क्या देव होते हैं : एक चिंतन, भाग-1

देव, देवदूत, पितर, उच्च-स्तरीय चेतना आदि कुछ ऐसे शब्द हैं जिनको लेकर मानव सदा ही उत्सुक रहा है। आदिमानव भी देवपूजा करते थे इसके प्रमाण मिलते हैं। न सिर्फ भारत में बल्कि विश्व की तमाम प्राचीन सभ्यताएं चाहे वह सुमेरियन हो या बेबिलोनियन, ग्रीक हो या रोम सभी जगह देवों के अस्तित्व के सन्दर्भ में विश्वास रहे हैं। भारत में भी 5000 वर्ष से अधिक समय से देवपूजा का प्रचलन रहा है। विश्व की तमाम सभ्यताएं मुख्य रूप से बहुदेववादी रही है। एकेश्वरवादी कहलाने वाली ईसाई एवं इस्लामिक संस्कृति में भी एंजेल एवं पीरों के नाम पर अन्य देवों को भौतिक समस्याओं के समाधान हेतु पूजा जाता रहा है।

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क्या सच में देव अस्तित्व रखते हैं?
क्या वैज्ञानिक आधारों पर उनके अस्तित्व को सिद्ध किया जा सकता है?
क्या वे हमारी सहायता करते हैं?
क्या हमें उनकी पूजा करनी चाहिए?
उनकी पूजा का सम्यक विधान क्या है?
इत्यादि प्रश्न मानव मन में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं।

आज मैं अपने Blog में इसी सन्दर्भ में अपनी समझ और अनुभव के आधार पर कुछ तथ्य आपके समक्ष रखना चाहूँगा। हो सकता है कि आपका अध्ययन और पूर्व अवधारणाएं मेरे अनुभवों से मैच करे अथवा न करे, मगर चिंतन का एक नया द्वार अवश्य खुलेगा, ऐसा मैं विश्वास करता हूँ।

प्राचीन काल से जिन देवताओं पर मनुष्य विश्वास करता आया है आम तौर पर वे सभी प्रकृति में निहित शक्तियां थी। वेदों में जो ऋचाएं गाई गयी वे प्रायः प्राकृतिक रहस्यों एवं शक्तियों के प्रति अपनी आस्था की अभिव्यक्ति है। मनुष्य ने सूर्य को उगते हुए देखा और पाया कि सूर्य के साथ ही पूरी प्रकृति जाग जाती है, कण-कण में ऊर्जा का संचार हो जाता है, जब सूर्य नहीं होता तो सब कुछ थम जाता है, अँधेरे का मतलब है, भय। जंगल में जितने भी हिंसक जानवर हैं, वे रात्रि में अधिक सक्रिय हो जाते हैं। सूर्य के प्रति मानव के मन में एक श्रद्धा पैदा हुई और उसने सूर्य को देव मानना प्रारंभ कर दिया। समय बीता, और अग्नि का अविष्कार हुआ। सूर्य के जाने के बाद अग्नि एक ऐसा माध्यम बना जो जानवरों को दूर रखने में सहायक होता था, भोजन पकाने, और सर्दी की रातों में शरीर को गरम रखने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तो अग्नि को भी देवता का स्थान मिल गया। बादल और बारिश यदि सही समय पर न हो तो जीवन थम जाता है, न खेती होती है, न पीने का पानी मिलता है। तो उनकी शक्ति को नमन करते हुए उनको इंद्र देव के रूप में पूजा गया। समय-समय पर इसी प्रकार विभिन्न शक्तियों को भिन्न-भिन्न नाम दिए गए। आगे जाकर वेदों ने ‘एको सत् बहु विप्रा वदन्ति’ कह कर सभी देव शक्तियों को एक अस्तित्व का हिस्सा माना।

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समय के साथ समाज ने प्रगति की और कुछ ऐसे महापुरुष हुए, जिनका व्यक्तित्व इतना विशाल था कि उनकी मृत्यु के बाद भी जन मानस में वे जीवित बने रहे। लोगों को निरंतर अपनी उपस्थिति का बोध वे कराते रहे। तो उनके इस अदृश्य स्वरूप को भी देव रूप माना गया और उनकी पूजा प्रारंभ हो गयी। शुद्ध आध्यात्मवादी जहाँ एक अस्तित्व को ही मानते रहे वहीँ आम जनमानस बहुदेववादी बना रहा।

कुल मिलाकर देव शक्तियां जन-मन में अपना स्थान कायम करने में सफल रही। तेतीस करोड़ देवी देवताओं का अस्तित्व भी प्रचार में आया।

यदि केवल कल्पना जगत् में ही इनका अस्तित्व होता तो शायद देवता चिरजीवी नहीं रह पाते। मगर लोगों ने भौतिक जगत पर उनके पड़ने वाले प्रभावों को भी महसूस किया। जब कभी कोई समस्या दीर्घ प्रयासों के द्वारा भी समाहित नहीं होती, तो देवों को इसका समाधान करने हेतु प्रार्थना की जाती और एक चमत्कारिक घटना की तरह समाधान हो जाता। ऐसी स्थिति में देवों के प्रति विश्वास केवल काल्पनिक ही नहीं रहा बल्कि उनके वास्तविक अस्तित्व के प्रति श्रद्धा भी हो गयी।

चूँकि विश्व किन नियमों के आधार पर संचालित होता है, इनका ज्ञान सभी को नहीं होता अतः अपनी समझ से आगे जो भी घटना घटित होती, उसको देव शक्ति द्वारा किये गए चमत्कार की तरह ही देखा जाता और उनके प्रति आस्था और भी अधिक बढ़ जाती।

अब यह तो स्पष्ट है कि देवपूजा की प्रक्रिया और देवश्रद्धा में कुछ ऐसा है जो हमारे जीवन के लिए उपयोगी तत्वों की पूर्ति करने में सहायक होता है। अतः उसकी उपयोगिता और आवश्यकता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। समझने की बात यह है कि देवपूजा को सिर्फ एक रूढ़ि की तरह करें या समझपूर्वक।

मेरे लिए देवता कोई व्यक्ति नहीं है, अपितु वे कलेक्टिव कांशसनेस अथवा सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। उनका अस्तित्व हमारी चेतना में है। अगर हम हैं तो वे हैं। हमारा विश्वास जितना प्रबल है उनके प्रति, उनका अस्तित्व भी उतना ही सशक्त है। अब यदि हम उनके प्रति श्रद्धा नहीं रखते तो वे कम से कम हमारे लिए तो मौजूद नहीं हैं।

अब यदि देवों को माने तो किस रूप में मानें और उनकी पूजा किस तरह करें ताकि वे हमारी समस्याओं का समाधान कर सकें, इस सन्दर्भ में जानने के लिए इसी blog के भाग-2 का इंतज़ार करें। आज के लिए बस इतना ही….

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5 Comments on “क्या देव होते हैं : एक चिंतन, भाग-1

  1. बहुत ही सार गर्भीत जानकारी मिली। धन्यवाद और आभार।

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  2. Pingback: क्या देव होते हैं? एक चिंतन, भाग-2 – evo4soul

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