स्नान के लिए करें आगम सूत्रों का प्रयोग…

भारतीय संस्कृति में साधना और शुद्धि के बीच एक गहरा सम्बन्ध निरुपित किया गया है। प्रातःकालीन पूजा मन्त्र-जप आदि अनुष्ठानों से पूर्व स्नान को प्रायः अनिवार्य अंग की तरह व्याख्यायित किया गया है। जल में जीवन की घोषणा करने वाली जैन परंपरा में भी मंदिरों में पूजा-विधि के साथ स्नान-शुद्धि को अनिवार्य माना गया। शरीरिक-शुद्धि के लिहाज से उसकी उपयोगिता निर्विवाद है, पर क्या आत्म-शुद्धि के लिए भी यह (स्नान-शुद्धि) उतनी ही उपयोगी है?

यह सही है कि स्नान करने के पश्चात हम शारीरिक रूप से खुद को तरोताजा महसूस करते हैं। आलस्य का प्रभाव भी कुछ हद तक कम हो जाता है। वहीँ जैन परंपरा में ज्ञान के अतिचारों में वर्णित अस्वाध्याय के कारणों— यथा मल-मूत्र, वीर्य रक्त आदि अशुभ तत्वों की विशुद्धि भी हो जाती है, जिनके रहने पर स्वाध्याय नहीं किया जा सकता।

जैन आगमों में तीर्थ-स्नान से सम्बंधित एक प्रश्न के उत्तर में भाव स्नान का बेहद खूबसूरती से वर्णन किया गया है—

धम्मे हरए बम्भे संतितित्थे, अणाविले अत्तपसन्नलेस्से।

जहिंसि ण्हासो विमलो विसुद्धो, सुसीइभूओ पजहामि दोषं।।

 

अर्थ- अकलुषित, आत्मा को प्रसन्न करने वाली शुभ लेश्या रूप धर्म, जलाशय है और ब्रह्मचर्य रूप शांति तीर्थ है। जहाँ स्नान करके मैं विमल, विशुद्ध और शीतल होकर पाप को दूर करता हूँ।

 

एयं सिणाणं कुसलेहि दिट्ठं, महासिणाणं इसिणं पसत्थं।

जहिंसि ण्हाया विमला विसुद्धा, महारिसी उत्तम ठाण पत्तए।।

 

अर्थ- तत्त्व ज्ञानियों ने यह स्नान देखा है। यही वह महास्नान है जिसकी ऋषियों ने प्रशंसा की है। जिस स्नान से महर्षि लोग विमल और विशुद्ध होकर उत्तम स्थान— मोक्ष को प्राप्त हुए हैं।

उत्तराध्ययन12/46-47

हरिकेशी मुनि द्वारा प्रतिपादित इस भाव-स्नान का प्रयोग एक स्नान-मंत्र की तरह जप-साधना अथवा अन्य साधना मन्त्रों के पूर्व किया जा सकता है। अर्थ-चिंतन के साथ इस मन्त्र का प्रयोग करें, साधना को विशेष गहराई मिलेगी। वैसे नियमित रूप से द्रव्य-स्नान (जल-स्नान) के बाद भी इस मंत्र के साथ भाव स्नान कर नकारात्मक उर्जाओं से अपने तन, मन और आत्मा की विशुद्धि की जा सकती है।

प्रयोग करें और अपने अमूल्य अनुभव सबके साथ शेयर करें………

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मैत्री पर्व ऐसे मनाएं

संवत्सरी महापर्व की पावन संध्या।

प्रेम और मैत्री भाव का उमड़ता हुआ समंदर।

खमतखामणा, मिच्छामि दुक्कड़ं की मधुर स्वर लहरियों से स्निग्ध होता हुआ मन।

मैं भी इस पर्व को मना रहा हूँ। सबसे पहले किससे खमतखामणा करूँ?

यह प्रश्न मन को आंदोलित कर रहा है।

मैं स्व को सर्वाधिक महत्व देने वाला व्यक्ति हूँ। इस अपेक्षा को सामने रखकर सर्वप्रथम स्वयं से ही क्षमा प्रार्थना की। किसी और के साथ यदि मैंने कोई दुर्व्यवहार किया है तो उसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव तो मैंने स्वयं ही भोगा है। क्या किसी और के माफ़ कर देने से मेरा बोझ हल्का हो जायेगा? जब तक कि मैं स्वयं ही खुद को माफ़ न कर सकूँ। जब भी आत्मा किसी प्रकार के पापकर्म में लिप्त होती है तो उसका बुरा प्रभाव इस आधार पर नहीं मिलता कि सामने वाले जीव ने कितना कष्ट पाया, अपितु इस आधार पर मिलता है कि पाप करने वाले के मन के परिणाम कैसे रहे। सबसे पहले मैं स्वयं के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। अपने शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार किया तो सहज ही मेरे सामायिक हो गयी। इसके पश्चात् शुद्ध स्वरूप को उपलब्ध परम पुरुषों के स्वरूप का आलंबन लिया तो चउवीसत्थव हो गया। गुरु के समक्ष निवेदन हेतु गया ताकि किसी के समक्ष अपना सब पाप निवेदन करने की क्षमता है अथवा नहीं, यह वंदना आवश्यक हो गया। फिर यात्रा की अपने अतीत की, प्रतिक्रमण में। पापकर्म एक प्रकार का तनाव उत्पन्न करता है, उस तनाव से मुक्त होने के लिए कायोत्सर्ग किया और भविष्य के लिए प्रत्याख्यान भी किया।

खुद को यदि माफ़ नहीं कर पाता तो दूसरों की माफ़ी से मुझे क्या मिलता?

तो आज के इस पावन अवसर पर खुद को माफ़ करता हूँ, मेरे दुष्कृत मिथ्या हो जाएँ (मिच्छामि दुक्कड़ं)

खुद के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। खुद पर प्रेम की बरसात करता हूँ।

I LOVE YOU, PIYUSH!

I LOVE YOU MORE THEN ANYBODY ELSE.

I LOVE YOU MORE THEN ANYONE ELSE DO.

I ACCEPT YOUR INNER BEAUTY, AND FEEL GRATITUDE FOR BEING HERE ALWAYS.

ONCE AGAIN I DECIDE TO LOVE YOU FOREVER…

HUGS AND KISSES………….

Jain old tattvik bhajan playlist

जैन दर्शन को गहराई से समझने के लिए अनेक जैन आचार्यों ने तात्विक गीतों की रचना की। इन गीतों में जीवन का सार भी छिपा है और जैन तत्त्वज्ञान भी बड़ी सरलता से समझ में आ जाता है इन गीतों के माध्यम से …
तो प्रस्तुत है ऐसे ही गीतों की एक छोटी सी ऑडियो लिस्ट..जिसे मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने स्वर दिए हैं।

45 min. Meditation Session with Piyush

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Your own Health

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Samavsaran Meditation

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Let’s do this journey with a 36 minutes meditation
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Mahavideh kshetra is known as an mythological concept well-known to Jain cosmology. It’s believed here that after the starting of fifth ara of avasarpini kaal (a part of infinite time) Tirthankar and Keval Gyan (infinite knowledge) has been stopped to exist. Only the Mahavideh kshetra is the area where one can attain keval gyan or become a tirthankar. It is believed that including Simandhar svami there are 20 Tirthankaras existing at Mahavideh Kshetra.

Samavasaran
AN BEAUTIFUL ART OF SAMAVSARAN KSHETRA

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evo4soul Defined

cropped-evo4soul01.png‘evo4soul’ is a brainchild of Piyush Kumar Nahata. He has been working for more than two decades to understand the process of evolution theory in the context of ancient Indian wisdom provided by Rishis, Tirthankaras and Buddhas. After a deep analysis of both systems he designed a genius system to evolve the soul. It’s a complete guide to align the body, mind and soul. It would be interesting to know more about the methods, programs and practices of evo4soul.

In short evo4soul is a science to utilize your own potential to create a better personality and to get access of your hidden inner core.

 

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Once per day “Compliment another guy”.
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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग 5)

गुणस्थानों की हेयोपादेयता

गुणस्थानों की हेयता तथा उपादेयता के विषय में जिज्ञासा हो सकती है अतः उस पर भी चिन्तन कर लेना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। अपेक्षा दृष्टि से इस प्रश्न के तीन उत्तर हो सकते है-

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  1. गुणस्थान सभी उपादेय हैं क्योंकि आत्मा के पवित्र गुणों के स्थान को गुणस्थान कहा जाता है। चौदह गुणस्थानों में प्रथम गुणस्थान सबसे अल्प गुण वाला है फिर भी आत्मा के न्यूनतम गुण की ही वह स्थिति है। गुण कभी हेय नहीं होता। राख कितनी ही क्यों न हो पर चिनगारी की अवज्ञा नहीं की जा सकती। अगले गुणस्थान में आत्मा की उज्जवलतर स्थितियाँ होती है, इसलिए आत्मोज्ज्वल्य की न्यूनतम से लेकर उच्चतम स्थिति तक भी सभी भूमिकाएँ उपादेय ही ठहरती है।
  2. सभी गुणस्थान हेय हैं यह भी एक अपेक्षा से ठीक है। क्योंकि आत्मा की पूर्ण पवित्रता किसी भी गुणस्थान में नहीं होती।चौदहवें गुणस्थान में भी आत्मा के चार कर्म लगे रहते हैं। जिसमें आयुष्य के सिवा बाकी तीन कर्मअशुभ भी हो सकते है। मुक्ति महल की वह चाहे अन्तिम पेड़ी ही हो पर है तो सोपान ही, महल नहीं है। उसको पार करने से ही पूर्ण आत्मानन्द पाया जा सकता है, पहले नहीं। आत्मानन्द की पूर्णता के लिए सोपान को लांघना ही श्रेयस्कर है पर वहाँ टिके रहना नहीं।
  3. पूर्व-पूर्व गुणस्थान हेय एवं उत्तर-उत्तर गुणस्थान उपादेय है। जैसे पाँचवे गुणस्थान वाले के लिए छठा उपादेय है और सातवें वाले के लिए हेय है। क्योंकि उत्तर गुणस्थानों में आत्मविशुद्धि बढती जाती है, एवं पूर्व गुणस्थानों में उत्तर की अपेक्षा से आत्म विशुद्धि की कमी होती हैं। अतः श्रावक को साधु बनना चाहिए, पर साधु को श्रावक नहीं क्योंकि पहले में आत्म गुणों की वृद्धि होती है एवं दूसरे में हानि। यह हेयोपादेय सम्बन्धी प्रश्न का अपेक्षा भेद से उत्तर है। वास्तव में तो जैसा कि ऊपर बताया गया है सभी गुणस्थान उपादेय हैं।

गुणस्थानों की अमरता

चौदह गुणस्थानों में तीन गुणस्थान अमर हैं। अर्थात् तीसरे, बारहवें तथा तेरहवें में कोई भी जीव आयुष्य पूरा नहीं करता। जयाचार्य ने कहा है-

तीन गुण ठाणा अमर कह्या छे, तेरम बारम तीजो रे।

झीणी चर्चा

गुणस्थानों में कर्मबन्ध

चौदह गुणस्थान में नवमें तक सात कर्मों का (आयुष्य छोड़ कर) निरन्तर बन्धन होता है। दसवें में (आयुष्य, मोह बिना) छह कर्मों का निरन्तर बन्धन होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें में एक सात वेदनीय कर्म का बन्धन होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर सातवें तक आयुष्य का बन्धन होता है। आयुष्य का बन्धन एक भव में एक बार ही होता है। छठे में यदि आयुष्य कर्म का बन्धन प्रारम्भ किया हो तो सातवें में पूर्ण कर सकता है पर सातवें में आयुः बन्ध प्रारम्भ नहीं करता। जयाचार्य कहते है-

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आयु अबंध सातमां आगे बलि तीजो गिण लीज्यो रे।

झीणी चर्चा

गुणस्थान में कर्मोदय

दसवें गुणस्थान तक आठों ही कर्मों का उदय रहता है। ग्यारहवें तथा बारहवें मे सात कर्मों का एवं तेरहवें चौदहवें में चार कर्मों का। ग्यारहवें तक मोह कर्म की सत्ता रहती है। बारहवें तक ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय एवं अंतराय की सत्ता रहती है तथा बाकी चार कर्मों – आयुष्य, नाम, गौत्र एवं अंतराय की सत्ता चौदहवें गुणस्थान तक रहती है।

गुणस्थान और भाव

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि कर्म दूर होने से होने वाली आत्मा की क्रमिक विशुद्धि का नाम गुणस्थान है। इनमें से प्रथम दस गुणस्थान क्षयोपशम भाव से प्राप्त होते हैं, ग्यारहवाँ उपशम भाव से, बारहवाँ, तेरहवाँ क्षायक भाव से एवं चौदहवाँ पारिणामिक भाव से। उतः प्रथम दस गुणस्थान क्षयोपशम भाव, ग्यारहवाँ उपशम भाव, बारहवाँ एवं तेरहवाँ क्षायिक भाव और चौदहवाँ पारिणामिक भाव कहलाता है। सम्यक्त्व की अपेक्षा से चतुर्थ गुणस्थान को उपशम एवं क्षायिक भाव भी कहा जा सकता है।

गुणस्थानवर्ती जीव और भाव

भेद विज्ञान से:- औदयिक भाव के 33, औपशमिक भाव के 8, क्षायिक भाव के 13, क्षायोपशमिक भाव के 32 भेद किए जाते है। वे यथाक्रम यों हैं:-

औदयिक भाव के 33 भेद

चार गति, छः काय, छः लेश्या, चार कषाय, तीन वेद, मिथ्यात्व, अव्रत, अमनस्कता, अज्ञानता, आहारता, संसारता, असिद्धता, अकेवलित्व, छद्मस्थता, सयोगिता।

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औपशमिक भाव के 8 भेद – 1. उपशम क्रोध 2. उपशम मान, 3. उपशम माया, 4. उपशम लोभ, 5. उपशम राग, 6. उपशम द्वेष, 7. उपशम सम्यक्त्व, 8. उपशम चारित्र।

क्षायिक भाव के 13 भेद – 1. केवल ज्ञान, 2. केवल दर्शन, 3. आत्मिक सुख, 4. क्षायिक सम्यक्त्व, 5. क्षायिक चारित्र, 6. अटल अवगाहन, 7. अमूर्तिपन, 8. अगुरूलघुपन, 9. दान लब्धि 10. लाभ लब्धि, 11. भोग लब्धि, 12. उपभोग लब्धि, 13. वीर्य लब्धि।

क्षायोपशमिक भाव के 32 भेद –

ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. मति ज्ञान, 2. श्रुतज्ञान, 3. अवधि ज्ञान, 4. मनःपर्यव ज्ञान, 5. मति अज्ञान, 6. श्रुत अज्ञान, 7. विभंग अज्ञान, 8. भणन गुणन।

दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. श्रोत्रेन्द्रिय, 2. चक्षुरिन्द्रिय, 3. घ्राणेन्द्रिय, 4. रसनेन्द्रिय, 5. स्पर्शनेन्द्रिय, 6. चक्षु दर्शन, 7. अचक्षु दर्शन, 8. अवधि दर्शन।

मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. सामायिक चारित्र, 2. छेदोपस्थापनीय चारित्र, 3. परिहार विशुद्धि चारित्र, 4. सूक्ष्म संपराय चारित्र 5. देशविरति 6. सम्यक् दृष्टि 7. मिथ्या दृष्टि, 8. सम्यक् मिथ्या दृष्टि।

अन्तराय कर्म के क्षयोपशम से – 1. दान लब्धि, 2. लाभ लब्धि, 3. भोग लब्धि, 4. उपभोग लब्धि, 5. वीर्य लब्धि, 6. बाल वीर्य, 7. पण्डित वीर्य, 8. बाल पण्डित वीर्य।

उदय एवं क्षय आठों कर्मों का होता है। उपशम केवल मोहकर्म का होता है। क्षयोपशम उपर्युक्त चार कर्मों का होता है।

विभिन्न गुणस्थानवर्ती जीवों में उपर्युक्त चारों- (उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम) भावों के कितने भेद पाए जाते हैं, तथा जीव भेद आदि बोल किस गुणस्थान में कितने पाते हैं इनको निम्नोक्त यन्त्र के द्वारा स्पष्टता से समझा जा सकता है। वह यन्त्र यों है:-

क्र.औद
यिक
औप
शमिक
क्षा
यिक
क्षायो
पशमिक
जीव भेदयोगउप योगलेश्या
त्मा
दृष्टिदंड कपक्ष
13300191413666मिथ्या242
2270019613667सम्यक्19शुक्ल
3270019110666मिश्र16शुक्ल
4261119213667सम्यक्16शुक्ल
5241120112667सम्यक्2शुक्ल
6221123114768सम्यक्1शुक्ल
719112315738सम्यक्1शुक्ल
817112115718सम्यक्1शुक्ल
917112115718सम्यक्1शुक्ल
1011111715718सम्यक्1शुक्ल
1110211915717सम्यक्1शुक्ल
1210021915717सम्यक्1शुक्ल
13709012217सम्यक्1शुक्ल
14409012206सम्यक्1शुक्ल

(यन्त्र नं. 1)

मुक्ति

चौदहवाँ गुणस्थान छूटते ही आत्मा बिल्कुल कर्म रहित हो जाती है। कर्म रहित आत्मा ऋजु गति करती है वक्र गति नहीं। जहाँ मुक्ति हुई कि बस उसी सीध में लोक के मस्तक पर जा ठहरती है। सिद्धावस्था से पूर्व शरीर जितना आकाश घेरे रहता है, मुक्तावस्था में वह जीव उसके दो तिहाई आकाश को घेर कर रहता है।

कर्ममुक्ति होने से भी पूर्व शरीर की अपेक्षा से सिद्धों के आत्म प्रदेशों की अवगाहना में बहुत बड़ा अन्तर होता है। सिद्धों की जघन्य अवगाहना एक हाथ आठ आंगुल होता है। इसका कारण यह है कि सात हाथ से कम शरीर वाला सिद्ध नहीं होता। सात हाथ की अवगाहना वाला व्यक्ति जब उर्ध्व जानुओं में सिर झुकाकर ध्यान मुद्रा में बैठता है तब वह दो हाथ की अवगाहना वाला होता है वही आत्मा सिद्धावस्था मे दो तिहाई अवगाहना का रहता है, तब जघन्य अवगाहना वाला होता है। उत्कृष्ट 500 धनुष्य की अवगाहना वाला सिद्ध होता है और वह खड़ा-खड़ा सिद्ध होता है तब उत्कृष्ट अवगाहना वाला सिद्ध होता है। इसी प्रकार मध्य की समस्त अवगाहनाएं समझ लेनी चाहिए।

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सिद्धों के रहने का स्थान पैंतालीस लक्ष योजन लम्बा-चैड़ा है। इसका कारण यह है कि मुक्त होने वाले जीव अढाई द्वीप में ही होते है, उनमें लाख योजन का जम्बूद्वीप है, उसके चारों तरफ द्विगुणित लवण समुद्र है, चारों ओर से दुगुना होने के कारण इनका सम्मिलित माप पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण तक पाँच लाख योजन हो जाता है। उसके चारों ओर चार लक्ष योजन का धातकी खण्ड है इसे सम्मिलित करने पर तेरह लाख योजन क्षेत्र हो जाता है। उसके बाद आठ लाख योजन का कालोदधि है इसे मिलाने पर 25 लाख हो जाता है। उसके बाद पुष्कर द्वीप है जो सोलह लक्ष योजन का है। जिसके मध्योमध्य चारों और मनुषोत्तर पर्वत है, इस पर्वत के अन्दर मनुष्य रहते है, बाहर केवल तिर्यंच ही हैं।

अतः इसका आधा क्षेत्र सम्मिलित करने पर पैंतालिस लक्ष योजन क्षेत्र हो जाता है। इसे मनुष्य क्षेत्र कहते हैं। इसके बाहर मनुष्य नहीं है। अतः वहाँ से सिद्ध भी नहीं होते। जो अनन्त सिद्ध हैं या अनन्त और भी होंगे वे सारे यहीं समा जाऐंगे। जैसे- एक दीपक के प्रकाश में सैकड़ों दीपकों का प्रकाश समा जाता है, वैसे ही ज्योतिर्मय सिद्ध समाविष्ट हो जाते हैं। सिद्ध स्थान से आगे अलोक है। धर्मास्तिकाय के अभाव के कारण वहां कोई नहीं जा सकता, क्योंकि धर्मास्तिकाय ही गति सहायक द्रव्य है, उसके अभाव में किसी भी जीव की गति नहीं हो सकती। अवगाहना की तरह पूर्वभव की अपेक्षा से सिद्धों के 15 भेद किए जाते हैं। वे इस प्रकार हैं:-

  1. तीर्थ सिद्ध, 2. अतीर्थ सिद्ध, 3. तीर्थंकर सिद्ध, 4. अतीर्थंकर सिद्ध, 5. स्वलिंग सद्धि 6. अन्यलिंग सिद्ध 7. गृहलिंग सिद्ध, 8. स्त्रीलिंग सिद्ध, 9. पुरूषलिंग सिद्ध, 10. नपुंसकलिंग सिद्ध 11. प्रत्येक बुद्ध सिद्ध, 12. स्वयं बुद्ध सिद्ध, 13. बुद्ध बोधित सिद्ध, 14. एक सिद्ध, 15. अनेक सिद्ध।
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इन 15 भेदों में से प्रत्येक सिद्ध में छह ही भेद पाते है इससे कम या अधिक नहीं पाते। भेदों में परस्पर अन्तर जरूर रहता है।

समय की अपेक्षा से सिद्धों के दो भेद किये जाते हैं- अनादि अनन्त तथा सादि अनन्त।

सिद्धावस्था प्राप्त होने पर आत्मा जन्म, मृत्यु, रोग, शोक, दुःख भय, जरा आदि से रहित हो जाती है उसके सुखों का न कभी क्षय होता है न कभी अन्त।

आचार्य श्री तुलसी ने सिद्ध स्तवन में कहा है कि

अक्षय अरुज अनन्त अचल अज अव्याबाध कहाए।
अजरामर पद अनुपम सम्पद तास अधीश सुहावे।

सिद्ध स्तवन

यह सिद्धावस्था ही सबके लिए काम्य है। गुणस्थानों का क्रमारोहण भी इसीलिए है। सिद्धि साध्य है

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और गुणस्थानों का क्रमिक आरोहरण उसका साधन। साध्य की सिद्धि के लिए साधन का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है इसीलिए इस विषय पर यहाँ कुछ प्रकाश डाला गया है।

गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-4)

ग्यारहवां गुणस्थान

ग्यारहवां उपशान्त मोह गुणस्थान है, यहाँ मोह कर्म का सर्वथा उपशम हो जाता है। अत्र-स्थित-आत्मा वीतराग बन जाता हैं “अकषायो वीतरागः” कषाय का सर्वथा अभाव वीतरागता है। क्षपक श्रेण्यारूढ व्यक्ति इस गुणस्थान में नहीं आता। उपशम श्रेणी वाला जीव क्रमशः मोह को दबाता हुआ यहाँ पर पहुँचता है एवं यथाख्यात (यथा आख्याति तथा पालयति) चारित्र पालता है, तथा पापकर्म का बन्ध सर्वथा रोक देता है। यहाँ सिर्फ सात-वेदनीय का बन्ध होता है। जो कि पुण्य कर्म है। इस बन्ध को ईर्यापथिक कहते हैं। वीतराग के सिवाय अन्य जीवों का बन्ध साम्परायिक होता है “साम्परायिकः शेषस्य” सरागी के जो शुभाशुभ कर्मों का बन्ध होता है उसे साम्परायिक कहते हैं।

इस गुणस्थाननवर्ती आत्मा की वीतरागता अन्तर्मुहुर्त से अधिक ठहर नहीं सकती। क्योंकि ऊपर का मार्ग बन्द है। यदि यहाँ आयु पूर्ण करे तो वह अनुत्तर विमान में चतुर्थ गुणस्थान में जाता है अन्यथा क्रमशः नीचे गिरता है।

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आश्चर्य तो यह है कि इतनी उन्नत आत्मा को भी दबा हुआ मोह उदय में आकर नीचे तक भी ला गिराता है एवं अनन्त काल (देशोन अर्धपुद्गल परावर्तन) तक यहाँ से उठने नहीं देता। वीतराग से च्युत होकर संसार परिभ्रमण करने वाले प्राणी संसार में हर समय मिलते हैं और वे संख्या में अनन्त होते हैं। आश्चर्य नहीं हम भी वहाँ तक पहुँचकर उस वीतरागता का अनुभव करके आए हुए हों।

अस्तु भविष्य में चाहे जो कुछ हो पर वर्तमान में इस गुणस्थानवर्ती जीव के पूर्ण वीतरागता होती है वह औपशमिक वीतरागता होती है अतः उस गुणस्थान का नाम है उपशान्त मोह गुणस्थान। वह उपादेय है वहाँ से वापिस गिरना गुणस्थान नहीं है।

यह गुणस्थान वर्तमान में तो बारहवें के सदृश ही है, पर यहाँ बहुत बड़ा भेद भी है कि इस गुणस्थान वाला भविष्य में अवश्य गिरता है जबकि बारहवें गुणस्थान वाला आगे बढ़कर केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है।

उदाहरण से इसे यों समझा जा सकता है कि जिस प्रकार वर्तमान के दो कोट्याधीशों में एक भविष्य के लिए निर्धन होने वाला है एवं दूसरे की सम्पत्ति स्थायी एवं बढ़ने वाली है। वहाँ उन दोनो की वर्तमान कोट्याधीशता में कोई अन्तर नहीं होता।

यह गुणस्थान भी अशाश्वत है, ग्रहण करने वाले यदि मिलें तो एक साथ 54 मिल सकते है। इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त है।

बारहवाँ गुणस्थान

बारहवाँ गुणस्थान क्षीण मोह गुणस्थान है। क्षपक श्रेणी में आरूढ़ प्राणी क्रमशः मोह कर्म को नष्ट करता हुआ दशम गुणस्थान से सीधा यहाँ पहुँचता है, यहाँ वह मोह कर्म को आत्मा से सर्वथा दूर फैंक देता है। वीतरागी के साथ साथ वह क्षायिक चारित्री भी बन जाता है। ग्यारहवें गुणस्थान की तरह यहाँ गिरने का भय नहीं रहता। यह अप्रतिपाती गुणस्थान है अतः आत्मा गुणों की ओर आगे ही बढ़ती है।

इसकी एवं ग्यारहवें गुणस्थान की वर्तमान अवस्था समान होती है। संयम स्थान भी एक ही होता है। परिणामों की भी सदृशता होती है। पिछले गुणस्थानों में एक ही चारित्र के संयम पर्यायों में जो अनंत गुणा अन्तर रहता है वह ग्यारहवें, बारहवें गुणस्थानवर्ती यथाख्यात चारित्री में कतई नहीं रहता।

यद्यपि इस गुणस्थानवर्ती आत्मा की भूमिका अत्यन्त उन्नत तथा अप्रतिपाती होती है फिर भी उसमें छद्मस्थता अवशिष्ट रहती है। घाती कर्मों की औदयिक अवस्था का नाम “छद्म” है उस अवस्था में रहने वाला ’छद्मस्थ’ कहलाता है। इस गुणस्थान मे घाती कर्मों-ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय इन तीनों का उदय रहता है। यहाँ जितने अंशों में आत्मगुण उपलब्ध होते हैं, परन्तु उन गुणों की पूर्णता क्षायिक भाव की अपेक्षा रखती है। वह यहाँ नहीं है।

उपर्युक्त तीनों कर्मों का उदय होते हुए भी यहाँ चारित्र पूर्ण है और वही गुणस्थान है तथा उपादेय है। इन तीनों का उदय गुणस्थान नहीं है वह तो हेय है। यद्यपि इन तीनों का उदय आत्मा को कोई अनिष्ट कर्म की और प्रवृत नहीं कर सकता और न आत्मा को पाप से भारी बना सकता है। परन्तु फिर भी वे स्वयं तो पाप ही होते हैं। चार घाती कर्मों में  पाप बन्ध का कारण तो सिर्फ मोह कर्म ही होता है शेष तीन स्वयं पाप होते हुए भी पाप बन्ध के कारण नहीं बनते।

यह गुणस्थान अशाश्वत है। यदि मिले तो एक साथ इसे ग्रहण करने वाले उत्कृष्ट 108 मिल सकते हैं। इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त है।

तेरहवां गुणस्थान

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तेरहवां सयोगी केवली गुणस्थान है। मोह कर्म का नाश तो बारहवें गुणस्थान में ही हो जाता है। यहाँ अवशिष्ट तीन कर्मों को तोड़कर केवल ज्ञान (सर्वज्ञता) केवल दर्शन (सर्वदर्शिता) और क्षायिक लब्धि (सर्वशक्तिमत्ता) प्राप्त कर ली जाती है। इस गुणस्थान में प्रविष्ट होते ही एक अभूतपूर्व शक्ति प्राप्त होती है। इससे आत्मा समस्त भूत भावी तथा वर्तमान के द्रव्य गुण पर्यायों को करामलकवत जान एवं देख लेती है।

ज्ञानावरणीय कर्म के उदय एवं क्षयोपशम से ज्ञान में तरतमता पैदा होती है और उसके कारण ज्ञान के अनेक भेद हो जाते हैं। मति, श्रुत, अवधि तथा मनः पर्यव ये इसके मुख्य भेद होते हैं तथा अवग्रह, ईहा आदि मति के, अंग प्रविष्ट, अंग बाह्य आदि श्रुत के, हीयमान वर्द्धमान आदि अवधि के, ऋजुमति, विपुलमति आदि मनः पर्यव के अवान्तर भेद प्रभेदों की संख्या काफी बड़ी हो जाती है। उन सब की यहाँ पर कोई अपेक्षा नहीं रह जाती है। यहाँ ज्ञान संबंधी समस्त आवरण दूर हो जाने से तरतमता विहीन एक ही परिपूर्ण केवल ज्ञान हो जाता है, अर्थात् पिछले सभी ज्ञान इसमें समा जाते हैं। वस्तुतः ज्ञान एक ही है। भिन्नता तो क्षयोपशम की विविध भूमिकाओं के कारण बनती है। जैसे-कोई रजत (चांदी) की शिला जमीन में गड़ी हुई हो और चारों ओर से परिपूर्ण आच्छादित हो कालान्तर में कुछ कारण उपस्थित होने पर जब वह एक तरफ से थोड़ी सी खुलती है तब लगता है कि यह कोई चांदी का टुकड़ा है, जब दूसरी ओर से थोड़ी सी खुलती है तब वह दूसरा चांदी का टुकड़ा सा लगता है। इसी तरह तीन, चार आदि टुकड़े मालूम होने लगते हैं । परन्तु जब मिट्टी पूर्णतः अलग हो जाती है तब पता चलता है कि पहले जो अलग अलग टुकड़े मालूम दे रहे थे वे सब इसी एक शिला के भाग थे। इसी प्रकार सब आवरण दूर होने से एक केवलज्ञान कहलाता है और उससे पूर्व उसकी आंशिक अवस्थाएं विभिन्नताओं से उल्लिखित की जाती है। केवल दर्शन को भी इसी तरह समझना चाहिए।

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ये सब उत्तम वस्तुएं हैं ग्रहणीय हैं इन्हे ही गुणस्थान कहा जाता है। इतना होते हुए भी यहाँ पर तीनों ही योगों मनोवाक्काय की प्रवृत्ति चालू रहती है। यह प्रवृत्ति शुभ होती है। अतः उससे केवल पुण्य का ही बंधन होता है यद्यपि उस पुण्य बंध की स्थिति केवल दो समय ही होती है। वह गाढ बन्धन नहीं कर सकता, उस स्थिति में शुभ पुद्गल आते हैं, आत्मा के साथ एकीभूत होते हैं व तत्काल बिखर जाते हैं फिर भी वह बन्धन तो है ही। उसी शुभ योग के द्वारा प्रति समय निर्जरा भी होती रहती है, अतः शुभयोग को ग्रहणीय भी माना जाता है पर शरीर नाम कर्म के उदय से शुभयोग प्रवृत्त होता है एवं पुण्य बन्ध करता है, अतः वह गुणस्थान नहीं है वह तो छोड़ने योग्य है।

इस गुणस्थान में कुछ सर्वज्ञों के ही केवल समुद्घात होता है सबके नहीं। इसका कारण यह है कि जब किसी केवली का आयुष्य कर्म कम एवं वेदनीय कर्म अधिक रह जाता है तब उनको सम करने के लिए उसके आत्म प्रदेश स्वतः ही शरीर से बाहर निकलते हैं और लोक में व्याप्त हो जाते हैं। उस स्थिति में समय के मान की अपेक्षा में अधिक रहा हुआ वेदनीय कर्म प्रदेश वेद्य होकर नष्ट हो जाता है। यह समुद्घात सिर्फ उनके होता है जिनका आयुष्य केवल ज्ञान होने के समय 6 माह से कम होता है।

इस समुद्घात का कालमान केवल आठ समय का होता है। प्रथम समय में दण्डाकार आत्मप्रेदश निकलते हैं जो ऊपर व नीचे लोकान्त तक चले जाते है। दूसरे समय में कपाटाकार अर्थात् उस दण्ड के दो पाश्र्व से निकलने वाले आत्म-प्रदेश पूर्व और पश्चिम में या उत्तर और दक्षिण में लोकान्त तक चले जाते हैं, जो कपाट के आकार से समझे जा सकते है। तीसरे समय में मन्थान के आकार में अवशिष्ट दो पाश्र्वों से निकलने वाले आत्म प्रदेश भी लोकान्त तक चले जाते हैं। चौथे समय में मन्थान के बीच का अन्तर प्रदेशों से भर जाता है। इस प्रकार उस समय लोक के प्रत्येक आकाश प्रदेश पर एक आत्म प्रदेश हो जाता है। ठीक इसके विपरीत क्रम रूप से आत्म प्रदेश अगले चार समयों में वापिस मूल शरीर में आ जाते हैं। इन आठ समयों में महा निर्जरा होती है। चैथे समय में जब सारे लोक में आत्म प्रदेश व्याप्त हुए होते हैं तब एक साथ जो कर्म दूर होते हैं और पाँचवे समय में आत्म-प्रदेशों के संकुचित हो जाने पर वे आत्म प्रदेशों से विलग हुए कर्म पुद्गल समस्त लोक में व्याप्त होने के कारण अचित्त महास्कन्ध नाम से पुकारे जाते हैं।

इस समुद्घात के पहले और आठवें समय में औदारिक काययोग, दूसरे, छट्ठे और सातवें समय में औदारिक मिश्र काय योग व तीसरे, चौथे और पाँचवें समय में कार्मण काय योग रहता है। चौथे, पाँचवें और छट्ठे समय में जीव अनाहारक रहता है। केवल समुद्घात करने वालों में सात योग बाकी केवलियों में पाँच योग होते हैं। यह गुणस्थान शाश्वत है। दो करोड़ जीव इसमें हर समय मिलते हैं। उत्कृष्ट नव करोड़ भी मिल सकते हैं। इसकी स्थिति देशोन क्रोड़ पूर्व है।

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इस गुणस्थान के अन्त में योग निरोध प्रारम्भ हो जाता है। योग निरोध का क्रम इस प्रकार है:- पहले स्थूल काय योग, फिर स्थूल वचन योग, फिर स्थूल मनोयोग, फिर सूक्ष्म मनोयोग, फिर सूक्ष्म वचन योग, फिर सूक्ष्म काय योग। सूक्ष्म काय योग तेरहवें गुणस्थान के अन्त तक रहता है। यहाँ पर सूक्ष्म क्रिया प्रतिपाति शुक्ल ध्यान होता है।

चौदहवाँ गुणस्थान

चौदहवाँ अयोगी केवली गुणस्थान है। यहाँ पर पूर्णतया आश्रव निरोध व संवर प्राप्ति होती है। कर्मों का बन्ध सर्वथा रूक जाता है। वीतरागी होने पर भी जो शुभ योग के द्वारा द्विसमयक स्थिति वाला सात वेदनीय बन्धन होता था वह भी अवरूद्ध हो जाता है। यहाँ आत्मा शैलेशी अवस्था को प्राप्त हो जाती है, अर्थात् मेरू की तरह निश्चल और निष्प्रकम्प अवस्था को प्राप्त हो जाती हैै। इस अवस्था में प्राणी सर्वथा अनाहारक रहता है।

यहाँ पर खाना-पीना, बोलना, चलना, धर्मोपदेश, प्रश्नोत्तर आदि शुभ यौगिक क्रियाओं का सर्वथा निरोध हो जाने तथा लेश्यारहित हो जाने पर भी चारों ही अघाति कर्म अवशिष्ट रहते हैं इससे वह संसारी व सशरीरी कहलाता है। इस अवस्था तक आत्मा के साथ औदारिक, तेजस और कार्मण ये तीनों शरीर लगे रहते हैं।

यहाँ पर यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब शुभयोग यहाँ पर नहीं है तो फिर अवशिष्ट कर्मों को दूर करने वाला कौन होगा ? यदि शुभ योग है तो फिर पुण्य बन्ध तो होगा ही इस स्थिति में आत्मा अयोग और अबन्ध अवस्था को कैसे प्राप्त हो सकती है ?

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उत्तर भी स्पष्ट है। यद्यपि वहाँ पर शुभयोग नहीं होता पर शुभयोग जन्य आत्मा का वेग वहाँ पर अवश्य रहता है। उसी के बल पर आत्मा कर्मों से सर्वथा मुक्त होती है।

इसे उदाहरणपूर्वक यों समझा जा सकता है कि – जैसे इंजिन के बिना डिब्बे चल नहीं सकते, फिर भी कहीं कहीं यह देखने को मिलता है कि इंजिन से ढकेला गया डिब्बा इंजिन के बिना भी कुछ दूर तक चलता रहता है, वहाँ इंजिन नहीं होता पर इंजिन के द्वारा प्रदत्त वेग होता है और उसी के बल पर वह चलता है। इसी तरह शुभयोग के बिना निर्जरा नहीं होती परन्तु चौदहवें गुणस्थान में शुभयोग न होने पर भी उससे उत्पन्न वेग से वहाँ निर्जरा तो होती है पर शुभयोग न होने के कारण पुण्यबन्ध नहीं हो पाता।

इस तरह इस थोड़े समय की अबन्ध अवस्था में रहकर जीव सम्पूर्ण कर्म दूर कर मोक्ष प्राप्त करता है। इसकी स्थिति पाँच हृस्व अक्षर उच्चारण जितनी होती है। सिद्ध होने एवं समस्त कर्म छूटने का समय एक ही होता है। इसीलिए जयाचार्य ने कहा है:-

प्रथम समय ना सिद्ध चार कर्मां ना अंश खपावे।
चौथे ठाणे प्रथम उद्देशे बुद्धिवन्त न्याय मिलावे।।

झीणी चर्चा, गुणस्थान दिग्दर्शन
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समस्त कर्मों से छूटना ही मोक्ष है। यह आत्मा की पूर्ण पवित्रता की स्थिति होती है। निर्जरा और मोक्ष में इतना ही अन्तर है कि निर्जरा आत्मा की अपूर्ण विशुद्धि है, जबकि मोक्ष पूर्ण विशुद्धि। निर्जरा के कारणभूत शुभोपयोग को भी निर्जरा कहा जाता है। पर वह औपचारिक निर्जरा होती है। यह गुणस्थान अशाश्वत है। यदि मिले तो एक साथ ग्रहण करने वाले 108 मिल सकते है।

गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग-3)

षष्ठम गुणस्थान

छठा प्रमत्त संयत गुणस्थान है। “सर्व व्रतः संयतः” अर्थात् सर्व विरति युक्त व्यक्ति को संयत कहते हैं। यह देश विरति से उच्च स्तरीय स्थिति होती है; इस गुणस्थान में मिथ्यात्व और अविरत आश्रव का तो पूर्ण निरोध हो जाता है पर प्रमादादि तीन आश्रवों के कारण आत्मा के निरन्तर पाप कर्म चिपकते रहते हैं।

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यहाँ इतना स्मरण रहे कि जो पाँच प्रमाद-मद, विषय, कषाय, निद्रा और विकथा के नाम से प्रसिद्ध हैं वे प्रमाद आश्रव न होकर अशुभ योग आश्रव हैं। जो छठे गुणस्थान में निरन्तर नहीं रहते क्योंकि निरन्तर रहने से षष्ठ गुणस्थान ही (साधुपन) नहीं रह सकता छद्मस्थता के कारण कदाचित् जब इस ओर प्रवृत्ति हो जाती है तब उसका प्रायश्चित करना पड़ता है।

यहाँ जिस प्रमाद आश्रव का कथन है उसका अर्थ है ’अनुत्साह प्रमादः’ अर्थात् अन्तरात्मा में संयम के प्रति अनुत्साह। प्रमाद आश्रव षष्ठ गुणस्थान में निरन्तर रहता है।

साधुत्व ग्रहण करते समय सर्व सावद्य (अशुभ) योग का त्याग कर दिया जाता है साधुओं की समस्त कल्प क्रियाएं शुभ योग होती हैं। उनका खान-पान, गमनागमन, जल्पन, शयन आदि भी शुभ योग है उससे कर्म निर्जरा होती है, एवं साथ-साथ पुण्य बन्ध भी होता है। साधुओं के आहार एवं भिक्षावृत्ति को असावद्य बताया है अतः यह सब धर्म है।

इस गुणस्थान मेंचौदह योग, छः समुद्घात, पांच शरीर और छः लेश्या आदि होने का उल्लेख मिलता है वह कदाचित्कता की दृष्टि से ही किया गया है इनमें जो जो अशुभ है वे सब त्याज्य हैं। छद्मस्थता के कारण कभी-कभी ये त्याज्य प्रवृतियाँ भी भूल स्वरूप हो जाती है। सिद्धान्तों में कहा है कि दृष्टिवाद का अध्येता भी कहीं-कहीं वचन में स्खलना कर देता है। इतना ही नहीं किन्तु चार ज्ञान के धारक भी भूल कर जाते हैं। यह सब मोह की महिमा जाननी चाहिए। इसी के कारण आत्मा अशुभ कर्मों को आकर्षित करती है और इसी के उदय से असत् प्रवृतियाँ हुआ करती हैं। इसका उदय मात्र पाप बन्ध का कारण है।

षष्ठ गुणस्थानवर्ती मुनि गलतियाँ तो करता है पर जब तक उन गलतियों का प्रायश्चित करने की भावना रखता है तब तक नीति विशुद्ध होने के कारण अविरत आश्रव नहीं आता और उसकी साधुता नहीं जाती। इस विषय को स्पष्ट करते हुए जयाचार्य ने अपनी “नियंठों की ढ़ाल” में कहा है-

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मासी चैमासी दण्ड थी रे छट्ठो
गुण ठाणों न फिरे सोय रे।
फिर अन्धी श्रद्धा ने थाप थी रे
भाई बले जबर दोष थी जोय रे।
सगुण जन स्वाम वचन अवलोय रे।

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षष्ठ गुणस्थानवर्ती साधु का प्रमाद गुणस्थान नहीं है। यह तो सावद्य है, हेय है। गुणस्थान तो सर्व व्रत रूप संयम है वह निरवद्य एवं उपादेय है।

यह गुणस्थान भी शाश्वत है। पूर्वोक्त गुणस्थान की तरह इसमें असंख्य जीव नहीं है परन्तु संख्य ही है। उनकी संख्या जघन्यतः दो हजार चार सौ दो क्रोड़ तथा उत्कृष्ट नव हजार क्रोड़ होती है।

यह गुणस्थान सिर्फ कर्म भूमिक संख्य वर्ष आयुष्य पर्याप्त संज्ञी मनुष्य के ही हो सकता है अन्य के नहीं। इसकी स्थिति देशोन क्रोड़ पूर्व की है।


सातवाँ गुणस्थान

सप्तम अप्रमत्त संयत नामक गुणस्थान है। इसमें प्रमाद आश्रव का सर्वथा निरोध हो जाता है। अशुभ योग, अशुभ लेश्या, अशुभ ध्यान आदि भी निरूद्ध हो जाते हैं। इस गुणस्थान में निरन्तर ही विशुद्ध परिणाम रहते हैं।

पंचम गुणस्थानवर्ती व्यक्तियों को अविरत की अपेक्षा एवं षष्ठ गुणस्थानवर्ती व्यक्तियों को अशुभ योग की अपेक्षा से सिद्धान्तों में आरम्भी बताया गया है, किन्तु यहाँ अविरत और अशुभ योग का पूर्णतः अभाव होने के कारण इसे अनारम्भी बताया गया है। यहाँ पाँच क्रियाओें में से चार का अभाव होता है केवल एक “माया वत्तिया” क्रिया लगती है।

यहाँ पाप बन्ध के पाँच कारणों में से चार-मिथ्यात्व, अविरत, प्रमाद और अशुभ योग तो सर्वथा रूक जाते हैं पर जो एक कषाय आश्रव अवशिष्ट रहता है उसके द्वारा निरन्तर पाप लगता है। यह कषाय हेय है, सावद्य है किन्तु गुणस्थान नहीं, गुणस्थान तो अप्रमत्त अवस्था एवं संयम है। वह निरवद्य है, उपादेय है।

यह गुणस्थान संयम ग्रहण के समय तो प्रायः आती ही है पर बाद में भी जब-जब परिणामों की अत्यन्त एकाग्रता होती है और प्रमाद आश्रव छूट जाता है तब छट्ठे  से सातवां गुणस्थान आ जाता है। किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं ठहरती अन्तर्मुहुर्त के बाद वापिस छट्ठा  गुणस्थान आ जाता है।

यह गुणस्थान अशाश्वत है। यदि मिले तो इसमें उत्कृष्ट दो सौ करोड़ मिल सकते हैं। इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त की है।


आठवां गुणस्थान

आठवां गुणस्थान निवृति बादर गुणस्थान है। इसमें आया हुआ प्राणी स्थूल बादर संज्वलन कषाय से निवृत होता हुआ क्रमशः आगे बढता जाता है।

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आगे बढने वाले प्राणियों को यहाँ से दो श्रेणियां मिलती है-उपशम एवं क्षपक। जयाचार्य ने चौबीसी की चौदहवीं गीतिका में कहा है-

आठमां थी दोय श्रेणी छे रे, उपशम क्षपक पिछाण।
उपशम जाय ग्यारहवें रे, मोह दबावतो जाण।

चौबीसी, ढाल 14

इस गुणस्थानवर्ती व्यक्ति को क्षायोपशमिक सम्यक्त्व नहीं होती। क्योंकि वह सातवें गुणस्थान से आगे नहीं हो सकती, यहाँ औपशमिक या क्षायिक सम्यक्त्व होती है। उपशम श्रेणी लेने वाले के उक्त दोनों प्रकार की सम्यक्त्व हो सकती है क्योंकि क्षायिक सम्यक्त्व होते हुए भी उपशम श्रेणी ली जा सकती है, उपशम श्रेणी वाला मोह कर्म की प्रकृतियों को दबाता जाता है।

इस श्रेणी वाला संयमी यहाँ से बढकर नवें दसवें एवं ग्याहरवें गुणस्थान तक चला जाता है और वहाँ मोहनीय कर्म को पूर्णतः उपशान्त कर उपशम चारित्र प्राप्त कर लेता है परन्तु उससे आगे उसका रास्ता बन्द होता है क्योंकि अवशिष्ट सात कर्मों का उपशम नहीं होता, तथा मोह कर्म के ’उपशम’ की स्थिति भी अन्तर्मुहुर्त से अधिक नहीं होती, अतः वह या तो क्रमशः वापिस नीचे आता है, या यदि आयु पूर्ण हो गई हो तो स्वर्गवासी बन जाता है।

जो व्यक्ति यहाँ से क्षायिक श्रेणी ग्रहण करते है उनके क्षायिक सम्यक्त्व ही होता है। वे क्रमशः मोह कर्म की प्रकृतियों को क्षय करते हुए आगे बढते है। आठवें से नवमां एवं दसवां गुणस्थान प्राप्त कर लेने के बाद वे ग्यारहवें को छोड़कर सीधे बारहवें गुणस्थान में पहुँच जाते है, वहाँ पर मोहनीय का सर्वथा क्षय हो जाता है और फिर ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय तथा अन्तराय का भी क्षय हो जाता है। इस प्रकार चार घाती कर्मों के साथ ही वे सर्वज्ञ हो जाते हैं और फिर यथा समय योग निरोध करते हुए मोक्ष प्राप्त करते हैं।

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क्षायिक श्रेणीवाला वापिस नहीं गिरता और वह मध्य में आयुष्य पूर्ण भी नहीं करता क्योंकि समूल नष्ट की हुई प्रकृतियाँ फिर पनप नहीं सकती। झीणी चर्चा में जयाचार्य ने कहा है-

क्षपक श्रेणी में काल करे नहीं, पड़े नहीं ते पाछो रे।
दशवां थी बारवां तेरवां गुण, केवल पामे जाचो रे।

झीणी चर्चा

इस तरह क्षायक श्रेणी वाला जो गुण प्राप्त करता है। वह शाश्वत है। उपशम श्रेणी लेने वाला उसी भव में फिर क्षायिक श्रेणी नहीं ले सकता अतः वह मोक्ष भी नहीं जा सकता। जो मोक्षगामी होते हैं वे क्षायक श्रेणी ही लेते है। जयाचार्य कहते हैं-

उपशम श्रेणी जिन ना लहे रे क्षपक श्रेणी धर खंत।
चारित्र मोह खपावतां रे चढिया ध्यान अत्यंत।

चौबीसी, ढाल 14
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यहाँ पर जितना स्थूल बादर कषाय से निवृत होता है वही गुणस्थान है पर जितना कषाय, वेद व हास्यादि प्रकृतियों का उदय है वह सब सावद्य है, पाप कर्म बन्ध का कारण है, अतः हेय है।

यह गुणस्थान वर्तमान में भरत क्षेत्रस्थ साधुओं में नहीं है। यह गुणस्थान अशाश्वत है। यदि मिले तो 54 उपशम श्रेणी वाले एवं 108 क्षायिक श्रेणी वाले मिल सकते हैं, यों दोनों मिलकर एक साथ ग्रहण करने वाले 162 हो जाते हैं। इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त है।

नवमां गुणस्थान

नवमां अनिवृत्ति बादर गुणस्थान है। यद्यपि बादर कषायों से निवृत्ति का प्रारम्भ तो पिछले गुणस्थान में ही हो जाता है पर इसमें उस निवृत्ति में काफी वृद्धि हो जाती है फिर भी पूर्ण निवृत्ति यहाँ नहीं हो पाती। इसी दृष्टिकोण से इसका नाम अनिवृत्ति बादर गुणस्थान किया गया है।

यहाँ उपशम या क्षायिक रूप में कषायों की जितनी भी निवृत्ति होती है वह गुणस्थान है, उपादेय है। एवं जो काषायिक उदय है वह सावद्य है, हेय है। वह गुणस्थान नहीं है।

इस गुणस्थान में प्रविष्ट प्रणाली क्रमशः नपुंसक वेद, स्त्री वेद, हास्य, अरति, रति, शोक, भय, जुगुप्सा, पुरूष वेद, संज्वलन-क्रोध, मान, माया उपशम श्रेणी वाला दबाता जाता है, तथा क्षपक श्रेणी वाला नष्ट करता जाता है। अन्त समय में एक लोभ रहता है।

श्री जयाचार्य ने कहा-

नवमें आदि संजल चिहुँ रे अन्त समय इक लोभ।

चौबीसी, ढाल 14

मोह कर्म की 28 ही प्रकृतियों के क्षय का क्रम बतलाते हुए श्री जयाचार्य झीणी चर्चा में कहतें हैं –

प्रथम चोक अनुतान फुनः मिथ्यात्व खपावे,
फुनः मिश्रमोह टाट फुनः समकित मा जावे।
अप्रत्या प्रत्या चोक नपुंसक पुनः श्री वेदः,
हास अरति रति शोग बले दुगुँछा भय छेदः
पुरूष वेद संज्वलन कोह मान माया लोह खपत कर्म
चढ खपक सेणि मह मुनि लहे अनन्तनाण शिवबुधपर्म

झीणी चर्चा

यह गुणस्थान भी आठवें की तरह आशाश्वत है। इसकी स्थिति भी अन्तर्मुहुर्त है। इस गुणस्थान में प्राणी के सात कर्म का बन्ध होता रहता है।


दशम गुणस्थान

दसवां सूक्ष्म संपराय गुणस्थान है। मोह की अट्ठाईस प्रकृतियों में से सत्ताईस तो इस गुणस्थान से पूर्व ही सर्वथा उपशान्त या क्षय हो जाती है इसमें केवल एक संज्वलन लोभ शेष रहता है वह भी सूक्ष्म मात्रा में ही होता है।

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इस गुणस्थानवर्ती व्यक्ति का चरित्र एवं गुणस्थान सूक्ष्म संपराय कहलाता है। सूक्ष्म संपराय का अर्थ होता है थोड़ा सा कषाय। यहाँ पर भी जो थोड़ा सा कषाय अवशिष्ट रहता है वह गुणस्थान नहीं हैै, गुणस्थान तो उस जीव का उज्ज्वल चारित्र है।

यहाँ पर अनाकार उपयोग नहीं होता क्योंकि दशम गुणस्थान का प्रारम्भ साकार उपयोग से होता है और साकार उपयोग की अन्तर्मौहूर्तिक स्थिति इस गुणस्थान की अन्तर्मौहूर्तिक स्थिति से अधिक होती है अतः अनाकार उपयोग आने से पहले ही गुणस्थान बदल जाता है।

यहाँ पर सूक्ष्म संपराय के कारण निरन्तर छह कर्मो का ही बन्ध होता है। आयुष्य एवं मोहनीय कर्म का यहाँ पर बन्ध नहीं होता। यद्यपि यहाँ पर मोह कर्म का उदय रहता है, फिर भी वह इतना प्रबल नहीं होता कि फिर से मोह कर्म का बन्ध कर सके। आयुष्य कर्म का बन्ध तो सातवें से आगे है ही नहीं। सातवें में भी छट्ठे से आयुष्य का बन्ध प्रारम्भ हुआ हो तो उसे पूरा कर सकता है पर वहाँ नया बन्ध प्रारम्भ नहीं करता।

इस सम्बन्ध में जयाचार्य ने कहा हैः-

आयु अबन्ध सातमां आगे बलि तीजो गिण लीज्यो रे।

झीणी चर्चा

अर्थात् सातवें से अगले सभी गुणस्थान तथा तृतीय गुणस्थान में आयु बन्ध नहीं होता। इस गुणस्थान में वेदनीय कर्म का बन्ध भी सात वेदनीय तक ही सीमित है। असात वेदनीय का बन्ध नहीं होता।

यह गुणस्थान भी अशाश्वत है इसकी स्थिति अन्तर्मुहुर्त है। पिछले दोनों गुणस्थानों की अपेक्षा इसकी स्थिति कम है।