को पूरी सजगता के साथ खाएं, बिना किसी हड़बड़ी के।

सप्ताह के 5-6 दिन काम करने के दौरान जो जल्दबाजी होती है हर कार्य में,
उससे हटकर बेहद शांति से हर एक कार्य का मजा लेते हुए Weekend बिताएं।

जब जिंदगी का सूरज ना उगे तो खुद सूरज बन जाएं….

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कभी ऐसा हुआ है कि कोई मधुमक्खी उड़ते उड़ते आपके कंधे पर आ कर बैठ गई हो… और बिना इरिटेट हुए आपने इस संभावना पर ध्यान दिया हो कि शायद मधुमक्खी ने आपको फूल समझ लिया है!

जिंदगी ठीक वैसी ही है जैसी हम उसे स्वीकार करते हैं।

जब एक हवा का झोंका छू जाए…..
धूप का नन्हा सा कतरा आंगन में अठखेलियां करे….
या बादल का कोई टुकड़ा अचानक से छाया कर दे!
तो उसे इग्नोर मत कीजिए यह जिंदगी है जो आप से बोलने की कोशिश कर रही है
वह बताना चाहती है कि वह आपके साथ है।

आज के दिन यह संकल्प कीजिए कि मैं दिन भर में कम से कम 10 बार प्रकृति के द्वारा दिए गए सुखद एहसासों के लिए आभार प्रदर्शित करूंगा। वे सुखद एहसास कुछ भी हो सकते हैं…

  • उगता उगता हुआ सूरज..
  • स्वादिष्ट भोजन…
  • किसी अनजान के द्वारा दी गई एक मुस्कुराहट
  • अचानक से सुनाई देने वाली संगीत की मधुर धुन
  • थके हारे शेड्यूल के बाद आराम के कुछ पल
  • अपने परिवार के साथ होने का एहसास
  • और हां! किसी के द्वारा भेजा गया एक अच्छा मैसेज या चुटकुला…

जिंदगी हमें बहुत सारे अवसर देती हैं खुश होने के लिए.. जरूरत है कि हम अपनी आंखें खुली रखें और उन पलों की खुशी मनाएं..

अगर आप चाहें तो अपनी खुशी के ये पल मेरे साथ भी शेयर कर सकते हैं और बता सकते हैं आज आप क्यों खुश हैं?

अपने शरीर का शुद्धिकरण करें Water Meditation के साथ…..

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  1. ध्यान के लिए किसी एक सुखद आसन और मुद्रा का चुनाव करें। आँखें कोमलता से मुंदी हुई हों। कुछ देर तक सामान्य गति से साँस लें और हर साँस के साथ ख़ुद को आरामदायक और शिथिल होते हुए महसूस करें। महसूस करें कि आप एक समंदर के किनारे खड़े हैं। कल्पना करें कि यह समंदर शुद्ध पारदर्शी पानी से भरा हुआ है उस पानी में कोई कचरा नहीं है न ही किसी भी प्रकार की अशुद्धि है, बिलकुल तरोताजगी से भरा हुआ पानी।
  2. अनुभव करें कि आप पानी के अंदर खड़े हैं। अपने पैरों को पानी के एक स्ट्राॅ की तरह महसूस करें। जैसे ही आप सांस भरते हैं, उस स्ट्राॅ के माध्यम से पानी आपके शरीर में भर जाता है और वह आपके पूरे शरीर का सारा अशुद्ध भाग लेकर सांस छोड़ने के साथ ही वापस बाहर निकल जाता है।
  3. इस प्रक्रिया को बार-बार करें और हर बार अपने शरीर को और भी अधिक स्वच्छ और शुद्ध होते हुए महसूस करें। तीन सामान्य गहरी सांस के साथ प्रयोग को संपन्न करें।

एक कोना साधना के लिए भी बनाएं …

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कहते हैं कि साधना कहीं भी की जा सकती है परंतु स्थान का भी कुछ महत्व होता है इस बात से कोई मुकर नहीं सकता।

अच्छा शांत स्थान जहां हमें साधना की गहराइयों तक ले जा सकता है, वहीं बहुत सारी बाधाओं से भरा हुआ, कदम कदम पर समस्याएं पैदा करने वाला स्थान हमें साधना से भटका भी सकता है। जब तक हम साधना के प्राथमिक स्तर पर होते हैं तब तक एक छोटी सी बाधा भी हमें साधना से हरदम के लिए दूर कर सकती है इसलिए जरूरी है कि हम अपनी साधना-स्थली को बहुत ही तफसील से बनाएं और उसमें ऐसे संसाधनों का इस्तेमाल करें जो हमारी साधना में सहायक हों।

वैसे तो 5 मिनट के लिए अपने ऑफिस का दरवाजा बंद करके या फिर सुबह उठने के बाद बिस्तर पर ही 5 मिनट तक आँखें बंद करके सांसो पर ध्यान केंद्रित करके अथवा आत्म चिंतन करके भी साधना की जा सकती है। परंतु यदि एक अच्छा सुव्यवस्थित स्थान उपलब्ध हो तो साधना के शिखर पर चढ़ना काफी आसान हो जाता है। आज इस ब्लॉग में हम इसी विषय पर चर्चा करेंगे कि किस तरह अपनी साधना स्थली को डिजाइन किया जाए ताकि हम उसका मैक्सिमम बेनिफिट उठा सकें।

  • साधना करने के लिए जिस स्थान का चयन करते हैं वह घर का एक पूरा कमरा अथवा किसी अन्य कमरे का छोटा सा कोना भी हो सकता है।
  • स्थान का चयन करने के दौरान इस बात का ध्यान रखें कि वह स्थान प्राकृतिक रोशनी, हवा आदि से समृद्ध हो।
  • वह स्थान शांत हो और बाहरी बाधाओं से मुक्त हो।
  • ऐसा स्थान जहां पर बहुत सारा सामान भरा हुआ है बहुत सारा फर्नीचर हो साधना के लिए उपयुक्त नहीं होता क्योंकि सामान भी ऊर्जा सोख लेता है। वहीं वह हमारे मस्तिष्क को भी डायवर्ट करता है।

हम अपनी पांचों इंद्रियों के माध्यम से वातावरण में विद्यमान तरंगों को ग्रहण करते हैं। तो यह बेहतर होगा कि इन सभी इंद्रियों के लिए सकारात्मक ऊर्जा देने वाले तत्व साधना स्थल पर मौजूद हों।

  • चक्षुरिन्द्रिय: वीतराग भावों को प्रकट करने वाले तीर्थंकरों की मूर्ति हमारे मन को भी शांत कर देती है। आलंबन के रूप में मूर्ति का प्रयोग किया जा सकता है बस इतना ध्यान रहे कि वह मूर्ति बहुत ज्यादा सजी-धजी ना हो। उस पर भौतिक वस्तुओं का श्रृंगार न किया गया हो।

  • घ्राणेन्द्रिय: तरोताजगी देने वाली सुगंध भी कमरे की ऊर्जा को बढ़ा सकती है। इसके लिए धूप अगरबत्ती का इस्तेमाल किया जा सकता है अथवा एसेंशियल ऑयल जो कि विभिन्न प्रकार के फ्लेवर्स में उपलब्ध हैं उनका भी प्रयोग कर सकते हैं।

  • श्रोत्रेन्द्रिय: शांति पैदा करने वाला संगीत साधना में सहायक हो सकता है। संगीत के अलावा तिब्बत में प्रचलित बाउल्स, शंख आदि का भी उपयोग किया जा सकता है।

  • रसनेन्द्रिय: बौद्ध संस्कृति में ध्यान से पूर्व ब्लैक टी अथवा ग्रीन टी पीने की परंपरा है और इसके लिए बकायदा टी सेरेमनी भी मनाई जाती रही है यह प्रक्रिया हमारे टेस्ट के माध्यम से मन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

  • स्पर्शनेन्द्रिय: स्पर्श की अनुकूलता के लिए इस बात का बंदोबस्त किया जा सकता है कि कमरे का तापमान ना अधिक गर्म हो और ना ही अधिक ठंडा। शुद्र जंतुओं मक्खी मच्छर आदि का भी वहां पर उपद्रव ना हो।