संवेदनाओं को बनाएं अपनी ताकत

  • क्या आपको ऐसा लगता है कि आप दूसरों की संवेदनाओं को बहुत जल्दी समझ जाते हैं?
  • क्या कभी कभी ऐसा होता है कि आप भविष्य को लेकर के बिल्कुल सही अनुमान लगा लेते हैं?
  • क्या लोगों के शब्दों के बजाय आप उनकी ऊर्जा से उनके बारे में ज्यादा गहराई से जानकारी प्राप्त करते हैं?
  • क्या किसी नकारात्मक आदमी के साथ रहकर बहुत जल्दी ही खुद को थका हुआ महसूस करते हैं?
  • क्या कभी ऐसा भी हुआ है कि अनजान लोगों ने आपसे सलाह मांगी है?

इन प्रश्नों पर गहराई से चिंतन करें और खुद से उत्तर मांगें। अगर इनमें से अधिकतर प्रश्नों के उत्तर हां में हैं तो इसका मतलब है कि आप काफी संवेदनशील हैं। हो सकता है कभी-कभी अपनी इस संवेदनशीलता को लेकर आप काफी परेशान महसूस करते हों मगर अगर सही तरीके से इस संवेदनशीलता का प्रयोग किया जाए तो आप एक अच्छे साधक तो बन ही सकते हैं अपने दिन में एक बार खुद को यह सुझाव दें कि मैं इस प्रकृति से अलग नहीं हूं बल्कि इस पूरीभीतर की अध्यात्मिक शक्तियों को जागृत कर दूसरे लोगों की सेवा भी कर सकते हैं।

इस दुनिया में हर व्यक्ति अपने आप में एक भिन्न व्यक्तित्व लेकर के आता है। अगर लोगों के व्यक्तित्व को गौर से देखा जाए तो कुछ प्रकार के भेद का भेद स्पष्ट तौर पर उभर करके आते हैं।

जैसे कुछ लोग काफी तार्किक होते हैं वह सिर्फ तथ्यों के आधार पर ही बात करना पसंद करते हैं उनकी नजर में संवेदनाएं और दिल की आवाज कोई महत्व नहीं रखते।

वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने भीतर की आवाज पर भरोसा करते हैं और अपने निर्णय उस आवाज के आधार पर लेते हैं।

तथ्य पर जीने वाले लोग जिस प्रकार की सफलताएं प्राप्त करते हैं वे प्रायः भौतिक होती हैं क्योंकि उनकी नजर में वही महत्वपूर्ण होता है जो बाहर दिखाई देता है अदृश्य शक्तियों के बारे में न तो किसी प्रकार का कोई विश्वास रखते हैं और ना ही उनके बारे में गहराई से सोचते हैं।

वहीं संवेदनशील लोग अध्यात्मिक स्तर पर उन्नत होने की संभावनाएं लिए हुए होते हैं परंतु तब तक अपना सही विकास नहीं कर पाते जब तक कि उनकी संवेदनाओं को सही दिशा नहीं मिल जाती।

अगर आपको लगता है कि आप सच में एक संवेदनशील व्यक्ति हैं और उन संवेदनाओं के माध्यम से आपको कुछ खास तरह के अनुभव हो रहे हैं तो बेहतर होगा कि अपनी इस शक्ति को व्यर्थ न जाने दें।

कुछ बिंदुओं पर ध्यान देकर न सिर्फ आप अपनी इस शक्ति को विकसित कर सकते हैं अपितु इस के माध्यम से लोगों की सेवा भी कर सकते हैं।

  • दिन में कम से कम 1 घंटे तक मौन का गहन अभ्यास करें इस समय के दौरान हो सके वहां तक कुछ भी न पढ़ें और इलेक्ट्रॉनिक गैजटस् से भी दूर रहे।
  • सप्ताह में एक दिन कम से कम 3 घंटे शुद्ध प्रकृति के सानिध्य में अपना समय बिताएं। इस समय के दौरान प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों को निहारे और खुद को अपने आसपास से जुड़ता हुआ महसूस करें।
  • झूठ, धोखाधड़ी जैसी आदतें हमारी आंतरिक आवाज को बंद कर देती हैं इसलिए इनसे बचें।
  • कभी भी बोलने से ज्यादा सुनने पर और महसूस करने पर ध्यान दें।

संवेदनशीलता प्रकृति का दिया हुआ एक खूबसूरत उपहार है इस उपहार की रक्षा करें इसे सहेज कर रखें और इसको विकसित करें।

इस संदर्भ में यदि आप के कोई अनुभव हैं तो कमेंट सेक्शन में आप शेयर कर सकते हैं।

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evo4soul क्या है……?

क्या कभी आपने यह सोचा है कि आप इस धरती पर क्यों आए हैं?

क्या आपने कभी यह सोचा है कि एक खास तरह का माहौल, एक खास तरह के माता-पिता, समाज और पड़ोस आपको क्यों मिला?

क्या आपने कभी यह सोचा है कि आप को मिलने वाली खुशियों का क्या उद्देश्य है ?

और साथ ही साथ क्या उद्देश्य है उन दुःखों का जो हमारे चाहे अनचाहे जिंदगी में दस्तक देते रहते हैं?

सवाल सवाल और सवाल……!!!!!!

एक महान वैज्ञानिक हो गए हैं चार्ल्स डार्विन, जिन्होंने थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन का सूत्रपात किया था। इस थ्योरी के अनुसार यह संपूर्ण विश्व एक क्रमिक विकास के पथ पर चल रहा है। इस विकास के क्रम में वे व्यक्ति आगे निकल पाते हैं जो अपने आसपास के माहौल में विद्यमान मुश्किलों का सबसे बेहतरीन तरीके से मुकाबला कर पाते हैं और खुद को खत्म होने से बचा पाते हैं। इस थ्योरी को सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट के नाम से जाना गया।

इस theory के अनुसार जिंदगी का उद्देश्य है:

अपने आसपास की परिस्थितियों से सीखना और क्रमशः अपना विकास करना।

एक प्रसिद्ध हॉलीवुड फिल्म लूसी में एक महान वैज्ञानिक का किरदार अदा करते हुए मॉर्गन फ्रीमैन बहुत ही सुंदर बात कह गए:

धरती पर जब से जीवन की शुरुआत हुई है तब से लेकर आज तक, हर एक कोशिका का एकमात्र उद्देश्य रहा है, अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करना।

एक छोटी से छोटी कोशिका भी यही कार्य करती हैं अपने जैसी एक और कोशिका का निर्माण, जिसमें वह अपना सारा ज्ञान हस्तांतरित कर देती है।

इस प्रकार हम देख सकते हैं जिंदगी में मिलने वाली हर परिस्थिति चाहे वहां खुशी हो या दुख हमें कुछ ना कुछ अनुभव देकर के जाती हैं कुछ ना कुछ सिखा करके जाती है और उस पूरी प्रक्रिया के गुजर जाने के बाद हम ठीक वैसे नहीं रह जाते जैसे कि पहले थे। यह कहा जाए तो बेहतर होगा कि मुश्किल हालात हमें ज्यादा अनुभव देकर के जाते हैं।

To learn is always a painful process

इस प्रकार हम देख सकते हैं इस धरती पर जन्म लेने के पीछे हमारे मुख्य रूप से दो उद्देश्य हैं

  1. खुद को पहले से बेहतर बनाना।
  2. अपने अनुभवों को हस्तांतरित करना।

evo4soul का फुल फॉर्म है ‘evolution process for soul’ अर्थात आत्मा के क्रमिक विकास की प्रक्रिया। इसके अंतर्गत हम जीवन को बेहतर बनाने वाली पद्धतियों पर शोध करते हैं ताकि जो छोटी सी जिंदगी मिली है उसे हम शानदार तरीके से जी सकें और अपने उद्देश्य को सही प्रकार से पूरा कर सकें।

प्यार हुआ चुपके से……

क्यूं नये लग रहे हैं ये धरती गगन

मैंने पूछा तो बोली ये पगली पवन

प्यार हुआ चुपके से….

प्यार तो हुआ पर इस प्यार की मंजिल किसी और को पाना नहीं था बल्कि खुद को ही पाना था। कहा जाएं तो अब तक जो कुछ किया था उसका उद्देश्य खुद को खुश करना नहीं था बल्कि दूसरों की नजर में खुद को साबित करना था लेकिन 1 दिन आया जब नजरें बाहर से भीतर की तरफ मुड़ गई और दूसरों को खुश करना जिंदगी का लक्ष्य नहीं रहा।

खुद से प्यार होते ही जिंदगी के कुछ तौर-तरीके बदल गए। क्योंकि अब मेरी मंज़िल बदल चुकी थी इसलिए मेरा रास्ता भी बदल गया। ऐसा नहीं है कि इस रास्ते पर सिर्फ फूल ही फूल थे, लेकिन चूंकि यह मेरा बनाया हुआ रास्ता था इसलिए इस रास्ते पर आने वाले कांटे भी फूलों से कम नहीं लगते थे।

बेशक, अगर आप खुद से प्यार करते हैं तो अपने बनाए हुए रास्ते पर ही चलेंगे। फिर भी कुछ बिन्दुओं को अगर ध्यान में रखेंगे तो इस रास्ते पर बेफिक्र होकर चल सकेंगे।

  • अपने अनुभवों पर भरोसा करें।
  • आप जो चाहते हैं उसे स्पष्टता से कहना सीखें।
  • लोगों को खुश करने वाले के रूप में अपनी छवि ना बनने दें।
  • खुद के बारे में नकारात्मक बात ना बोलें।
  • अपने सपनों का पीछा करना ना छोड़ें।
  • ना कहने से ना डरें।
  • हां कहने से ना डरें।
  • जिस परिस्थिति पर आपका नियंत्रण ना हो उसे जाने दें।
  • खुद के प्रति दयालु बनें।

मैं एक बात का हमेशा ध्यान रखता हूं कि कभी भी खुश होने के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं होता और खास तौर पर अगर मैं कभी दुखी हूं तो अपना दुख दूर करने के लिए दूसरों के पास कभी नहीं जाता। मुझे लगता है, दूसरों के पास मुझे तभी जाना चाहिए जब मेरा ह्रदय सामान्य हो और खुशियों से भरपूर हो।

वैसे आमतौर पर लोग कहा करते हैं कि दुख बांटने से हल्का होता है और खुशियां बांटने से बढ़ती हैं। मगर यदि आप सेल्फ लव के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि अपने दुखों का सामना अकेले करना सीखें और उसका समाधान भी बाहर नहीं अपने अंदर ही खोजें।

सेल्फ लव के संदर्भ में और अधिक जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स पर क्लिक करें।

सेल्फ लव की यात्रा पर आपका हार्दिक स्वागत है…

एक गलती हो गई मुझसे….

एक गलती हो गई मुझसे
तुम्हारे प्रति।

मैं याद करता हूं उन पलों को
जिन पलों में …
मैंने खुद को दोषी ठहराया है
याद करता हूं मैं उन पलों को
जिन पलों में ……….
मैंने खुद को रोता हुआ पाया है
मैंने महसूस किया है
दर्द को सीने में कुलबुलाते हुए
कुछ दिखाते और कुछ छिपाते हुए
पर मेरा भी एक सपना था
और वह सपना हर उस दर्द से बड़ा हो गया
क्योंकि उस सपने ने दी मुझे
जीने की वजह
कुछ करने की ताकत
और
वह गलती ही बन गई
मेरे लिए इबादत

क्या अब भी तुम
सिर्फ उस गलती से ही मुझे
परिभाषित करते रहोगे
या
मेरे सपनों को भी गले लगाओगे।

5 शक्तिशाली मंत्र जो बदल सकते हैं हमारी दुनिया

इस दुनिया में जो कुछ भी दिखाई देता है या महसूस होता है वह सब कुछ विशेष प्रकार की तरंगों से बना हुआ है जिसे हम वाइब्रेशंस कहते हैं।

हम हम जिन शब्दों का प्रयोग करते हैं उनके भी अपने वाइब्रेशंस हैं। उन शब्दों के द्वारा भी हम लोगों को प्रभावित करते हैं कभी सकारात्मक रूप में तो कभी नकारात्मक रूप में। हम दूसरों को कितना प्रभावित करते हैं यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण है कि हमारे शब्द खुद हमें कितना प्रभावित करते हैं। हमारे शब्द हमारे लिए शाप भी बन सकते हैं और वरदान भी बन सकते हैं क्योंकि हमारे शब्द एक सोच का प्रतिनिधित्व करते हैं।

हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने शब्दों की ऐसी ताकत को समझा और मंत्र शास्त्र का निर्माण किया। समय के साथ मंत्र हमारे जीवन का एक रहस्यपूर्ण हिस्सा बनते चले गए।

आमतौर आमतौर पर जब मंत्र की चर्चा की जाती है तो हमारे मन में कुछ ऐसे शब्द आते हैं जो हमारी आम बोलचाल की भाषा से अलग संस्कृत प्राकृत आदि प्राचीन भाषाओं में निर्मित होते हैं या फिर कुछ ऐसे बीज अक्षर होते हैं जो उच्चारण करने में काफी कठिन होते हैं।

लेकिन एक महान ऋषि ने यह कहा है कोई भी अक्षर मंत्र हो सकता है। यहां तक कि उन्होंने यह भी कहा है ऐसा कोई अक्षर है ही नहीं जिसे मंत्र ना कहा जा सके। बस जरूरत है तो उसे सही रूप में समझने की और उसका सम्यक प्रयोग करने की।

वैसे आप सभी लोगों ने थ्री ईडियट्स फिल्म जरूर देखी होगी जिसमें रणछोड़दास चांचड़ के रूप में जो किरदार नजर आता है वह लोगों को एक मंत्र सिखाता है ‘All is well’। वह मानता है कि इस मंत्र के माध्यम से भले ही हमारी समस्याएं दूर ना हो परंतु समस्याओं को झेलने की हमारी ताकत में तो इजाफा होता ही है।

आज मैं कुछ ऐसे ही सकारात्मक शब्दों की चर्चा कर रहा हूं जिससे मंत्र के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है-

1. मैं अपने चारों तरफ प्यार और करुणा की सकारात्मक तरंगों को महसूस कर सकता हूं।

2. मैं आज के दिन हर परिस्थिति में खुश रहने का निर्णय लेता हूं।

3. अतीत की गलतियों के लिए मैं खुद को माफ करता हूं।

4. यह भी चला जाएगा।

5. मेरी जिंदगी में जो कुछ अच्छा हो रहा है उसके लिए मैं कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं।

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धर्म परिवर्तन : एक ज्वलंत समस्या

अपने बेहतरीन प्रश्न उत्तरों के लिए विख्यात वेबसाइट quora.com पर पिछले दिनों एक प्रश्न पूछा गया।

भारत के कुछ राज्यों में लोग हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्म क्यों अपना रहे हैं?

इस प्रश्न का जो जवाब मेरे द्वारा दिया गया उसे मैं यहां शेयर कर रहा हूं।

“पिछले काफी समय से इस बात पर चर्चा हो रही है कि लोग धर्म परिवर्तन कर रहे हैं और इस धर्म परिवर्तन के लिए कुछ समुदाय विशेषों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

“जहां तक कि मैं समझ पाया हूं कि जो भी व्यक्ति भारत के पिछड़े राज्यों में रहते हैं खासतौर पर आदिवासी इलाकों में रहने वाले लोग वे प्रायः धर्म के तौर पर अपने स्थानीय देवी देवताओं का ही अनुसरण करते हैं इस दृष्टि से यह कहना उचित नहीं होगा कि वे हिंदू धर्म के अनुयाई थे। क्योंकि वे वेद विहित मार्ग का अनुसरण नहीं करते थे। प्रायः हिंदू धर्माधिकारी उन्हें अछूत मानते थे और शताब्दियों में भी उन्होंने कभी जाकर उनकी सुध ली हो ऐसा नहीं लगता। जब उन लोगों ने अपना पारंपरिक धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाया तब जाकर उन लोगों पर इस बात को लेकर प्रश्न खड़े किए गए कि उन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपना लिया है।

“इस संदर्भ में कोई प्रश्न खड़ा करने से पूर्व हमें खुद से कुछ प्रश्न पूछने चाहिए। जैसे, क्या हम अपनी बहू बेटियों को घर छोड़ कर समाज सेवा के नाम पर उन लोगों के बीच जाने की अनुमति दे पाएंगे? क्या हम मंदिरों में होने वाले करोड़ों रुपयों में से कुछ प्रतिशत उनकी शिक्षा एवं स्वास्थ्य के लिए विसर्जित कर पाएंगे?

“हमारे पास एक महान जीवन दर्शन है और भारतीय संस्कृति अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास के साथ समृद्ध है। अगर हम इसे विदेशी या पाश्चात्य आक्रांताओं से बचाना चाहते हैं, तो इसके लिए विरोध एकमात्र उपाय नहीं है, इसके बजाय हमें कुछ सृजनात्मक करना होगा। कुछ एक संगठन इस दृष्टि से प्रयत्न भी कर रहे हैं परंतु जब तक हमारे भारी भरकम देवालय उन प्रयत्नों की सुध नहीं लेंगे तब तक मुझे नहीं लगता कि हम उनके सामने टिक पाएंगे।”

आशा है इस जवाब ने आपको सोचने के लिए विवश किया होगा। इस संदर्भ में आप अपने विचारों से मेरे ज्ञान कोष को और भी वृद्धिंगत करेंगे, तो मुझे प्रसन्नता होगी।

Jain Muni beats diabetes by fasting

Jain Muni professor Mahendra Kumar ji, at the age of 82, underwent intermittent fasting, initially starting from 4 hours fasting and reaching to 42 hours fasting under the deep observation of Dr. Roshani Sanghani, has clinically proved that this kind of fasting not only reduces weight and diabetes but also recharges and rejuvenates exuberant energy as a youth. Before initiating this kind of fasting and controlled diet process, he used to take 56 units of insulin per day but now he doesn’t need any insulin at all. It’s an innovative inspiring incident, which has motivated and inspired multiple patients undergoing severe diabetes.

LOVE YOU ZINDAGI…LOVE ME ZINDAGI..!

आज मैं चर्चा करने जा रहा हूँ एक movie की, जिसने आज की मेरी दुपहरी में एक अनूठी खुशबू भर दी….
और ये movie थी “Dear zindagi”
ज़िन्दगी परिवर्तन के दौर से गुजरती है, कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे हमारा अपनी ही ज़िन्दगी पर complete control नहीं है। ऐसे समय में लगता है That the complete universe is working against you.
मगर ऐसा होता नहीं है….
Dear Zindagi ने कुछ ऐसा ही सिखाया
खास तौर पर इस movie के एक song ने तो दिल ही छू लिया, लव यू ज़िन्दगी…
उस गीत की कुछ पंक्तियाँ शेयर करने से मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ…आशा है ये पंक्तियाँ आपको प्रेरणा देंगी

जो दिल से लगे
उसे कह दो हाय हाय हाय
जो दिल न लगे
उसे कह दो बाय बाय बाय
आने दो आने दो दिल में आ जाने दो
कह दो मुस्कराहट को हाय हाय हाय हाय
जाने दे जाने दो दिल से चले जाने दो
कह दो घबराहट को बाय बाय बाय बाय बाय बाय..
लव यू ज़िन्दगी लव यू ज़िन्दगी लव यू ज़िन्दगी लव यू ज़िन्दगी

पूरी movie देखने के बाद सिर्फ इस song को ही तीन-चार बार सुन डाला, ऐसा लगा आस पास पड़ी हर एक चीज थोड़ी ज्यादा खुबसूरत हो गयी है। इस movie में मनोचिकित्सक का रोल करने वाले डॉ. जहाँगीर (शाहरुख़ खान) ने अपनी पेशेंट काइरा को एक example दिया चेयर्स के बारे में। जब हम एक दुकान में चेयर खरीदने जाते हैं तो कई सारी चेयर try कर के देखते हैं, फिर उनमें से एक चेयर choose करते हैं। पहली बार किसी चेयर को try किया इसका यह मतलब नहीं कि उसी को जीवन भर ढोते रहेंगें।
जिंदगी में हमारे पास चुनने के लिए बहुत कुछ होता है। हम गलती भी करते हैं चुन लेने में और और जब एक बार किसी चीज को चुन लिया तो उसको छोड़ना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। हम कितने भी अनुभवी हो जाएँ, इस तरह की गलतियाँ पूरी तरह से नहीं छूटती। गलतियां ही तो हमें इन्सान बनाती हैं….
इसलिए जब लगे कि कुछ ऐसा चुन लिया है जो जिंदगी में बोझ बन रहा है, तो पुनर्चिन्तन करना बुरा नहीं है।

जो दिल से लगे
उसे कह दो हाय हाय
जो दिल न लगे
उसे कह दो बाय बाय

It seems quite simple.. but it’s not.
काफी मुश्किल आती है, खुद से ही लड़ना पड़ता है….पर

जाने दे जाने दो दिल से चले जाने दो
कह दो घबराहट को बाय बाय

Because I LOVE YOU! ZINDAGI….LOVE YOU! ZINDAGI

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खुद के साथ Dating पर गए हो कभी?

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अपने उन प्यार भरे लम्हों को याद कीजिये जो आपने अपने जीवन साथी के संग बिताये हैं। वो पल जब आप पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति से मिले थे जिसको आप अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर सकते हैं, जिसके साथ अपना हर राज शेयर कर सकते हैं, जिसको खुश रखने के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं।

समय बीत जाता है और वो पल एक खुशनुमा याद बनकर रह जाते हैं,  जिंदगी की भागदौड़ के साथ वे पल कहीं पीछे छूट जाते हैं। बच्चे, मित्र, व्यवसाय/नौकरी आदि अनेक चीजें होती हैं जिन्हें हमारा वक्त चाहिए होता है; और कभी कोई वक्त मिल भी जाये तो उनका मूड नहीं बन पाता….. जिनके साथ वो पल बिताने का मन होता है।

ऐसे समय में क्यों न खुद को समय दिया जाय?????

क्यों न कुछ ऐसा किया जाय कि वो पल जिंदगी के बेहतरीन पल बन जाएँ?

तो पेश हैं कुछ Simple-Ideas जो follow कर के खुद के साथ कुछ हसीं पल बिता सकते हैं

किसी खाली दिन में अकेले ही किसी अनजान रास्ते पर अकेले ही निकल पड़ें। ऐसे रास्ते का चुनाव करें जिसमें कोई परिचित व्यक्ति के मिलने की संभावना न हो। अच्छा हो कि शहर से दूर कोई प्राकृतिक स्थल हो या कोई छोटा सा गाँव। शांत भाव से चलते रहें, बिना किसी हड़बड़ी के, आसपास के दृश्यों का मजा लेते हुए। कहीं पहुंचना नहीं है बस खुद तक ही जाना है। अगर अकेलापन महसूस हो तो किसी पेड़ के पास जाकर बैठ जाएँ और उसके साथ अपनी जिंदगी शेयर करें, उसके पत्तों की चरमराहट सुनें और उसमें अपने उत्तर खोजें। या फिर मौन-भाव से उसे निहारते रहें, जैसे अपने प्रेमी की आँखों में झांक रहे हों।

या फिर धरती-मां की प्यारी गोदी में लेट जाएँ और उसकी प्यार भरी ऊर्जा को अपनी देह में प्रवाहित होते हुए महसूस करें। अपने सारे दर्द और तकलीफों को उसी तरह धरती को सुना दें जैसे कभी अपनी जन्मदात्री मां को सुनाया करते थे। उसकी धडकनों को महसूस करें और पूरी तरह खुद को समर्पित कर दें।

कभी लेटे-लेटे ही ऊपर फैले आकाश को निहारें और बादलों के बनते बदलते आकारों को निहारते रहें, प्रकृति की वे अनुपम कलाएं जो किसी फ़िल्मी दृश्य से कम नहीं है।

थोड़ा समय इस ट्रिप में सेवा को भी दें। रास्ते के कुछ कांटे बुहार दें, किसी पेड़ को पानी पिला दें, अगर संभव हो तो कोई नया पौधा लगा दें। बाकी जब आप उस जगह होंगें तो ideas आपको खुद-ब-खुद मिल जायेंगे।

बस एक बात का ध्यान रखें, अपने स्मार्ट-फ़ोन को यथासंभव कम से कम यूज़ करें, अगर हो सके तो उसे घर पर ही छोड़ आयें, या फिर नेट ऑफ करके कॉल्स को साइलेंट मोड पर कर दें। जैसे आपका प्यार dating के दौरान डिस्टर्बेंस पसंद नहीं करेगा, वैसे ही प्रकृति भी उसे नापसंद करेगी।

Have a good day.

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मैं PERFECT नहीं हूँ : पीयूष नाहटा

अभी हाल ही में मेरे कार्य, जॉब और अतीत में संघ त्याग के निर्णय को लेकर प्रश्न खड़े किये गए। लोग यह जानना चाहते हैं कि जब मैंने तेरापंथ धर्मसंघ से एक साधु के रूप में सम्बन्ध विच्छेद कर दिया तो उसी संघ में मैं जॉब क्यों कर रहा हूँ।

सबसे पहले तो मैं इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैं संघ से अलग हुआ इसका यह मतलब नहीं है कि मेरी संघ से कोई दुश्मनी थी। अनेक ऐसे लोग हैं जिनकी समझ अधूरी है वे सोचते हैं कि जो अलग हो गया वह दुश्मन है, परन्तु अनेक ऐसे समझदार व्यक्ति भी हैं जो ऐसा नहीं मानते।

संघ साधना की एक आधारभूमि है, मैंने वहां अपने जीवन के लगभग 20 वर्ष व्यतीत किये। जब मैं संघ से अलग हुआ तब भी संघ के सदस्यों के साथ मेरे मित्रतापूर्ण सम्बन्ध थे और आज भी हैं। मैंने आचार्यप्रवर को अपने सैद्धांतिक मतभेदों के बारे में बताया और अपनी आस्था के आधार पर जीवन यापन करने की छूट चाही जो कि मेरी नजर में संघ में एक साधु के रूप में रहते हुए संभव नहीं थी। परन्तु मेरे जो भी मतभेद थे वे सैद्धांतिक थे।

मैं आज भी किसी प्रकार की संघ विरोधी प्रवृत्ति में लिप्त नहीं हूँ, न पहले था।

आगम ग्रंथों को मैं आध्यात्म के महान ग्रन्थों के रूप में देखता हूँ, सिर्फ मतभेद इतना ही है कि मैं उन्हें उस तरह प्रमाण नहीं मानता जिस तरह एक संघीय साधु के लिए मानना आवश्यक है। मगर मैं आज भी उनका स्वाध्याय करता हूँ और लगातार उनमें छिपी अनुभूतिपरक साधना-पद्धतियों पर शोध करता रहता हूँ। मैंने कभी आगम ग्रंथों के बारे में नकारात्मक टिप्पणी नहीं की। ऐसा करने के बारे में मैं सोच भी नहीं सकता। उन्हें लिखने वाले महान विद्वान् थे।

उस समय के संसाधनों के आधार पर उन्होंने इस प्रकार की शोध की जो कि अपने आप में महत्वपूर्ण है। परन्तु समय बदला है, अनेक वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि अंतरिक्ष-विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषय पर जैन आगमों में विद्यमान मंतव्यों पर पुनर्चिन्तन की अपेक्षा है और भी अनेक ऐसे स्थल हैं जिनकी समीक्षा की जानी चाहिए। क्या प्राचीन आचार्यों ने लिख दिया इसलिए यह उचित है कि हम बिना किसी सोच-विचार के उसे स्वीकार कर लें? और यदि सोच-विचार शुरू कर दिया तो क्या यह आगम-विरोध है?

आगम के संदर्भ में गहन अध्ययन करने वाले विद्वानों ने मुझ पर कभी इस प्रकार का आक्षेप नहीं लगाया कि मेरी सोच आगम-विरोधी है। जो व्यक्ति मेरी सोच को आगम विरोधी कह रहें हैं शायद उन्होंने जैन दर्शन अथवा आगम का सामान्य अध्ययन भी नहीं किया होगा।

मैं सत्य की शोध कर रहा हूँ, इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी सामान्य बुद्धि का प्रयोग कर रहा हूँ। मैं गलत भी हो सकता हूँ, परन्तु मुझे गलतियाँ करने से डर नहीं लगता। डर लगता कुछ नहीं करने से। मैं PERFECT भी नहीं हूँ कि मेरी हर बात को माना जाय।

बस इतना ही कहना है कि मैं संघ विरोधी नहीं हूँ, न ही आगम विरोधी हूँ। बस अंध-भक्त मैं किसी का नहीं हूँ, अपना खुद का भी नहीं। यदि मुझे लगता है कि मैं किसी प्रकार के गलत सिद्धांत को पकडे हुए हूँ, तो उसे छोड़ने में हिचकिचाऊँगा नहीं। क्योंकि मैंनें अभी सत्य पाया नहीं है…..

 

जैन धर्म में सरस्वती उपासना

भारत में देवी उपासना का क्रम अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। देवी को शक्ति स्वरुप माना गया और शक्ति के अनेक रूपों में एक रूप विद्या का भी है। इसे ही सरस्वती का नाम दे दिया गया। देवी स्तोत्र में एक स्थान पर लिखा गया है-

या देवी सर्वभूतेषु, विद्यारूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।

जैन धर्म में यूं तो वीतराग एवं पञ्च परमेष्ठि को ही वंदनीय माना गया, परन्तु फिर भी देव गति के अस्तित्व को माना गया, वहीं उत्तरकालीन तंत्र ग्रंथों में सोलह प्रकार की विद्या देवियों के अस्तित्व पर भी चर्चा की गई है।

सरस्वती साधना को ज्ञान के विकास हेतु काफी महत्व दिया जाता रहा है और इसके असर से जैन परम्परा भी अछूती नहीं रही। कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र ने भी अपनी मुनि अवस्था में सरस्वती उपासना की ऐसा उल्लेख मिलता है। वहीं आचार्य वृद्धवादी, जिन्होंने ढलती वय में दीक्षा ली, ने भी ज्ञान के प्रति अपनी प्रबल प्यास को शांत करने हेतु 21 दिन के उपवास के साथ सरस्वती साधना की।

जैन परम्परा में सरस्वती की साधना से संबंधित अनेक मंत्र उपलब्ध हैं, जिनमें से दो मंत्र मुझे अत्यन्त प्रिय हैं:-

1. ओम् ऐम् नमः

2. ओम् णमो अणाइनिहणे तित्थयर पगासिए गणहरेहिं अणुमन्निए द्वादशांग-चतुर्दशपूर्वधारिणी श्रुतिदेवते सरस्वती अवतर अवतर सत्यवादिनी हुं फट् स्वाहा।

इनमें जो प्रथम मंत्र है, वह एक प्रकार का बीज मंत्र है। मैंने ऐसा महसूस किया है कि इस मन्त्र के उच्चारण के दौरान मस्तिष्क के फ्रंटल लोब और हाइपोथेलेमस एरिया में कम्पन बढ़ जाता है। एकाग्रता की कमी का एक कारण है फ्रंटल लोब की अल्प-सक्रियता। वहीँ हाइपोथेलेमस एरिया हमारे अनुभूतिपरक ज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऐसा संभव है कि इस मन्त्र का निर्माण करने वाले आचार्यों/मंत्रविदों ने इस प्रक्रिया पर ध्यान दिया हो! वैसे इस विषय पर शोध की गुंजाइस है।
दूसरा मन्त्र सरस्वती को एक देवी के रूप में न देखकर श्रुतज्ञान के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित करता है। कितना सुन्दर पाठ है। “अनादिनिधन, तीर्थंकरों द्वारा प्रकाशित, गणधरों द्वारा मान्य, द्वादशांग-चतुर्दश पूर्व को धारण करने वाली सरस्वती जो कि सत्यवादिनी है वह मुझमें उतरे” इस भाव के साथ इस मन्त्र का जप किया जाये तो सहज ही एक सुखद अहसास होता है।

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वैसे मैं मन्त्र से सम्बंधित देवी-देवताओं को एक भाव-ऊर्जा के रूप में देखता हूँ। मुझे लगता है कि देव-गति के देवता और मन्त्र-देवता भिन्न-भिन्न हैं। इस सन्दर्भ में यदि आपके अपने कोई विचार हों तो कृपया मुझे अवगत करवाएं। आपके comments का मुझे इंतजार रहेगा…

आधुनिक युग का पूणिया श्रावक : रामसेवक पाल

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रामसेवक पाल

जन्म से जैन कहलाने वाले अनेक लोग हैं, मगर समझ-बूझ कर जैन बनने वाले और जैन सिद्धांतों का ह्रदय से पालन करने वाले विरले ही मिलते हैं। आज हम चर्चा करने जा रहें हैं एक ऐसे शख्स की जो दिखने में अत्यंत साधारण नजर आते हैं, मगर उनकी साधना अचंभित करती है और आगम युग के पूणिया श्रावक की याद दिलाती है।

जन्म से उत्तरप्रदेश के निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के रामसेवक पाल वर्त्तमान में मुंबई रहते हैं। इन्होनें लगभग पंद्रह वर्ष पहले जैन तेरापंथ संघ के आचार्य श्री तुलसी के शिष्य मुनि श्री रविन्द्र कुमार जी के पास जैन धर्म स्वीकार किया था।

व्यावसायिक दृष्टि से घर घर घूमकर गुलाब-जामुन बेचने वाले रामसेवक बिना सामायिक किये मुँह में पानी भी नहीं लेते। रात्रि-कालीन शिफ्ट में काम करने के कारण इनकी सुबह की दिनचर्या काफी late शुरू हो पाती है और अपनी अनेकानेक अपरिहार्य परिस्थितिओं के कारण इन्हें सामायिक करते करते शाम भी हो जाती है, परन्तु अपने नियम धर्म को लेकर ये काफी दृढ रहते हैं।

जैन होने के नाते अनेक श्रावक इन्हें आर्थिक सहयोग देने का प्रयास भी करते हैं , परन्तु स्वावलम्बी विचारधारा का अनुसरण करने वाले रामसेवक केवल खुद की मेहनत पर ही भरोसा रखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये प्रतिमाह दो उपवास भी करते हैं, साथ ही साथ इनकी स्वाध्याय में अच्छी रूचि है। अपने व्यावसायिक कार्य से समय निकाल कर अब तक अनेक पुस्तकें पढ़ चुके हैं।

हाल ही में ठाणे तेरापंथ भवन में आचार्य श्री महाश्रमण जी के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री महेंद्र कुमार जी के दर्शनार्थ आये तब आपसे मुलाकात हुई। आपकी कथा ने मुझे काफी प्रभावित किया, तब मैंने आपसे यह जानकारी शेयर करने की अनुज्ञा ली। स्वभाव से अत्यंत संकोची रामसेवक बड़ी मुश्किल से अपनी फोटो खिंचवाने हेतु तैयार हुए।

और हाँ, आपसे चर्चा के बाद मैंने गुलाब-जामुन का भी रसास्वादन किया, जो कि विशेष रूप से रोज-फ्लेवर वाले थे।