जैन धर्म में सरस्वती उपासना

भारत में देवी उपासना का क्रम अत्यंत प्राचीन काल से चला आ रहा है। देवी को शक्ति स्वरुप माना गया और शक्ति के अनेक रूपों में एक रूप विद्या का भी है। इसे ही सरस्वती का नाम दे दिया गया। देवी स्तोत्र में एक स्थान पर लिखा गया है-

या देवी सर्वभूतेषु, विद्यारूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः।।

जैन धर्म में यूं तो वीतराग एवं पञ्च परमेष्ठि को ही वंदनीय माना गया, परन्तु फिर भी देव गति के अस्तित्व को माना गया, वहीं उत्तरकालीन तंत्र ग्रंथों में सोलह प्रकार की विद्या देवियों के अस्तित्व पर भी चर्चा की गई है।

सरस्वती साधना को ज्ञान के विकास हेतु काफी महत्व दिया जाता रहा है और इसके असर से जैन परम्परा भी अछूती नहीं रही। कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचंद्र ने भी अपनी मुनि अवस्था में सरस्वती उपासना की ऐसा उल्लेख मिलता है। वहीं आचार्य वृद्धवादी, जिन्होंने ढलती वय में दीक्षा ली, ने भी ज्ञान के प्रति अपनी प्रबल प्यास को शांत करने हेतु 21 दिन के उपवास के साथ सरस्वती साधना की।

जैन परम्परा में सरस्वती की साधना से संबंधित अनेक मंत्र उपलब्ध हैं, जिनमें से दो मंत्र मुझे अत्यन्त प्रिय हैं:-

1. ओम् ऐम् नमः

2. ओम् णमो अणाइनिहणे तित्थयर पगासिए गणहरेहिं अणुमन्निए द्वादशांग-चतुर्दशपूर्वधारिणी श्रुतिदेवते सरस्वती अवतर अवतर सत्यवादिनी हुं फट् स्वाहा।

इनमें जो प्रथम मंत्र है, वह एक प्रकार का बीज मंत्र है। मैंने ऐसा महसूस किया है कि इस मन्त्र के उच्चारण के दौरान मस्तिष्क के फ्रंटल लोब और हाइपोथेलेमस एरिया में कम्पन बढ़ जाता है। एकाग्रता की कमी का एक कारण है फ्रंटल लोब की अल्प-सक्रियता। वहीँ हाइपोथेलेमस एरिया हमारे अनुभूतिपरक ज्ञान से सम्बन्ध रखता है। ऐसा संभव है कि इस मन्त्र का निर्माण करने वाले आचार्यों/मंत्रविदों ने इस प्रक्रिया पर ध्यान दिया हो! वैसे इस विषय पर शोध की गुंजाइस है।
दूसरा मन्त्र सरस्वती को एक देवी के रूप में न देखकर श्रुतज्ञान के प्रतीक के रूप में व्याख्यायित करता है। कितना सुन्दर पाठ है। “अनादिनिधन, तीर्थंकरों द्वारा प्रकाशित, गणधरों द्वारा मान्य, द्वादशांग-चतुर्दश पूर्व को धारण करने वाली सरस्वती जो कि सत्यवादिनी है वह मुझमें उतरे” इस भाव के साथ इस मन्त्र का जप किया जाये तो सहज ही एक सुखद अहसास होता है।

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वैसे मैं मन्त्र से सम्बंधित देवी-देवताओं को एक भाव-ऊर्जा के रूप में देखता हूँ। मुझे लगता है कि देव-गति के देवता और मन्त्र-देवता भिन्न-भिन्न हैं। इस सन्दर्भ में यदि आपके अपने कोई विचार हों तो कृपया मुझे अवगत करवाएं। आपके comments का मुझे इंतजार रहेगा…

आधुनिक युग का पूणिया श्रावक : रामसेवक पाल

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रामसेवक पाल

जन्म से जैन कहलाने वाले अनेक लोग हैं, मगर समझ-बूझ कर जैन बनने वाले और जैन सिद्धांतों का ह्रदय से पालन करने वाले विरले ही मिलते हैं। आज हम चर्चा करने जा रहें हैं एक ऐसे शख्स की जो दिखने में अत्यंत साधारण नजर आते हैं, मगर उनकी साधना अचंभित करती है और आगम युग के पूणिया श्रावक की याद दिलाती है।

जन्म से उत्तरप्रदेश के निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार के रामसेवक पाल वर्त्तमान में मुंबई रहते हैं। इन्होनें लगभग पंद्रह वर्ष पहले जैन तेरापंथ संघ के आचार्य श्री तुलसी के शिष्य मुनि श्री रविन्द्र कुमार जी के पास जैन धर्म स्वीकार किया था।

व्यावसायिक दृष्टि से घर घर घूमकर गुलाब-जामुन बेचने वाले रामसेवक बिना सामायिक किये मुँह में पानी भी नहीं लेते। रात्रि-कालीन शिफ्ट में काम करने के कारण इनकी सुबह की दिनचर्या काफी late शुरू हो पाती है और अपनी अनेकानेक अपरिहार्य परिस्थितिओं के कारण इन्हें सामायिक करते करते शाम भी हो जाती है, परन्तु अपने नियम धर्म को लेकर ये काफी दृढ रहते हैं।

जैन होने के नाते अनेक श्रावक इन्हें आर्थिक सहयोग देने का प्रयास भी करते हैं , परन्तु स्वावलम्बी विचारधारा का अनुसरण करने वाले रामसेवक केवल खुद की मेहनत पर ही भरोसा रखते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये प्रतिमाह दो उपवास भी करते हैं, साथ ही साथ इनकी स्वाध्याय में अच्छी रूचि है। अपने व्यावसायिक कार्य से समय निकाल कर अब तक अनेक पुस्तकें पढ़ चुके हैं।

हाल ही में ठाणे तेरापंथ भवन में आचार्य श्री महाश्रमण जी के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री महेंद्र कुमार जी के दर्शनार्थ आये तब आपसे मुलाकात हुई। आपकी कथा ने मुझे काफी प्रभावित किया, तब मैंने आपसे यह जानकारी शेयर करने की अनुज्ञा ली। स्वभाव से अत्यंत संकोची रामसेवक बड़ी मुश्किल से अपनी फोटो खिंचवाने हेतु तैयार हुए।

और हाँ, आपसे चर्चा के बाद मैंने गुलाब-जामुन का भी रसास्वादन किया, जो कि विशेष रूप से रोज-फ्लेवर वाले थे।

स्नान के लिए करें आगम सूत्रों का प्रयोग…

भारतीय संस्कृति में साधना और शुद्धि के बीच एक गहरा सम्बन्ध निरुपित किया गया है। प्रातःकालीन पूजा मन्त्र-जप आदि अनुष्ठानों से पूर्व स्नान को प्रायः अनिवार्य अंग की तरह व्याख्यायित किया गया है। जल में जीवन की घोषणा करने वाली जैन परंपरा में भी मंदिरों में पूजा-विधि के साथ स्नान-शुद्धि को अनिवार्य माना गया। शरीरिक-शुद्धि के लिहाज से उसकी उपयोगिता निर्विवाद है, पर क्या आत्म-शुद्धि के लिए भी यह (स्नान-शुद्धि) उतनी ही उपयोगी है?

यह सही है कि स्नान करने के पश्चात हम शारीरिक रूप से खुद को तरोताजा महसूस करते हैं। आलस्य का प्रभाव भी कुछ हद तक कम हो जाता है। वहीँ जैन परंपरा में ज्ञान के अतिचारों में वर्णित अस्वाध्याय के कारणों— यथा मल-मूत्र, वीर्य रक्त आदि अशुभ तत्वों की विशुद्धि भी हो जाती है, जिनके रहने पर स्वाध्याय नहीं किया जा सकता।

जैन आगमों में तीर्थ-स्नान से सम्बंधित एक प्रश्न के उत्तर में भाव स्नान का बेहद खूबसूरती से वर्णन किया गया है—

धम्मे हरए बम्भे संतितित्थे, अणाविले अत्तपसन्नलेस्से।

जहिंसि ण्हासो विमलो विसुद्धो, सुसीइभूओ पजहामि दोषं।।

 

अर्थ- अकलुषित, आत्मा को प्रसन्न करने वाली शुभ लेश्या रूप धर्म, जलाशय है और ब्रह्मचर्य रूप शांति तीर्थ है। जहाँ स्नान करके मैं विमल, विशुद्ध और शीतल होकर पाप को दूर करता हूँ।

 

एयं सिणाणं कुसलेहि दिट्ठं, महासिणाणं इसिणं पसत्थं।

जहिंसि ण्हाया विमला विसुद्धा, महारिसी उत्तम ठाण पत्तए।।

 

अर्थ- तत्त्व ज्ञानियों ने यह स्नान देखा है। यही वह महास्नान है जिसकी ऋषियों ने प्रशंसा की है। जिस स्नान से महर्षि लोग विमल और विशुद्ध होकर उत्तम स्थान— मोक्ष को प्राप्त हुए हैं।

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हरिकेशी मुनि द्वारा प्रतिपादित इस भाव-स्नान का प्रयोग एक स्नान-मंत्र की तरह जप-साधना अथवा अन्य साधना मन्त्रों के पूर्व किया जा सकता है। अर्थ-चिंतन के साथ इस मन्त्र का प्रयोग करें, साधना को विशेष गहराई मिलेगी। वैसे नियमित रूप से द्रव्य-स्नान (जल-स्नान) के बाद भी इस मंत्र के साथ भाव स्नान कर नकारात्मक उर्जाओं से अपने तन, मन और आत्मा की विशुद्धि की जा सकती है।

प्रयोग करें और अपने अमूल्य अनुभव सबके साथ शेयर करें………

मैत्री पर्व ऐसे मनाएं

संवत्सरी महापर्व की पावन संध्या।

प्रेम और मैत्री भाव का उमड़ता हुआ समंदर।

खमतखामणा, मिच्छामि दुक्कड़ं की मधुर स्वर लहरियों से स्निग्ध होता हुआ मन।

मैं भी इस पर्व को मना रहा हूँ। सबसे पहले किससे खमतखामणा करूँ?

यह प्रश्न मन को आंदोलित कर रहा है।

मैं स्व को सर्वाधिक महत्व देने वाला व्यक्ति हूँ। इस अपेक्षा को सामने रखकर सर्वप्रथम स्वयं से ही क्षमा प्रार्थना की। किसी और के साथ यदि मैंने कोई दुर्व्यवहार किया है तो उसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव तो मैंने स्वयं ही भोगा है। क्या किसी और के माफ़ कर देने से मेरा बोझ हल्का हो जायेगा? जब तक कि मैं स्वयं ही खुद को माफ़ न कर सकूँ। जब भी आत्मा किसी प्रकार के पापकर्म में लिप्त होती है तो उसका बुरा प्रभाव इस आधार पर नहीं मिलता कि सामने वाले जीव ने कितना कष्ट पाया, अपितु इस आधार पर मिलता है कि पाप करने वाले के मन के परिणाम कैसे रहे। सबसे पहले मैं स्वयं के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। अपने शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार किया तो सहज ही मेरे सामायिक हो गयी। इसके पश्चात् शुद्ध स्वरूप को उपलब्ध परम पुरुषों के स्वरूप का आलंबन लिया तो चउवीसत्थव हो गया। गुरु के समक्ष निवेदन हेतु गया ताकि किसी के समक्ष अपना सब पाप निवेदन करने की क्षमता है अथवा नहीं, यह वंदना आवश्यक हो गया। फिर यात्रा की अपने अतीत की, प्रतिक्रमण में। पापकर्म एक प्रकार का तनाव उत्पन्न करता है, उस तनाव से मुक्त होने के लिए कायोत्सर्ग किया और भविष्य के लिए प्रत्याख्यान भी किया।

खुद को यदि माफ़ नहीं कर पाता तो दूसरों की माफ़ी से मुझे क्या मिलता?

तो आज के इस पावन अवसर पर खुद को माफ़ करता हूँ, मेरे दुष्कृत मिथ्या हो जाएँ (मिच्छामि दुक्कड़ं)

खुद के शुद्ध अस्तित्व को स्वीकार करता हूँ। खुद पर प्रेम की बरसात करता हूँ।

I LOVE YOU, PIYUSH!

I LOVE YOU MORE THEN ANYBODY ELSE.

I LOVE YOU MORE THEN ANYONE ELSE DO.

I ACCEPT YOUR INNER BEAUTY, AND FEEL GRATITUDE FOR BEING HERE ALWAYS.

ONCE AGAIN I DECIDE TO LOVE YOU FOREVER…

HUGS AND KISSES………….

Jain old tattvik bhajan playlist

जैन दर्शन को गहराई से समझने के लिए अनेक जैन आचार्यों ने तात्विक गीतों की रचना की। इन गीतों में जीवन का सार भी छिपा है और जैन तत्त्वज्ञान भी बड़ी सरलता से समझ में आ जाता है इन गीतों के माध्यम से …
तो प्रस्तुत है ऐसे ही गीतों की एक छोटी सी ऑडियो लिस्ट..जिसे मुनि श्री दिनेश कुमार जी ने स्वर दिए हैं।

45 min. Meditation Session with Piyush

You are the author of

Your own Health

or

Your own Disease.

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Learn, how to make your life healthy, happy and filled with energy with Piyush Kumar Nahata, a known Jain scholar, counselor and meditation expert. Piyush is the founder of evo4soul, a complete technique to align your body mind and soul.

 

 

In this session you will ..

  • Experience a 20 minute meditation with Piyush.
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Samavsaran Meditation

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Did you ever want to go to Mahavideh Kshetra and get the darshan of Simandhar Swami
Let’s do this journey with a 36 minutes meditation
Wear your earphone and connect your inner core…

Mahavideh kshetra is known as an mythological concept well-known to Jain cosmology. It’s believed here that after the starting of fifth ara of avasarpini kaal (a part of infinite time) Tirthankar and Keval Gyan (infinite knowledge) has been stopped to exist. Only the Mahavideh kshetra is the area where one can attain keval gyan or become a tirthankar. It is believed that including Simandhar svami there are 20 Tirthankaras existing at Mahavideh Kshetra.

Samavasaran
AN BEAUTIFUL ART OF SAMAVSARAN KSHETRA

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evo4soul Defined

cropped-evo4soul01.png‘evo4soul’ is a brainchild of Piyush Kumar Nahata. He has been working for more than two decades to understand the process of evolution theory in the context of ancient Indian wisdom provided by Rishis, Tirthankaras and Buddhas. After a deep analysis of both systems he designed a genius system to evolve the soul. It’s a complete guide to align the body, mind and soul. It would be interesting to know more about the methods, programs and practices of evo4soul.

In short evo4soul is a science to utilize your own potential to create a better personality and to get access of your hidden inner core.

 

Self Love : A powerful healing technique

After brushing your teeth say “I love you”.
Before bed time 30 min. –Me time—.
Once per day “Compliment another guy”.
Once in a day “Take your meal with awareness”.
Once in a day “love your complete body”.


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गुणस्थान मीमांसा : मुनि राजकरण (भाग 5)

गुणस्थानों की हेयोपादेयता

गुणस्थानों की हेयता तथा उपादेयता के विषय में जिज्ञासा हो सकती है अतः उस पर भी चिन्तन कर लेना यहाँ अप्रासंगिक नहीं होगा। अपेक्षा दृष्टि से इस प्रश्न के तीन उत्तर हो सकते है-

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  1. गुणस्थान सभी उपादेय हैं क्योंकि आत्मा के पवित्र गुणों के स्थान को गुणस्थान कहा जाता है। चौदह गुणस्थानों में प्रथम गुणस्थान सबसे अल्प गुण वाला है फिर भी आत्मा के न्यूनतम गुण की ही वह स्थिति है। गुण कभी हेय नहीं होता। राख कितनी ही क्यों न हो पर चिनगारी की अवज्ञा नहीं की जा सकती। अगले गुणस्थान में आत्मा की उज्जवलतर स्थितियाँ होती है, इसलिए आत्मोज्ज्वल्य की न्यूनतम से लेकर उच्चतम स्थिति तक भी सभी भूमिकाएँ उपादेय ही ठहरती है।
  2. सभी गुणस्थान हेय हैं यह भी एक अपेक्षा से ठीक है। क्योंकि आत्मा की पूर्ण पवित्रता किसी भी गुणस्थान में नहीं होती।चौदहवें गुणस्थान में भी आत्मा के चार कर्म लगे रहते हैं। जिसमें आयुष्य के सिवा बाकी तीन कर्मअशुभ भी हो सकते है। मुक्ति महल की वह चाहे अन्तिम पेड़ी ही हो पर है तो सोपान ही, महल नहीं है। उसको पार करने से ही पूर्ण आत्मानन्द पाया जा सकता है, पहले नहीं। आत्मानन्द की पूर्णता के लिए सोपान को लांघना ही श्रेयस्कर है पर वहाँ टिके रहना नहीं।
  3. पूर्व-पूर्व गुणस्थान हेय एवं उत्तर-उत्तर गुणस्थान उपादेय है। जैसे पाँचवे गुणस्थान वाले के लिए छठा उपादेय है और सातवें वाले के लिए हेय है। क्योंकि उत्तर गुणस्थानों में आत्मविशुद्धि बढती जाती है, एवं पूर्व गुणस्थानों में उत्तर की अपेक्षा से आत्म विशुद्धि की कमी होती हैं। अतः श्रावक को साधु बनना चाहिए, पर साधु को श्रावक नहीं क्योंकि पहले में आत्म गुणों की वृद्धि होती है एवं दूसरे में हानि। यह हेयोपादेय सम्बन्धी प्रश्न का अपेक्षा भेद से उत्तर है। वास्तव में तो जैसा कि ऊपर बताया गया है सभी गुणस्थान उपादेय हैं।

गुणस्थानों की अमरता

चौदह गुणस्थानों में तीन गुणस्थान अमर हैं। अर्थात् तीसरे, बारहवें तथा तेरहवें में कोई भी जीव आयुष्य पूरा नहीं करता। जयाचार्य ने कहा है-

तीन गुण ठाणा अमर कह्या छे, तेरम बारम तीजो रे।

झीणी चर्चा

गुणस्थानों में कर्मबन्ध

चौदह गुणस्थान में नवमें तक सात कर्मों का (आयुष्य छोड़ कर) निरन्तर बन्धन होता है। दसवें में (आयुष्य, मोह बिना) छह कर्मों का निरन्तर बन्धन होता है। ग्यारहवें, बारहवें और तेरहवें में एक सात वेदनीय कर्म का बन्धन होता है। तीसरे गुणस्थान को छोड़कर सातवें तक आयुष्य का बन्धन होता है। आयुष्य का बन्धन एक भव में एक बार ही होता है। छठे में यदि आयुष्य कर्म का बन्धन प्रारम्भ किया हो तो सातवें में पूर्ण कर सकता है पर सातवें में आयुः बन्ध प्रारम्भ नहीं करता। जयाचार्य कहते है-

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आयु अबंध सातमां आगे बलि तीजो गिण लीज्यो रे।

झीणी चर्चा

गुणस्थान में कर्मोदय

दसवें गुणस्थान तक आठों ही कर्मों का उदय रहता है। ग्यारहवें तथा बारहवें मे सात कर्मों का एवं तेरहवें चौदहवें में चार कर्मों का। ग्यारहवें तक मोह कर्म की सत्ता रहती है। बारहवें तक ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय एवं अंतराय की सत्ता रहती है तथा बाकी चार कर्मों – आयुष्य, नाम, गौत्र एवं अंतराय की सत्ता चौदहवें गुणस्थान तक रहती है।

गुणस्थान और भाव

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि कर्म दूर होने से होने वाली आत्मा की क्रमिक विशुद्धि का नाम गुणस्थान है। इनमें से प्रथम दस गुणस्थान क्षयोपशम भाव से प्राप्त होते हैं, ग्यारहवाँ उपशम भाव से, बारहवाँ, तेरहवाँ क्षायक भाव से एवं चौदहवाँ पारिणामिक भाव से। उतः प्रथम दस गुणस्थान क्षयोपशम भाव, ग्यारहवाँ उपशम भाव, बारहवाँ एवं तेरहवाँ क्षायिक भाव और चौदहवाँ पारिणामिक भाव कहलाता है। सम्यक्त्व की अपेक्षा से चतुर्थ गुणस्थान को उपशम एवं क्षायिक भाव भी कहा जा सकता है।

गुणस्थानवर्ती जीव और भाव

भेद विज्ञान से:- औदयिक भाव के 33, औपशमिक भाव के 8, क्षायिक भाव के 13, क्षायोपशमिक भाव के 32 भेद किए जाते है। वे यथाक्रम यों हैं:-

औदयिक भाव के 33 भेद

चार गति, छः काय, छः लेश्या, चार कषाय, तीन वेद, मिथ्यात्व, अव्रत, अमनस्कता, अज्ञानता, आहारता, संसारता, असिद्धता, अकेवलित्व, छद्मस्थता, सयोगिता।

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औपशमिक भाव के 8 भेद – 1. उपशम क्रोध 2. उपशम मान, 3. उपशम माया, 4. उपशम लोभ, 5. उपशम राग, 6. उपशम द्वेष, 7. उपशम सम्यक्त्व, 8. उपशम चारित्र।

क्षायिक भाव के 13 भेद – 1. केवल ज्ञान, 2. केवल दर्शन, 3. आत्मिक सुख, 4. क्षायिक सम्यक्त्व, 5. क्षायिक चारित्र, 6. अटल अवगाहन, 7. अमूर्तिपन, 8. अगुरूलघुपन, 9. दान लब्धि 10. लाभ लब्धि, 11. भोग लब्धि, 12. उपभोग लब्धि, 13. वीर्य लब्धि।

क्षायोपशमिक भाव के 32 भेद –

ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. मति ज्ञान, 2. श्रुतज्ञान, 3. अवधि ज्ञान, 4. मनःपर्यव ज्ञान, 5. मति अज्ञान, 6. श्रुत अज्ञान, 7. विभंग अज्ञान, 8. भणन गुणन।

दर्शनावरणीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. श्रोत्रेन्द्रिय, 2. चक्षुरिन्द्रिय, 3. घ्राणेन्द्रिय, 4. रसनेन्द्रिय, 5. स्पर्शनेन्द्रिय, 6. चक्षु दर्शन, 7. अचक्षु दर्शन, 8. अवधि दर्शन।

मोहनीय कर्म के क्षयोपशम से – 1. सामायिक चारित्र, 2. छेदोपस्थापनीय चारित्र, 3. परिहार विशुद्धि चारित्र, 4. सूक्ष्म संपराय चारित्र 5. देशविरति 6. सम्यक् दृष्टि 7. मिथ्या दृष्टि, 8. सम्यक् मिथ्या दृष्टि।

अन्तराय कर्म के क्षयोपशम से – 1. दान लब्धि, 2. लाभ लब्धि, 3. भोग लब्धि, 4. उपभोग लब्धि, 5. वीर्य लब्धि, 6. बाल वीर्य, 7. पण्डित वीर्य, 8. बाल पण्डित वीर्य।

उदय एवं क्षय आठों कर्मों का होता है। उपशम केवल मोहकर्म का होता है। क्षयोपशम उपर्युक्त चार कर्मों का होता है।

विभिन्न गुणस्थानवर्ती जीवों में उपर्युक्त चारों- (उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम) भावों के कितने भेद पाए जाते हैं, तथा जीव भेद आदि बोल किस गुणस्थान में कितने पाते हैं इनको निम्नोक्त यन्त्र के द्वारा स्पष्टता से समझा जा सकता है। वह यन्त्र यों है:-

क्र.औद
यिक
औप
शमिक
क्षा
यिक
क्षायो
पशमिक
जीव भेदयोगउप योगलेश्या
त्मा
दृष्टिदंड कपक्ष
13300191413666मिथ्या242
2270019613667सम्यक्19शुक्ल
3270019110666मिश्र16शुक्ल
4261119213667सम्यक्16शुक्ल
5241120112667सम्यक्2शुक्ल
6221123114768सम्यक्1शुक्ल
719112315738सम्यक्1शुक्ल
817112115718सम्यक्1शुक्ल
917112115718सम्यक्1शुक्ल
1011111715718सम्यक्1शुक्ल
1110211915717सम्यक्1शुक्ल
1210021915717सम्यक्1शुक्ल
13709012217सम्यक्1शुक्ल
14409012206सम्यक्1शुक्ल

(यन्त्र नं. 1)

मुक्ति

चौदहवाँ गुणस्थान छूटते ही आत्मा बिल्कुल कर्म रहित हो जाती है। कर्म रहित आत्मा ऋजु गति करती है वक्र गति नहीं। जहाँ मुक्ति हुई कि बस उसी सीध में लोक के मस्तक पर जा ठहरती है। सिद्धावस्था से पूर्व शरीर जितना आकाश घेरे रहता है, मुक्तावस्था में वह जीव उसके दो तिहाई आकाश को घेर कर रहता है।

कर्ममुक्ति होने से भी पूर्व शरीर की अपेक्षा से सिद्धों के आत्म प्रदेशों की अवगाहना में बहुत बड़ा अन्तर होता है। सिद्धों की जघन्य अवगाहना एक हाथ आठ आंगुल होता है। इसका कारण यह है कि सात हाथ से कम शरीर वाला सिद्ध नहीं होता। सात हाथ की अवगाहना वाला व्यक्ति जब उर्ध्व जानुओं में सिर झुकाकर ध्यान मुद्रा में बैठता है तब वह दो हाथ की अवगाहना वाला होता है वही आत्मा सिद्धावस्था मे दो तिहाई अवगाहना का रहता है, तब जघन्य अवगाहना वाला होता है। उत्कृष्ट 500 धनुष्य की अवगाहना वाला सिद्ध होता है और वह खड़ा-खड़ा सिद्ध होता है तब उत्कृष्ट अवगाहना वाला सिद्ध होता है। इसी प्रकार मध्य की समस्त अवगाहनाएं समझ लेनी चाहिए।

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सिद्धों के रहने का स्थान पैंतालीस लक्ष योजन लम्बा-चैड़ा है। इसका कारण यह है कि मुक्त होने वाले जीव अढाई द्वीप में ही होते है, उनमें लाख योजन का जम्बूद्वीप है, उसके चारों तरफ द्विगुणित लवण समुद्र है, चारों ओर से दुगुना होने के कारण इनका सम्मिलित माप पूर्व से पश्चिम व उत्तर से दक्षिण तक पाँच लाख योजन हो जाता है। उसके चारों ओर चार लक्ष योजन का धातकी खण्ड है इसे सम्मिलित करने पर तेरह लाख योजन क्षेत्र हो जाता है। उसके बाद आठ लाख योजन का कालोदधि है इसे मिलाने पर 25 लाख हो जाता है। उसके बाद पुष्कर द्वीप है जो सोलह लक्ष योजन का है। जिसके मध्योमध्य चारों और मनुषोत्तर पर्वत है, इस पर्वत के अन्दर मनुष्य रहते है, बाहर केवल तिर्यंच ही हैं।

अतः इसका आधा क्षेत्र सम्मिलित करने पर पैंतालिस लक्ष योजन क्षेत्र हो जाता है। इसे मनुष्य क्षेत्र कहते हैं। इसके बाहर मनुष्य नहीं है। अतः वहाँ से सिद्ध भी नहीं होते। जो अनन्त सिद्ध हैं या अनन्त और भी होंगे वे सारे यहीं समा जाऐंगे। जैसे- एक दीपक के प्रकाश में सैकड़ों दीपकों का प्रकाश समा जाता है, वैसे ही ज्योतिर्मय सिद्ध समाविष्ट हो जाते हैं। सिद्ध स्थान से आगे अलोक है। धर्मास्तिकाय के अभाव के कारण वहां कोई नहीं जा सकता, क्योंकि धर्मास्तिकाय ही गति सहायक द्रव्य है, उसके अभाव में किसी भी जीव की गति नहीं हो सकती। अवगाहना की तरह पूर्वभव की अपेक्षा से सिद्धों के 15 भेद किए जाते हैं। वे इस प्रकार हैं:-

  1. तीर्थ सिद्ध, 2. अतीर्थ सिद्ध, 3. तीर्थंकर सिद्ध, 4. अतीर्थंकर सिद्ध, 5. स्वलिंग सद्धि 6. अन्यलिंग सिद्ध 7. गृहलिंग सिद्ध, 8. स्त्रीलिंग सिद्ध, 9. पुरूषलिंग सिद्ध, 10. नपुंसकलिंग सिद्ध 11. प्रत्येक बुद्ध सिद्ध, 12. स्वयं बुद्ध सिद्ध, 13. बुद्ध बोधित सिद्ध, 14. एक सिद्ध, 15. अनेक सिद्ध।
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इन 15 भेदों में से प्रत्येक सिद्ध में छह ही भेद पाते है इससे कम या अधिक नहीं पाते। भेदों में परस्पर अन्तर जरूर रहता है।

समय की अपेक्षा से सिद्धों के दो भेद किये जाते हैं- अनादि अनन्त तथा सादि अनन्त।

सिद्धावस्था प्राप्त होने पर आत्मा जन्म, मृत्यु, रोग, शोक, दुःख भय, जरा आदि से रहित हो जाती है उसके सुखों का न कभी क्षय होता है न कभी अन्त।

आचार्य श्री तुलसी ने सिद्ध स्तवन में कहा है कि

अक्षय अरुज अनन्त अचल अज अव्याबाध कहाए।
अजरामर पद अनुपम सम्पद तास अधीश सुहावे।

सिद्ध स्तवन

यह सिद्धावस्था ही सबके लिए काम्य है। गुणस्थानों का क्रमारोहण भी इसीलिए है। सिद्धि साध्य है

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और गुणस्थानों का क्रमिक आरोहरण उसका साधन। साध्य की सिद्धि के लिए साधन का ज्ञान महत्वपूर्ण होता है इसीलिए इस विषय पर यहाँ कुछ प्रकाश डाला गया है।